Tuesday, 29 December 2015

गीता जयंती कैसे मनाये ?


मित्रों इधर पिछले एक-दो महीनो से बहुत व्यस्त था इसलिए आप लोगो से कोई संपर्क नहीं हो सका। आप सभी नियमित पाठको के मेल और मैसेज प्राप्त होते थे। आप सभी का बहुत शुक्रिया मुझे याद करने के लिए। आप सभी को गीता जयंती की हार्दिक शुभकामनाये पहुंचे। पिछले २१ दिसंबर को एकादशी तिथी थी और उसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त और सखा पाण्डु पुत्र अर्जुन को गीता का उपदेश धर्मक्षेत्र के नाम से विख्यात कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में दिया था। 

अगर गहराई से चिंतन करे तो श्री कृष्ण जी का ये उपदेश सिर्फ अर्जुन के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिये था। आज जो विश्व इतनी समस्याओ से जूझ रहा हैं और दिन प्रतिदिन हमारा जीवन निराशा और तनाव के चंगुल में बुरी तरह आता जा रहा है इसकी मुख्य वजह वास्तविक ज्ञान और परमेश्वर से अपने सम्बन्ध का विस्मरण। सनातन धर्म में इतनी विशाल संख्या में वेद, पुराण, उपनिषद्  आदि को इस छोटे से संघर्ष और कलह के युग में समझ पाना लगभग असंभव हैं और इसी वजह से हम पर करुणा करके परमेश्वर ने हमको यह दिव्य ज्ञान प्रदान किया। हमे इसका भरपूर लाभ उठाना चाहिये। 

इसका भरपूर लाभ उठाने के लिए इस श्री मदभग्वदगीता का नित्य प्रतिदिन कम  से कम एक श्लोक का अर्थ सहित तात्पर्य समझने की कोशिश करना चाहिए। आप भी पढ़े और दुसरो को भी इस ग्रन्थ को पढ़ने  के लिए प्रेरित करे। ज्यादा से ज्यादा लोगो तक अगर हम इस दिव्य  ज्ञान को पहुँचा सके तो ये हमारी मानव समाज के प्रति परम सेवा होगी. इसके ज्ञान से ही मनुस्य भय, शोक, निराशा, तनाव और दुःखो  के जाल से सफलतापूर्वक निकल सकता है। 

गीता में मुख्यतः कर्मयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग की चर्चा विस्तार से हुई है। इसके अलावा प्रकृति , काल, जीव, परमात्मा और कर्म के प्रकारों पर भी बहुत ही गहरा दर्शन और ज्ञान प्रदान किया गया हैं।  ये ज्ञान बहुत ही दुर्लभ और दिव्य है इसे समझने की यथासंभव कोशिश करे और अगर कोई विद्वान और भक्त के मुख से इसे सुने तो और अधिक सरलता से इसे समझ सकते है। 

और एक मुख्य बात कि  बिना परमेश्वर की कृपा से इसे समझना असंभव हैं तो उस परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए सोलह अक्षर का महामंत्र का नित्य जाप करे। 

                          हरे कृष्ण हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे। 
                          हरे राम हरे राम  , राम राम हरे हरे। 

एक बार आप सभी को पुनः गीता जयंती के पवन अवसर पर हार्दिक बधाई। ईश्वर की कृपा आप सभी को प्राप्त हो ऐसी मेरी प्रार्थना है। अगर आप में से  प्रश्न पूछना है तो हमसे संपर्क कर सकते है। 

ॐ शांति 
अरविन्द त्रिवेदी 
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arvind.trivedi79@gmail.com 

Wednesday, 4 November 2015

दामोदर लीला: अदभुत लीला - भाग दो

 इस कार्तिक मास में हम सभी दामोदर लीला का आनंद ले रहे है। पिछले पोस्ट में हमने देखा कि किस तरह प्रेम और करुणा सिंधु श्री हरि अपने भक्त के वश में होकर अपने को बंधन में भी करना स्वीकार कर लेते है। बालक कन्हैया को ऊखल से बाँधने के बाद मैया यशोदा घर के कामों में व्यस्त हो जाती है।

नन्द महाराज के आँगन में दो पेड़ थे जो यमला-अर्जुन के नाम से जाने जाते थे। अपने पूर्व जन्म में ये वृक्ष कुबेर के पुत्र नलकूवर और मणिग्रीव थे जो बहुत ही ऐश्वर्यवान और धनी परिवार में थे जो कि धन के प्रभाव से बहुत अभिमानी और मदमस्त हो गए थे और नारद मुनि के शाप के फलस्वरूप वो माता यशोदा और नन्द महाराज के घर में पेड़ बनकर खड़े थे। यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि सदा सभी का कल्याण चाहने वाले नारद जैसे दयालु वैष्णव भक्त ले इन कुबेर के पुत्रो को शाप क्यों दिया ? इसके पीछे का रहस्य कुछ इस तरह से है।

कुबेर के ये दोनों पुत्र शिव जी के विशेष भक्त थे और उनका आशीर्वाद प्राप्त किये हुए थे और इस बात का इन्हे बहुत गर्व था। एक बार कैलास पर्वत स्थित मन्दाकिनी नदी के किनारे एक पुष्प उपवन में ये दोनों कई सुंदर युवतियों के साथ गायन और विहार कर रहे थे। यहाँ पर इन लोगो ने वारुणी (एक विशेष प्रकार की मदिरा) पिया और नशे में मदमस्त हो गए। नशे के अति प्रभाव के कारण इन लोगो ने मन्दाकिनी नदी में जो की पुष्पों से भरी हुई थी, सुन्दर युवतियों के साथ  जल क्रीड़ा करने लगे।

उसी समय देवऋषि नारद जी वहाँ  से गुजरे और सारा माजरा समझ गये। नारद मुनि  को देखकर युवतियों ने तो अपने अपने शरीरो को वस्त्र से ढक लिया और बहुत शर्म महसूस किया। लेकिन कुबेर के पुत्र अपने घमंड के कारण नग्न अवस्था में ही रहे और उन्होंने अपने आपको वस्त्रो से नहीं ढका और न ही ऋषि को प्रणाम किया।
नारद जी ने जो कि सदा करुणा और कल्याण की भावना से भरे रहते है उन दोनों मदांध कुबेर पुत्रो को पेड़ बनने का शाप  क्योकि उन दोनों ने ऋषि को देख कर भी अपने धन और पद के गर्व के कारण अपने शरीरो को नहीं ढका था  और न ही उन्हें प्रणाम किया था जोकि सनातन संस्कृति है। नारद जी ने आगे कहा कि द्वापर में श्री कृष्ण के दर्शन करने के उपरांत ही तुम इस जड़ योनि से मुक्त हो सकोगे और मेरे आशीर्वाद की वजह से तुम्हे अपने पूर्व जन्म और कर्म का स्मरण सदैव रहेगा।

इतना कह कर नारद मुनि वहाँ से अपने आश्रम चले गये और वे दोनों कुबेर पुत्र नलकूवर और मणिग्रीव अर्जुन के जुड़वाँ वृक्ष  माता यशोदा के आँगन में प्रगट हुए। देवर्षि नारद के वचनो को सत्य करने के लिये छोटे से बाल कृष्ण जिस ऊखल से बंधे थे उसे घसीटते हुए उन दोनों पेड़ो की और धीरे धीरे चले और दोनों अर्जुन पेड़ो के बीच स एनिकल गए परन्तु ऊखल उन पेड़ो के बीच में ही अटक गया। इसके फलस्वरूप कन्हैया आगे नहीं बढ़  पा रहे थे, जिसके कारण उन्होंने ऊखल को निकलने के लिए थोड़ा और खीचते हुए जोर लगाया। जोर लगते ही दोनों विशाल वृक्ष जड़ से उखड गए और जोर की आवाज के साथ भूमि पर गिर पड़े। इसके तुरंत बाद ही वहाँ दो अत्यधिक तेजवान दो देव पुरुष हाथ जोड़ते हुए प्रकट हुए और भगवन कृष्ण की स्तुति करने लगे।

उन दोनों कुबेर पुत्रो ने कहा कि  आप सभी कारणों के कारण स्वरुप सृष्टि के आदि से परम भगवन है और सभी जीवो के अंदर परमात्मा रूप में निवास करते हैं।  आपके बारे में स्वयं ब्रम्हा, शिव आदि परम योगी तक ठीक  जानते है और जिनके लिए आपके दर्शन दुर्लभ हैं  उन्ही श्री हरि के मनोहारी बालरूप के साक्षात दर्शन मुझे नारद जी की कृपा से संभव हो सके है।  वास्तव में नारद जी ने हम दोनों भाइयो पर करुणा के कारण ही शाप दिया और उस शाप के कारण ही अखिल ब्रम्हांड के नियंता के हूँ दर्शन कर पा रहे है। इस तरह बहुत प्रकार से स्तुति करने के उपरांत उन दोनों ने उन परमेश्वर की परिक्रमा की और  भगवन कृष्ण की आज्ञा से स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किया।

उन वृक्षों के गिरने की जोरदार आवाज को सुनकर मैया यशोदा सहित सभी आस पास के गोपियाँ और ग्वाले भाग कर आये और आश्चर्य करने लगे की कैसे ये पेड़ गिर गए। मैया यशोदा ने तुरंत लाला को ऊखल से बंधी रस्सी से खोला और अपने ह्रदय से लगा लिया और भगवान को धन्यवाद दिया की उनका लाला सुरक्षित है। वहाँ पर उपस्थित कुछ बालको ने बोला कि  कन्हैया ने ही पेड़ो को गिराया हैं और उसके बाद दो तेजवान पुरुष निकल कर लाला को हाथ जोड़ कर गए थे। लेकिन उन बालको की बातो पर किसी को विश्वास नही हुआ क्यों कि  गोकुल में सभी कृष्ण के प्रेम में सराबोर थे और वे उन्हें  मानते थे अपितु शुद्ध प्रेम करते थे। इस तरह गोकुलवाशी और नन्द -यशोदा नित प्रतिदिन बाल कृष्ण की लीलाओ का आनंद उठाते रहे।

ॐ शांति
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Tuesday, 3 November 2015

दामोदर लीला : अदभुत लीला भाग १



वैसे तो हमारे बाँकेबिहारी जी की सभी लीलाये अनंत अनंत गुना आनंद प्रदान करने वाली है। चाहे वह पूतना वध हो, बकासुर वध हो, अघासुर वध हो, धेनुकासुर वध हो, कालिया मर्दन हो, माखन चोरी की लीला हो, गौ चराने की लीला हो, मिटटी खाने की लीला हो या फिर शरद पूर्णिमा की विहार लीला हो सभी लीलाये अमृत तुल्य सुख प्रदान करने वाली है। जैसा की आप सभी लोगो को पता ही होगा, अति पावन कार्तिक मास चल रहा हैं और इस महीने में भगवन कृष्ण की एक बहुत प्रसिद्द लीला दामोदर लीला हुई थी।  जो भी भक्त इस महीने नित प्रतिदिन श्री दमोदराष्टकम का पठन या श्रवण करते हैं वे श्री दामोदर भगवान की अनंत अनंत कृपा प्राप्त करते है।

एक दिन माता यशोदा दही मथने में व्यस्त थी और अपने लाला कन्हैया की लीलाओ को गुनगुनाते जा रही थी। उसी समय बालक कन्हैया सुबह सुबह नींद से जागे और दुग्ध पान करना चाहते थे। इस कारण  से उन्होंने मैया यशोदा की दही माथने वाली मथानी को पकड़ कर अपनी मैया को रोकने का प्रयास करने लगे। मैया यशोदा बड़े ही वात्सल्य भाव से अपने कन्हैया को स्तनपान कराने लगी। उसी समय रसोई में गरम होने के लिए जो दूध रखा था वो उबलने लगा और उन्होंने कन्हैया को गोद से उतार कर दूध बचाने के लिये रसोई की तरफ तेजी से दौड़ी। 

मैया द्वारा बीच में इस तरह छोड़ कर जाने से कन्हैया को गुस्सा आया औए उन्होंने एक पत्थर से दही वाली मटकी को तोड़ दिया और एकांत में जाकर ताजा ताजा मक्खन अपने छोटे छोटे हाथो से चाटने लगे और ओखली ( ओखली या ऊखल का अर्थ : लकड़ी का पात्र जो मशाला वगैरह कूटने के लिए प्रयोग किया जाता है) पर बैठ कर बंदरो को भी मक्खन खिलाने लगे। टूटी हुई दही की मटकी को देख कर मैया को समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि ये हरकत कन्हैया की ही हैं। अपने द्वारा की हुई इस शैतानी की वजह से प्रभु श्यामसुन्दर भय के कारण इधर उधर देखते भी जा रहे थे। इतने में मैया हाथो में एक छड़ी लेकर चुपचाप कन्हैया के पीछे पहुँच गयी। मैया के हाथ में छड़ी देखते ही बालक कृष्ण ऊखल से कूद कर भय से भागने लगे और माता यशोदा उन्हें पकड़ने के लिये पीछे पीछे दौड़ी।

कितनी अजीब बात हैं जिन परमेश्वर को बड़े बड़े योगी, सिद्ध और साधक बड़े बड़े अनुष्ठानो और तमाम विधियों से अनंत जन्मो के प्रयास के बाद भी नहीं पकड़ पाते हैं उन्ही ब्रम्हांड के मालिक को माँ यशोदा आज पकड़ने की कोशिश कर रही है और प्रभु भी मैया के भय से भाग रहे हैं जिनके कि भृकुटि के संकेत मात्र से अनंत अनंत ब्रम्हांड नष्ट हो जाते है। बहुत देर तक दौड़ते हुये जब कन्हैया ने देखा की मैया के चेहरे से पशीने की बुँदे आने लगी है तब उन्होंने स्वयं ही अपने आपको पकड़वा लिया और अत्यधिक डरने का नाटक करने लगे। अपने हाथो से अपनी आँखों को मसल मसल कर रोने लगे और जोर जोर से हिचकियाँ लेने लगे। यहाँ पर भगवान ने यह सिद्ध कर दिया कि वह सिर्फ अपने सुद्ध भक्तो के प्रेम के ही वश में हैं और किसी भी  समझना या पाना असंभव है। 

जब मैया यशोदा ने अपने लाला को इतना डरा हुआ देखा तो वात्सल्य प्रेम से उन्होंने सोचा कि कही मेरा लाल ज्यादा न डर जाए इसलिए तुरंत उन्होंने छड़ी को दूर फेक दिया और उन्हें बाँधने का निश्चय किया जिससे भविष्य में वो फिर ऐसी शैतानी न करे। जिन जगत के परम नियंता का न कोई आदि है न कोई अंत उन परमेश्वर को भला कोई कैसे बंधन में रख सकता हैं लेकिन मैया यशोदा के अपनी सुद्ध भक्ति से ऐसा करने का प्रयास कर रही है। मैया ने उन्हें ऊखल में एक रस्सी से बंधना शुरू किया परन्तु वो २ अंगुल काम पड़  गयी। उन्होंने एक और रस्सी जोड़ दी मगर फिर भी रस्सी २ अंगुल काम पद गयी। इस तरह यशोदा जी ने एक एक करके घर की सभी रस्सियाँ जोड़ डाली मगर बांधने में असफल रही हर बार वही २ अंगुल रस्सी छोटी हो जाती थी।

ये सब देख कर पड़ोस की और गोपियाँ  और मित्र ग्वाले भी देखकर चकित थे कि  इंतना छोटा सा बालक को बाँधने में घर की साड़ी रस्सी लग गयी फिर भी वो बंध नहीं पाये। अगर सांसारिक तरीके  तो सिर्फ २ फिट की रस्सी एक छोटे से बालक को बाँधने के  होती है मगर इधर तो १०० फिट रस्सी भी काम पद गयी। इससे भगवान ये सन्देश देना चाहते हैं  की बिना उनकी स्वयं की ईच्छा के बिना कोई भी उन्हें बंधन में नहीं कर सकता भले ही उनका सच्चा भक्त ही क्यों ना हो। जब कन्हैया देखा कि अब मैया पसीने-पसीने हो गयी थकान से माँ का चेहरा लाल हो गया है तब उन्होंने स्वयं ही अपने आपको जान बूझ कर मैया के द्वारा बंधवा लिया।

जिन अखिल ब्रम्हांड के मालिक को ब्रम्हा, शिव जैसे लोग भी पूर्ण रूप से नहीं समझ सकते है वही प्रभू आज मैया यशोदा के प्रेम के वश में आज अपने आपको बंधन में भी करवा लेते हैं।  वाह रे वाह भगवन क्या लीला है आपकी …… !!!!. वास्तव में उन परमेश्वर की लीला को समझना सांसारिक  दूषित व्यक्तियों के समझ के बाहर की बात है। उनकी लीला को सिर्फ उनकी ही कृपा के माध्यम से समझा जा  सकता है।

दाम का एक अर्थ रस्सी भी होता है और उदर का अर्थ पेट होता है। अतः मैया द्वारा पेट के चारो और रस्सी से बंधने के कारण प्रभु का एक नाम दामोदर भी विख्यात है। प्रेम से बोलिए दामोदर भगवान  की जय। इस तरह लाला  को बांध कर माँ यशोदा घर के काम में गयी और अब आगे क्या होता है इसके लिए हमारा अगला पोस्ट का इंतज़ार करिये। हरे कृष्ण !!!!!.

ॐ  शान्ति
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Friday, 30 October 2015

स्त्रियों के खुशहाल जीवन के सूत्र



समस्त देशवाशियो को करवा चौथ व्रत की सुबह कामनाये। ये व्रत हमारी गौरवशाली संस्कृति का एक हिस्सा रहा है। ये व्रत पति के मंगल और दीर्घायु के लिए हमारे देश में प्राचीन काल से ही होता आया हैं। मै  सभी मातृ  शक्तियों को सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ। इसी से सम्बंधित मै  एक प्रसंग आप सब से साँझा करने जा रहा हूँ।

बात उन दिनों की है जब पांडव वनवास में अपनी माता कुंती और पत्नी द्रौपदी के साथ वन में अपने दिन गुजार  रहे थे। उसी समय एक दिन भगवन श्री कृष्ण अपनी पटरानी सत्यभामा समेत पांडवो से मिलने काम्यक वन जा पहुँचे। सत्यभामा को यह देख कर बहुत अचम्भा हुआ कि पाँचो पांडव द्रौपदी को समान प्यार और सम्मान देते है। सत्यभामा ने द्रौपदी को एकांत में पूछा कि  आप किस प्रकार इतने तेजस्वी और अलग अलग स्वभाव के वीर पतियों को प्रसन्न रखती हो ? क्या आप कोई तंत्र, मन्त्र , जादू, जप-तप , वशीकरण, स्नान-ध्यान, व्रत-उपवास जानती है ? कृपा कर के मुझे वह उपाय बताओ जिससे कि  मैं द्वारकाधीश को अपने वश  सकूँ।

द्रौपदी ने उत्तर दिया कि  आपने यहाँ पर जिन उपायो का नाम लिया हैं  वह सब कुटिल स्वाभाव की स्त्रियाँ करती है। तंत्र-मन्त्र, जादू आदि से स्त्रीं अपने पति को वश  में रख ही नहीं सकती। मूर्खतावश जादू और तंत्र के प्रभाव में आकर स्त्रियाँ पतियों को चीजे खिला देती है जिससे की कोढ़ , पागलपन, बहरेपन आदि की समस्याये  हो जाती है। इसके कुछ उपाय है वह मई संक्षेप में बताती हूँ।

मेरी पूजनीया सांस माँ ने घर-परिवार और पति के लिए जो कर्तव्य बताये है मै उनके पालन से कभी नहीं डिगती। अपने सांस की बुराई कभी नहीं करती हूँ , पतियो को कभी हीनभाव से नहीं देखती हूँ और भोजन, वस्त्र आदि में शिकायत का प्रयास नहीं करती हूँ।

सत्यभामा, मई कभी कठोर वचन का प्रयोग नहीं करती हूँ और न ही कभी संदेह करती हूँ। विवाद का मौका आने पर उसे ताल जाती हूँ और पतियों के घर से बाहर रहने पर न तो बुरी संगति में बैठती हूँ  और न अतिरिक्त श्रृंगार वगैरह करती हूँ। मैंने परिवार के परिचितों से लेकर पुरखो तक सभी के बारे में गहराई से जानकारी।  और सभी के प्रति उचित कर्तव्य का निर्वाह करती हूँ।

देवपूजा,पर्व और श्राद्ध आदि के मौके पर माननीयों की पूजा का हमेशा  ध्यान रखती हूँ। अनाज और दूसरी वस्तुओ की भंडार में क्या स्थिति है यह मुझे हमेशा पता रहता है। पति की सेवा का मौका चूकती नहीं हूँ, समय पर भोजन देती हूँ , पहले जागती और बाद में सोती हूँ। उनकी पसंद समझ कर उनके मन मुताबिक ही काम करती हूँ। राज्य के खजाने में कितना आया और कितना गया यह मेरी नज़र में होता था। अस्तबल में कितने हाथी और घोड़े है और लाखो दास- दासियों  के नाम और सबकी गिनती मुझे पता रहती थी।

रोजाना आठ हजार ब्राम्हण, दस हजार ब्रम्हचारी साधुओ और अट्ठासी हजार स्नातको को भोजन करवाना, अन्न , वस्त्र और दान का काम मैं ही संभालती थी। अपनी भूख और प्यास भूलकर पति, सांस और परिवार की सेवा में लगे रहना और पतियों को तमाम काम-काज से इस तरह निश्चिंत कर देना की वे आराम से अपने धर्म-कर्म में प्रसन्न मन  रह सके। यही मेरा पतियों को वश  में करने का उपाय है।

स्त्री को अपने स्वाभाव से पति का ह्रदय जीत लेना चाहिए। पति को यह लगने लगे कि अब पत्नी के बिन सरलता से एक पग भी नहीं चला जा सकता, उसकी पत्नी  स्वयं से भी ज्यादा अच्छे से समझती है। ऐसी पत्नियों के पुरुष उनके वश  में हो जाते है। (श्रोत: महाभारत वनपर्व)

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Wednesday, 28 October 2015

साधु पुरुष के कुछ लक्षण



हमें अक्सर हमारे घरों और स्कूल में यह सिखाया जाता हैं कि हमेशा अच्छे लोगो का संग करो। संगति का जीवन में बहुत महत्व होता है। हम जिन लोगो के साथ अपना समय व्यतीत करते है उनका प्रभाव हमारे स्वाभाव व जीवन पर बहुत अधिक गहरा होता है। हमें कुसंग से बचना चाहिये और हमेशा साधु पुरुषो का संग करना चाहिये अर्थात सत्संग का अवसर ढूंढ़ते रहना चाहिये। 

"सठ सुधरहि सत संगति पाही "

"एक घड़ी आधी घडी , आधी में पुनि आध।
तुलसी संगति साधु की, हरे कोटि अपराध।"

कुसंग के कारण ही महारानी कैकेयी क्या से क्या हो गयी थी। साधू पुरुष का संग पाकर रत्नाकर डाकू ब्रम्हज्ञानी हो गया और बालक ध्रुव ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में नारद मुनि के सत्संग से परम अटल पद और ईश्वर की कृपा प्राप्त की। ऐसे अनेको उदहारण हमारे वर्तमान जीवन में और इतिहास में देखने को मिलते है। यहाँ पर महत्वपूर्ण बात यह है कि साधु पुरुष की पहचान कैसे की जाय। किस तरह पहचाना जाए कि कौन साधु पुरुष है या कोई ढोंगी पुरुष है। यहाँ पर साधु पुरुषो के कुछ लक्षणों की चर्चा की जा रही है।

साधु पुरुष का प्रथम लक्षण होता है सहनशीलता। जी हाँ , सहनशील होना अपने आप में महान तप है। अगर आप सहनशील हैं तो आप बात बात पर क्रोधित नहीं होंगे जिसके परिणामस्वरूप आपकी बुद्धि ठीक ढंग से कार्य करेगी और आप जीवन में सही निर्णय करेंगे। अच्छे और बुरे दोनों में ठीक ढंग से अंतर कर पायेंगे।

दूसरा लक्षण है करुणामय होना। एक साधु पुरुष हमेशा ही करुणा से भरा होता है। ईर्ष्या और जलन  दुर्गुणों से बहुत दूर होता है ऐसा पुरुष। संसार में हर प्राणिमात्र के प्रति उसका मन सदैव ही करुणा और दया से भरा होता है और हमेशा लोक कल्याण के बारे में ही सोचता है। वह बिना स्वार्थ के ही दुसरो की भलाई के कार्यो में ही लगा रहता है।

साधु पुरुष का तीसरा महत्वपूर्ण लक्षण होता है समदर्शी होना। समदर्शी होने का अर्थ है सभी प्राणिमात्र के प्रति मित्रवत व्यवहार करना। दूसरे शब्दों में कहे की साधु का कोई भी शत्रु नहीं होता। वह सम्पूर्ण सृस्टि में सभी प्राणियों के प्रति कभी भी भेदभाव नहीं करता। वह ब्राम्हण, चाण्डाल , ज्ञानी और मूर्ख  में कोई भेदभाव नहीं करता।

साधु पुरुष का एक महत्वपूर्ण लक्षण है कि वह अपना जीवन प्रामाणिक ग्रंथो जैसे गीता, श्रीमदभागवत और रामचरित मानस आदि के अनुसार जीता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है और भौतिक जीवन के तनावपूर्ण और दिखावे के जीवन से बहुत दूर होता है।

साधु पुरुष अपने मानव जीवन के परम लक्ष्य के प्रति हमेशा से ही सचेत रहता है और आध्यात्मिक चिंतन को जीवन में अधिक महत्व देता है। जैसा कि आप को पता ही होगा मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने सम्बन्ध को ईश्वर के साथ पहचान लेना और उस परम सत्य स्वरुप ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही है।

साधु पुरुषो के और भी कई लक्षण होते है।  यहाँ पर कुछ प्रमुख लक्षणों को बताया गया है। अगर आप में से कोई और साधु पुरुष के लक्षणों में कुछ जोड़ना चाहे तो आपका स्वागत है। पुनः अतिशीघ्र मिलते है।

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Tuesday, 27 October 2015

ग्लोबल वार्मिंग : कुछ महत्वपूर्ण तथ्य



प्रिय पाठको , वैसे तो हम अपने इस ब्लॉग से ज्यादातर सांस्कृतिक या आध्यात्मिक विषयो पर ही विचार प्रकट किये जाते है लेकिन आज मई एक सामाजिक समस्या पर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा वह है ग्लोबल वार्मिंग की समस्या। जी हाँ , आप सबने कही न कही इस शब्द को अवश्य ही कही न कही पढा या सुना होगा। आइये पहले समझ ले इसका अर्थ क्या है। पिछले कई वर्षो में इस दुनियाँ के तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव हुआ है यह निरंतर बढ़ता ही जा रहा हैं। इस कारण अन्य तरह के मौसम में भी परिवर्तन देखने को मिला है। अंतर्राष्ट्रीय मंचो में यह मुद्दा प्रमुख रूप से छाया हुआ है। बढ़ते औधोगीकरण और बदलती जीवन शैली के फलस्वरूप हम नित प्रतिदिन इस समस्या को कही न कही और बढ़ाते जा रहे है। अब यह साफ़ हो गया है कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा अर्थ है हमारे  भूमण्डल का बढ़ता हुआ तापमान जो की आज प्रमुख चिंता का बिषय बना हुआ है।

बढ़ता हुआ ए.सी (एयर कंडीशनर) और फ्रिज का प्रयोग  इस समस्या को और अधिक बढ़ा रहा है। इन चीजो के उपयोग से कार्बन और अन्य हानिकारक गैसों  के निकलने से पृथ्वी का तापमान में बहुत अधिक वृद्धि दर्ज की गयी है और ये गैसें  हमारी ओजोन परत के लिए भी नुकसानदायक है। ओजोन पर्त हमारी सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों से रक्षा करती है। आज हम ऊर्जा की खपत कूलिंग यानि ठंडा करने के लिए ज्यादा कर रहे है।
इस ठंडा यानि  कूलिंग के चक्कर में दुनियाँ  का कूलिंग सिस्टम बिगड़ गया। कृत्रिम रूप से वातावरण   चीजो को ठंडा करने की हमारी आदत बहुत घातक सिद्ध हो रही है।

दुनियाँ  में पहला घरेलू एयरकंडीशनर 1914 में बना था और पहला फ्रिज 1930 में बना था। लोग धीरे धीरे इन चीजो के गुलाम बनते चले गए। अकेले 2010 में चीन में ५ करोड़ ऐ सी की खपत हो गयी और ये मान साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। अकेले अमेरिका अपनी बिल्डिंग्स को कूल रखने लिये जितनी बिजली खर्च करता हैं  उतना अफ्रीका कुल मिला कर भी नहीं उपयोग कर पाता  है। मुंबई में भी कुल बिजली का 40 % ऐसी पर ही खर्च हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक , सन 2100 तक दुनिया में एसी के लिये बिजली की मांग 33 गुना बढ़  जायेगी।

समस्या यह है की ना तो विकसित देश जैसे अमेरिका या फिर विकासशील देश कोई भी अपने यहाँ कार्बन जैसी हानिकारक गैसो के उत्सर्जन को रोक नहीं सके है। अधिक मात्रा में हानिकारक गैसें वातावरण में मिलकर वायुमंडल को और अधिक घातक बना रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग इस सदी के लिए एक बड़ी चुनौती है। विकास और आधुनिक जीवन की अंधाधुंध दौड़ में हम अपने विनाश  का जाल दिन प्रतिदिन बुनते जा रहे है। विकसित देशो के लोग जीवन शैली बदलना नहीं चाहते और विकासशील देश विकास के नाम पर फ्रिज और एसी का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ाते ही जा रहे है। जहाँ  पर जरुरत नहीं हैं वह पर भी सिर्फ दिखावे और स्टेटस सिम्बल के नाम पर इनकी मांग बढ़ती जा रही हैं।

दुनियाँ भर के वैज्ञानिक और एनवायरनमेंट एजेंसिया आये दिन लोगो से इन गैसों में कमी लाने के लिए अपील करती हैं लेकिन ऐसा लगता हैं  कि  बढ़ता हुआ भौतिकतावाद के कारण  इसका रुकना बहुत मुश्किल हो गया हैं और आने वाले समय में गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। अगर हम फ्रिज और एसी का उपयोग काम करने में सफल होते है तभी इस समस्या से कारगर ढंग से निपटा जा सकता है।

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Wednesday, 21 October 2015

विजयदशमी : आज के सन्दर्भ में

 

आप सभी को पिछले नौ दिनों से चल रहे नवरात्रि उत्सव और आने वाले त्यौहार विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाये। विजयदशमी का त्यौहार जिसे दशहरा के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार को अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने आसुरी और दुष्ट स्वाभाव वाले रावण का वध किया था और पूरे भूमण्डल को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।

भगवान राम की इस विजय के उपलक्ष्य में हर वर्ष हम रावण दहन करते है यानि रावण के विशाल पुतले बना कर उसे जलाते है। ये परंपरा कई युगो और सदियों से चली आ रही है। मै भी बचपन से इस त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ हू।  पहले तो ये सिर्फ मेरे लिए मनोरंजन और स्कूल की एक और छुट्टी के जितना ही महत्व रखता था। लेकिन जब से होश संभाला तब से हर वर्ष मैं यह सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि जिस रावण के पुतले को इतनी भीड़ के बीच में हम हर वर्ष जलाते हैं  वही रावण हर वर्ष और अधिक शक्तिशाली बन कर हमारे बीच उपस्थित हो जाता है।  आखिर कब तक हमें उसे यूँ ही जलाते रहेंगे और कब तक वह और अधिक मजबूती से हमारे बीच यूँ ही हर वर्ष आता रहेगा।  

अगर गहराई से सोचे तो अब सिर्फ दशहरे के दिन रावण जलना मात्र रस्म अदायगी रह गया है। हम सिर्फ अपनी ऊर्जा और समय ही नष्ट कर रहे है यदि हम सही मायनो में बुराई को पराजित न कर सके। बुराई भी दो प्रकार की है, एक तो जो हम अपने आस पास देखते है यानि बाहर देखते है और एक हमारे मन में भी बुराइयो का भंडार है। हम अपने आस - पास कितने बलिष्ठ रावण बहुत बड़ी संख्या में देखते रहते हैं। अपने मन का रावण तो और भी अधिक शक्तिशाली है। जब से हम अपनी गौरवशाली संस्कृति से दूर होकर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में रंग गए है तब से तो ये और अधिक मजबूत होकर अट्टहास कर के हम सबको चुनौती देता नजर आ रहा हैं। 

कहते हैं जव राम और रावण के बीच घोर संग्राम हो रहा था, उस समय भी रावण के जितने सिर राम जी काटते थे उतने ही सर पुनः नए हो जाते थे। इस प्रकार जब राम अत्यधिक परेशान हो गए तब रावण के भाई विभीषण ने युक्ति बताई और तब रावण मार जा सका। आज भी हम देखते है कि  हम जितना भी अधिक बुराइयो के खात्मे का प्रयास करते है, बुराई और प्रचंड रूप में हमारे सामने आ कर हमें ललकारने लगती है। 

अगर हम अपने समाज में व्याप्त बुराइयो जैसे भ्रष्टाचार, नशे की आदतो जैसी बुराइयो को मार सके तभी सही अर्थो में रावण जलने की सार्थकता है नहीं तो इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता है। आइये हम सभी संकल्प लेते है कि हम सब अपने अंदर के रावण को पराजित करेंगे और सद्गुणों को विकसित करेंगे। इसी के साथ आप सभी को फिर से विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाये। 

ॐ  शांति 
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Wednesday, 14 October 2015

नवरात्रि का हमारे जीवन में स्थान




इधर कुछ दिनों से व्यस्तता के कारण आप लोगो के संपर्क में नहीं रह सका। आपमें से काफी लोगो के फ़ोन कॉल्स भी आये जो आपका हमारे प्रति स्नेह को साफ़ प्रदर्शित करता है। इधर नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र का प्रारम्भ हो चुका है। पूरे देश में लोग बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ इन दिनों देवी माँ का पूजन व अर्चन करते है। बहुत से लोग उपवास आदि के द्वारा अपना शुद्धिकरण करते है जिससे उपासना और अच्छी तरह से हो सके।

इधर गुजरात और महाराष्ट्र की तरफ गरबा नृत्य बहुत लोकप्रिय है। लोग रात्रि में माता की प्रतिमा के सामने घेरा बनाकर माता को रिझाने के लिए नृत्य और गायन करते है। इस सम्पूर्ण उत्सव को गरबा के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में रात्रि जागरण का चलन ज्यादा है। लोग पूरी रात्रि जागकर माता जी के भजन आदि गाकर मैया को रिझाते है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते है। इसी तरह देश के अन्य अन्य भागो में भी लोग अपने अपने तरीके से इन नौ दिनों में मैया की विभिन्न तरीको से पूजा व वंदन करते है।

कलियुग के बढ़ते प्रभाव के फलस्वरूप आसुरी शक्तियों का दिन प्रतिदिन प्रभाव बढ़ता जा रहा है और आमजन त्रितापो से पीड़ित है। ऐसे में यदि कुछ समय ही सही , मनुष्य यदि भक्तिभाव से उस परमशक्ति संपन्न परमेश्वर को याद करता है तो परिणामस्वरूप बहुत ही शांति और आनंद का अनुभव करता है। अगर और अधिक गहराई से सोचे तो पाएंगे कि अनंत शक्तिरूपा माँ उन परम पुरुष आदि परमेश्वर की विभिन्न शक्तियों में से एक है। इन माँ के भी अनंत स्वरुप और अनंत शक्तियाँ हैं  जिन्हे हम जैसे मतिमंद नहीं समझ सकते है।

मैं किसी भी तरह के पूजापाठ का विरोधी नहीं हूँ लेकिन यदि हम इस प्रकार विशेष दिनों में पूजा करके अन्य दिनों में आसुरी या पापपूर्ण जीवन जिए या इसे सहन करे तो ये पूजा भी कोई फल प्रदान नहीं करती। अगर हम अपने जीवन में सदाचार, सत्य, प्रेम और करुणा जैसे सद्गुणों को विकसित नहीं करेंगे तो फिर जीवन में कैसे शांति और खुशहाली आ सकती है। आप लाख व्रत और उत्सव मना लो लेकिन जब तक हमारी अन्तः प्रवृत्तियाँ कलुषित है तब तक ये सभी कर्मकांड और समारोहो का कोई अर्थ नहीं है। हमारे शास्त्रो में भी वर्णन आता हैं  कि  जहाँ  जहाँ नारियों की पूजा होती हैं  वहाँ  वहाँ देवतागण स्वयं निवास करते है।

जब तक हम हमारे समाज में अपने आस-पास की स्त्रियों का आदर और सम्मान नहीं करेंगे तब तक हम अपने जीवन में सही अर्थो में कैसे नवरात्री का उत्सव मन सकेंगे। बढ़ती हुई कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ती रेप की घटनाये, अल्प आयु कन्याओ के साथ दुर्व्यवहार की घटनाओ के बीच आज के समाज में घुटन का अनुभव हो रहा है। जब तक ऐसी घटनाओ पर लगाम नहीं लगेंगी तब तक माँ हमारे द्वारा अर्पित कोई भी पूजा या भेट स्वीकार नहीं करेंगी। हमारा देवी माँ से वरदान और खुशियो की आशा करना निरर्थक ही साबित होगा अगर हमारे समाज में हम स्त्रियों को सम्मान नहीं दे सके।

आइये इस नवरात्री हम सभी मिलकर संकल्प ले कि हम अपने आस-पास किसी भी तरह से महिलाओ के प्रति अपराध नहीं होने देंगे। सभी महिलाओ के प्रति आदर व सम्मान का भाव रखेंगे और जीवन में नौ सदगुणों को विकसित करेंगे। ये नौ सद्गुण इस प्रकार हैं - सत्य, सदाचार , क्षमा, प्रेम, करुणा, पवित्रता, समता,सहनशीलता और सेवा।

आज के लिए इतना ही बाकी फिर जल्द ही मिलते है।

ॐ शांति
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Wednesday, 30 September 2015

मनुष्य जीवन: ईश्वर का वरदान



जब कभी भी आप इस संपूर्ण ब्रम्हांड में सभी जीवो के बारे में विचार करें तो मुख्य रूप से चेतना की दृष्टि से इस भौतिक जगत में इसे दो मुख्य रूपों में बाँट सकते हैं।  एक पशु और दूसरा मनुष्य। वैसे तो जीवो के अनेक प्रकार है जैसे पेड़ पौधे, देव, दानव गन्धर्व आदि अनेक दूसरे लोको के विभिन्न प्रकार के जीव। इस भूमण्डल में मनुष्य एक श्रेष्ठ प्राणी समझा जाता है जब हम इसकी तुलना दूसरे अन्य जीवों से करते है। वनस्पतियाँ या पेड़-पौधे मनुष्य की तुलना में निम्न योंनि वाले जीव होते हैं ये अचल होते है और सिर्फ अपने को पोषित करके इस जगत में अन्य जीवों की भाँति अपने कर्मो का भोग शीत , ग्रीष्म आदि कष्टो को सहते हुए करते हैं। ये जड़ श्रेणी के अंतर्गत आते है।

पशु श्रेणी के अंतर्गत बहुत जीव आते है जो चल सकते हैं और चेतना के कारण सुख और दुःख का अनुभव भी कर सकते है। सभी पशु , पक्षी,कीड़े-मकोड़े आदि अपना समय भोजन,नींद,बच्चे पैदा करने और अपनी सुरक्षा करने में व्यतीत करते है। मुख्य रूप से ये इन चार कामो को ही पूरे जीवन में करते रहते हैं और अपने विगत कर्मो का भोग करते रहते है। इस संसार चक्र से बाहर निकलने की इनकी कोई सम्भावना नहीं होती है।

अब अगर हम मनुष्य की बात करे जिसे सभी जीवो में उन्नत और श्रेष्ठ माना जाता है वह भी भोजन की तलाश, आराम की नींद , बच्चे पैदा करना और अपनी सुरक्षा के उपायो में अपने जीवन का अधिकांश  समय खर्च कर देता है। हर व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब, कितने भी बड़े पद या प्रतिष्ठा वाला हो मुख्य रूप से इन चार चीजो में ही आनंद पाने की कोशिश करता हैं - आहार, नींद, मैथुन और भविष्य की सुरक्षा (Eating , Sleeping , Mating & Defending)। यह चार काम तो पशु भी बहुत अच्छी तरह से करते है तो फिर हम मनुष्य क्यों श्रेष्ठ कहलाते है ? जरा इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरुरत है। अगर आप अपने जीवन में इन चार चीजो को ही महत्व दे रहे है फिर तो आप के जीवन पशु जीवन में कोई अंतर नहीं हैं। फिर मनुष्य को क्यों श्रेष्ठ समझा जाय ?

इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये हमें अपने शास्त्रो और श्रीभगवत गीता की मदद लेनी होगी। मनुष्य जीवन में जीव अपने और भगवान के संबंध के बारे में जान सकता है। इस दुखो से भरे संसार चक्र से बाहर निकल कर कभी ना समाप्त होने वाले आनंद को पा सकता है। मनुष्य ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होकर भक्ति का आनंद ले सकता है। जबकि पशु इन सबको नहीं कर सकता है। सिर्फ और सिर्फ मनुष्य जीवन से ही इस निरंतर लाखो करोडो जन्मो से फ़से हुए जीव की मुक्ति संभव है।

ईश्वर ने विवेक नाम की एक ऐसी शक्ति मनुष्य को प्रदान की है जिसके द्वारा मनुष्य मुक्ति और आनंद का दरवाजा खोल सकता है। ये विवेक मनुष्य को सत्संग के बिना नहीं प्राप्त हो सकता और सत्संग बिना ईश्वर की कृपा के नहीं मिल सकता। हर हाल में उस परम शक्ति स्वरुप ईश्वर की करुणा अनिवार्य है।

मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है की हम अपने आपको इस संसार से मुक्त कर के ईश्वर की सहज भक्ति में लगाये और परम शाश्वत आनंद का अनुभव करे। अगले लेख में इन सबकी विस्तार से चर्चा करेंगे कि  विवेक और सत्संग से अपने जीवन को आनंद से भर सकते है।

ॐ शांति
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Thursday, 24 September 2015

बकरीद का सही मायने



जैसा कि आप सभी लोगो को मालूम है कल हमारे मुस्लिम  समाज का एक प्रमुख त्यौहार बकरीद हैं। वैसे तो यह ईद ही है लेकिन बकरो की कुर्बानी देने के कारण इसका नाम बकरीद प्रसिद्ध हो गया। इस त्यौहार की सभी मुस्लिम भाइयो को मुबारकबाद। अगर सही अर्थो में देखा जाय तो त्यौहार मनाने  के पीछे हमारा असली मकसद एक दूसरे से मिलना और रोज़ाना की ज़िन्दगी से कुछ वक़्त निकल कर थोड़ा चिंतन करना और आनंद और उन्नति के बारे में सोचना। वक़्त या समय बदलता रहता हैं , काल चक्र अनवरत घूम रहा है और इस के साथ कुछ पुरानी परम्पराये या रीतियाँ  जिनसे हम कुछ प्रेरणा ले सकते हैं उन्हें याद रखने के लिये हम जश्न या त्यौहार मनाने  की परंपरा रही है।

प्राचीन काल से ही मानव समाज में किसी ना किसी रूप में कुर्बानी या बलि देने की प्रथा रही है। इसके पीछे कई कारण है। अगर आप में से अधिकांश लोग ये मानते हैं की बलि या कुर्बानी से भगवान या अल्लाह खुश होंगे तो ये आप सबकी गलतफहमी है। दुनियाँ के हर धर्म का एक ही मकसद है कि इस दुनियाँ में जितने भी जीवात्माये हैं वो सभी आपस में प्रेम और आनंद के साथ आपसी सामंजस्य के साथ रहे। आज समस्या यही हैं की लोग धर्म की अपने अपने तरह से अर्थ निकाल रहे है और जो ईश्वर , अल्लाह और यीशू का आदेश है वह मानने को तैयार नहीं है। हम अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर हमारे धर्म ग्रंथो की मनगढ़ंत व्याख्याएँ कर रहे है और भोली भाली जनता उनका अंधानुकरण कर रही है।

उन्हें यह नहीं मालुम है कि ये प्रथायें किन परिस्थितियों में चालु हुई थी और उसके पीछे क्या उद्देश्य होता था। अब तो सिर्फ हम अपनी स्वाद की तुष्टि के लिए ही इन प्रथाओ को ज़िंदा रखे हुए है। इसको ही हम धर्म का नाम पर प्रचारित कर रहे है और दिन प्रतिदिन और मजबूत बनाते जा रहे है। भला कौन सा धर्म अनावश्यक मार काट और निरपराध लोगो का क़त्ल करने की अनुमति देगा। धर्म तो जोड़ना सिखाता है ना कि तोड़ना. धर्म का उद्देश्य प्रेम है ना कि हिंसा।

हिन्दू धर्म में भी बलि परम्परा रही है लेकिन  समय में प्रायः बहुत कम होती जा रही हैं। अब सांकेतिक बलि जैसे नारियल फोड़ना इत्यादि तरीके से हिंसा से बचा जाता है। ऐसे कार्य नहीं होने चाहिये जिससे रक्तपात और किसी जीव को कष्ट पहुंचे। भला हम किसी मासूम और निर्दोष जीव को मार कर कौन सा पुण्य या नेक काम करेंगे। मानवता और इन्शानियत की यही मांग हैं कि हमें किसी भी जीव को कष्ट पहुंचे ऐसा कार्य या प्रथाओ को बढ़ावा नहीं देना चाहिये

अगर क़ुरबानी या बलि देनी है तो अहंकार, ईर्ष्या, लोभ, क्रोध आदि दुर्गुणों की क़ुरबानी देनी चाहिये। जीवन में हिंसा को बढ़ावा देने वाले विचारो की बलि देनी होगी। एक दूसरे को नीचा दिखाना और अकारण ही किसी को दुःख पाहुछने जैसे विचारो की बलि देनी होगी। तभी हम एक सभ्य और सुन्दर समाज की रचना करने में सफल होंगे और धरती को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनायेंगे।  यही हमारा आने वाली भविष्य की पीढ़ियों को इन बेहतरीन तोहफा होगा।

आइये इस ईद हम सभी एक बेहतरीन इंसान बनने का और समाज में भाईचारा और बंधुत्व की भावना को बढ़ाने का संकल्प ले।
ॐ शांति
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Monday, 21 September 2015

राधाष्टमी का महत्व




हम सभी ने अभी कुछ दिनों पहले श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया। जैसा कि आप जानते हैं कि श्रीमती राधारानी के बिना हमारे श्यामसुंदर कभी पूर्ण नहीं हो सकते। आज श्री कृष्ण के आह्लादिनी शक्ति श्रीमती राधा जी का प्राकट्य दिवस है। भाद्रपद की शुक्लपक्ष अष्टमी के दिन ही राधाजी का इस धराधाम में प्राकट्य हुआ था। कहते है सोमवार के दिन था जब उनका प्राकट्य हुआ और संयोग से इस वर्ष राधाष्टमी सोमवार को ही आयी। यह बहुत ही पवित्र दिन है।  ब्रम्हाजी ने इसका महत्व बताते हुए महान भक्त और वैष्णव श्री नारदजी से कहा कि इस दिन व्रत करने से मनुष्य कभी भी नरक का द्वार नहीं देखता है और लाखो एकदशी व्रत का पुण्य, लाखो गौए दान करने का पुण्य और लाखो गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त होता है और साथ में उसे राधारानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 

आइये हम सभी इस अखिल वन्दनीय श्री राधा नाम की कुछ तात्विक अर्थ समझने की चेष्टा करते है। वैसे तो उनके बारे में मेरी मति में कुछ भी समझने या सोचने की क्षमता नहीं है फिरभी जो कुछ भक्तो और वैष्णवो से प्राप्त हुआ हैं वही आपके साथ साँझा (शेयर) कर रहा हूँ। श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार जो भी कोई कृष्ण राधा को दो मानता है या दो रूपों में देखता है वह नारायण की मूर्ति को दो भागो में खंडित करने का अपराध करता है। राधाजी सदा से ही श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है और सदैव उनका ही रूप है ये सिर्फ लौकिक और माधुर्य लीला के लिए ही २ रूप में दिखाई देते है। वास्तव में तो वह उस परम पुरुष आदि नारायण की ही अभिन्न शक्ति है। 

श्रीकृष्ण की भक्ति को प्राप्त करने वालो के लिए तो राधारानी का महत्व और बढ़ जाता है। इनके प्रसन्न होने से कृष्ण की भक्ति पाना सुनिश्चित हो जाता हैं। श्रीकृष्ण की माधुर्यलीला श्रीमती राधारानी के अपूर्ण है और बिना राधा कृपा से श्रीकृष्ण की कृपा पाना भी असंभव है। वैसे तो श्री भगवन की अनंत शक्तियाँ  और अनंत हैं उनमे से  तीन शक्तियाँ  प्रमुख रूप से है। 

1 . तटस्था शक्ति 
2 . बहिरंगा शक्ति 
3 . अंतरंगा शक्ति 

हम सभी जीव जैसे देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि श्रीभगवान की तटस्था शक्ति हैं और इस ब्रम्हांड में अपने किये कर्मो के अनुसार भिन्न भिन्न तरह के शरीरो में सुख और दुखो का अनुभव करता रहता है। माया के प्रभाव से ये जीवात्मा परमेश्वर से अपने संबंध को भुला बैठा है  दुखी रहता है। 

बहिरंगा शक्ति इस पूरे जगत को और ब्रम्हान्डो को नियंत्रित करने वाली शक्ति है। हम अपने आस-पास जो कुछ भी घटित होते देखते है जैसे सूर्य का निकलना, चन्द्र का निकलना, फसल पकना, फूलो का खिलना, नक्षत्रो और तारो की गति आदि अन्य भौतिक जगत की गतिविधिया ये सभी इसी बहिरंगा शक्ति के द्वारा ही संचालित होती है। इस शक्ति के और भी तीन प्रकार है - सत शक्ति, रज शक्ति और तम शक्ति।

अंतरंगा शक्ति के भी तीन प्रकार होते है।  संगिनी शक्ति अर्थात आधार शक्ति , चित्त शक्ति अर्थात ज्ञान शक्ति और आह्लादिनी शक्ति। आह्लादिनी शक्ति ही श्रीराधा रानी स्वयं है। एक कथा के अनुसार श्री राधा जी के पिता वृषभानु जी वृन्दावन के पास रावलगांव में रहते थे। एक दिन प्रातःकाल यमुना स्नान के लिए गए तो उन्हें एक कमल के पुष्प पर एक स्वर्णकांति से युक्त एक कन्या नदी में बहती हुई अपनी और आती हुई दिखी। उस कन्या का तेज सूर्य किरणों से और भी अधिक आलोकित हो। उनके कोई संतान नहीं थी अतः उन्होंने उसे ईश्वर की कृपा समझकर उसको घर में लाकर उसको पालना शुरू कर दिया। कहते है श्री राधारानी की आँखे जन्म के समय बंद थी और जब कुछ समय बाद यशोदा जी कन्हैया को लेकर वृषभानु जी के घर आई तो उन्होंने पहली बार आँख श्री कृष्ण के सम्मुख ही खोली।

अतः जो भी श्री कृष्ण की कृपा को प्राप्त करना चाहते है उन सभी के लिए श्री राधा जी की कृपा परम आवश्यक है। राधा जी कृपा प्राप्त होते ही भक्ति के मार्ग में कोई अड़चन नहीं आती और भगवन नारायण अति शीघ्र प्रसन्न होते है।

आइये एक बार फिर श्री राधा जी के जन्मोत्सव की आप सभी को बधाई।  जोर से बोलिए जय जय श्री राधे !

ॐ शांति
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Wednesday, 16 September 2015

गणेश चतुर्थी : कैसे मनायें ?



इस बार गणेश चतुर्थी का पर्व १७ सितम्बर , गुरूवार को है। धर्मग्रंथो के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इस दिन जी स्नान, उपवास और दान दिया जाता है, उसका फल श्री गणेश जी की कृपा से कई गुना हो जाता है ऐसा अपने शास्त्रो में वर्णन आता है। इस चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के नाम से पुरे भारतवर्ष में मानते है। कहा जाता है कि  इस दिन भगवन श्री गणेश का व्रत व पूजन करने से मनुष्यों की सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है। 

प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपनी सामर्थ्य और इच्छा के अनुसार सोने,चांदी,पीतल या मिट्टी से बानी भगवान  श्री गणेश की प्रतिमा की स्थापना करे। हालांकि  शास्त्रो मे मिट्टी की बानी प्रतिमा ही श्रेष्ठ मानी गयी है। जिस तरह कण कण में भगवान की कल्पना की गयी है,वह मिट्टी  से ही सार्थक होता है।संकल्प मन्त्र के बाद पुष्प , सिंदूर और गंगाजल आदि से प्रतिमा का पूजन व आरती करन चाहिए। मन्त्र बोलते हुए २१ दूर्वा दल अर्पित करके २१ लड्डुओं का भोग लगाना चाहिये। दूर्वा दल अर्पित करने के समय ये मन्त्र उच्चारण करे।  

ॐ गणाधिपतये नमः  

ॐ उमापुत्राय नमः 

ॐ विघ्ननाशनाय नमः 

ॐ विनायकाय नमः 

ॐ ईशपुत्राय नमः 

ॐ सर्वसिद्धप्रदाय नमः 

ॐ एकदन्ताय नमः 

ॐ इभवक्त्राय नमः 

ॐ मूषकवाहनाय नमः 

ॐ कुमारगुरवे नमः 

इन मंत्रो से पूजा करने से श्री गणेश अति प्रसन्न होते है। कल से गणेश उत्सव प्रारम्भ होने वाला है। घर -घर प्रतिमाओ की पूजन और स्थापना के बाद फिर विसर्जन भी करना होता है। अगर हम मिटटी की बनी प्रतिमाये पूजा में उपयोग में लाये जो की शास्त्रो के अनुसार श्रेष्ठ होती है तो बहुत अच्छा होगा। ऐसा करके हम पर्यावरण को बचने में भी अपना अमूल्य योगदान कर सकते है। 

बहुत ज्यादा ऐश्रव्य प्रदर्शन और शोर शराबे के स्थान पर भाव और भक्ति के साथ पूजन अधिक फलदायी होता है। मैंने देखा हैं कि इधर कई वर्षो से इस त्यौहार में भक्ति रस की कमी महसूस होने लगी है। लोग भद्दे फिल्मी गानो के साथ और नशो के सेवन करके इस त्यौहार को मनाते है जिससे मुझे बहुत पीड़ा का अनुभव होता है। 

मेरी सभी से ये गुजारिश है कि कृपा करके भक्ति के साथ सात्विक भाव में गणेश चतुर्थी मनाये। ईश्वर आप सभी की मनोकामनाए जरूर पूरी करेगा। मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि विश्व में सभी प्राणियों में आनंद और सदभाव की वृद्धि हो। 

ॐ शांति 
9892724426 
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Friday, 11 September 2015

जब श्री बाँके बिहारी जी गवाह बने




अगर आप ने कभी श्री वृन्दावन धाम के दर्शन किये है तो आप श्री बाँके बिहारी जी के प्रेम रस से भीगे बिना नहीं आ सकते। वृन्दावन धाम में भक्ति अपने परम ऐश्वर्य में नित्य निवास करती है। श्री राधा और कृष्ण सदा सर्वदा वृन्दावन धाम में परम आनंद दायक और भक्तो को सुख देने वाली लीलाये करते है। हमारा बाँके  बिहारी तो भक्तो के प्रेम का भूखा है। कोई उसे शुद्ध  प्रेम से बुलाकर देखे तो सही। श्री बिहारी जी महाराज की उपासना प्रेम-रस की उपासना है। वैसे तो कोई भी युग हो हमारे भगवान भक्तो के बीच में सदा ही विराजमान रहते हैं। वे कभी भी एक पल के लिए अपने भक्तो से दूर नहीं होते है।

आज जब मै ये देखता हूँ कि अधिकांश लोग कलियुग की दुहाई देते रहते है और ईश्वर में पूर्ण भरोसा करने में कतराते हैं तब मुझे उन सके प्रति करुणा होती है की कैसे वो हमारे श्री श्याम सुन्दर की कृपा से अनजान रह सकते है। वैसे तो भक्तो और भगवान के बीच में निरंतर ही प्रेम का आदान प्रदान होता रहता है। आज मै श्री बाँकेबिहारी जी से जुडी हुई एक सत्य घटना आपके सामने रखने जा रहा हूँ  हो सकता है आप सभी भक्तो में कई लोग इस घटना से पहले से ही परिचित हो।  फिर भी आइये एकाग्रचित्त होकर हम उनकी लीला का उन्ही की कृपा से वर्णन करने की कोशिश करते है।

बात आज से करीब ८०-९० वर्ष पहले की है। श्रीगोपालदास , जो की पेशे से एक साधारण अध्यापक थे अलीगढ़ में अपने पाँच प्राणियों के परिवार के साथ रहते थे। परिवार में २ पुत्र और १ पुत्री थी।  यूँ  तो उन्होंने अध्ययन करके ज्ञान बहुत अर्जित किया था लेकिन उन्हें ज्यादा पैसा कमाने की ललक नहीं थी। जितना मिलता था उतने में ही परिवार का पालन पोषण मजे में हो रहा था। सभी के साथ मित्रता स्थापित करना उनका एक गुण था और इस तरह काफी बड़े बड़े लोगो के साथ काफी जान पहचान हो गयी थी। उन्हें अपनी मित्र मण्डली और उनसे अपने सम्बन्धो पर पूरा भरोसा था।   लेकिन जब उनको पुत्री का विवाह करने का समय आया तो उनके किसी भी मित्र ने एक पाई की किसी भी तरह की मदद नहीं की।

अब उनके सामने ये प्रश्न था की आखिर कैसे पैसो की व्यवस्था हो। पुत्री के विवाह का दिन तेजी से नजदीक आ रहा था और इधर पैसो की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी।  आखिर कोई रास्ता ना देख कर विवाह के पांच दिन पहले सेठ लक्ष्मीचन्द से मकान गिरवी रख कर पैसो का इंतजाम किया। सेठ लक्ष्मीचन्द बहुत ही बेईमान किस्म का व्यक्ति था वो दो तरह की खाता बही रखता था और अक्सर लोगो से बेईमानी करके उनका मकान सामान  सब हड़प कर लेता था। विवाह के बाद गोपालदास जी ने घोर परिश्रम किया और चार महीने में ही सारा कर्जा सेठ को वापस कर दिया। हालाँकि  इस दौरान उनकी सेहत बहुत बिगड़ गयी।

इधर बेईमान सेठ लक्ष्मीचंद ने अपने वकील के जरिये नोटिस भेजा कि अमुक तारीख तक पूरा पैसा ब्याज सहित वापस कर दो या स्वेच्छा से माकन खाली कर दो , अन्यथा कोर्ट के जरिये कार्यवाही की जाएगी। नोटिस पढ़ते ही जैसे गोपालदास जी के ऊपर तो जैसे वज्रपात हो गया उन्होंने तो कभी कोर्ट में जीवन में कदम नहीं रखा था। उन्हें पता था की न्याय के इन मंदिरो में अन्याय का खुला तांडव होता है। उन्होंने अपने कई मित्रो से मदद मांगी लेकिन कोई भी सेठ लक्ष्मीचंद से व्यर्थ में ही बैर नहीं लेना चाहता था। गोपालदास जी ने स्वयं सेठ लक्ष्मीचंद से मुलाकात की लेकिन उसने उनकी एक न सुनी उल्टा बे-इज्जती भी की और मकान उसके नाम से रजिस्ट्री करने के लिए दबाव बनाया।

सब ओर  से हारने और परेशान होने के बाद उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। संयोग से हरियाली तीज के अवसर पर एक बस वृन्दावन धाम श्री बाँकेबिहारी जी के झूलनोत्सव पर भक्तो को लेकर जा रही थी। उस बस में उनका ही एक शिष्य कंडक्टर था तो मास्टर साहब बिना इस बात का पता लगाये की बस कहाँ जा रही है उस बस में चढ़ गए। खैर उस बस के कंडक्टर ने मास्टर साहब को आवभगत के साथ बैठने का स्थान दिया। इसके पहले मास्टरसाहब ने बाँकेबिहारी  जी के दर्शन कभी नहीं किये थे। यात्रा के दौरान सह यात्रियों ने और कंडक्टर ने श्री बिहारी जी से सम्बंधित चमत्कार और घटनाये मास्टर जी को सुनाई जिससे गोपालदास जी के मन में एक तृप्ति का अनुभव हुआ।

उनके शिष्य ने वृन्दावन पहुचने पर अपने साथ श्री बिहारीजी के मंदिर ले गया और दर्शन कराये। श्री बांके बिहारी जी  के सामने अपने जीवन की डोर सौप कर निश्चिन्त हो गए। जैसे ठाकुर जी की करुणा की वर्षा उन पर होने लगी घर वापस लौटने पर उनके अंदर एक अभूतपूर्व आत्मविश्वास जाग उठा था। बिना किसी वकील की सहयता के वो खुद ही कोर्ट में पहुंचे और अपनी सारी  बात विस्तारपूर्वक जज को सुना दी। उन्होंने किस तारीख में कितनी रकम सेठ को लौटाई थी इन सबका विवरण कोर्ट में दे दिया। लेकिन जब सेठ की खाता-बही देखी गयी तो उसमे पैसे लौटने का कोई विवरण नहीं मिला। क्योकि बेईमान सेठ दो तरह की खाता - बही रखता था। अब जज ने गोपालदास जी से कहा कि अगर तुमने पैसे लौटाए है तो खाता बही में उसका विवरण क्यों नहीं है ? गोपालदास जी ने पुरे आत्मविश्वास के साथ कहा हुजूर मैंने स्वयं अपने हाथो से सारी किस्तें जमा की है। यह सुनकर जज ने कहा कि , "अच्छा , तुम्हारा कोई गवाह है , जो यह कह सके कि मेरे सामने इन्होने रुपये जमा किये है। यदि कोई हो तो नाम बताओ। "

अब वे सोचने लगे कि किसका नाम लिया जाय कौन इस वक़्त काम आ सकता हैं। लेकिन उन्हें किसी मित्र या रिस्तेदार नज़र नहीं आया क्योकि अब उनकी ज़िन्दगी में कोई साथ देने वाला भरोसे का व्यक्ति नहीं रह गया था। इसी उधेड़बुन के बीच सहसा उनके निराश ह्रदय में श्री बांकेबिहारी जी प्रकट हुए जो की त्रिभंग ललित मुद्रा में मुस्करा रहे थे। उन्होंने मन ही मन श्री बांके बिहारी जी वंदना की।  तभी वकील  ने टोका - "हुजूर कोई गवाह का नाम तो बताइये।  पैसे किसके सामने दिए है ?" गोपालदास जी के मुख से सहसा निकल गया - "गवाह का नाम है : श्री बाँकेबिहारी  जी। मैंने जब जब सेठ को पैसे दिए है वो हमेसा मेरे साथ थे।  मेरे पास थे। "

"पूरा पता बोलो।" उनसे पूछा गया।
"वृन्दावन, मथुरा। "
"बाप का नाम क्या है बाँकेबिहारी  जी के ?"
" बाप का नाम  ..... SSS " - गोपालदास जी सकपकाये, फिर अचानक उनके मुख से निकला - "स्वामी हरिदास"

कोर्ट ने फिर बांकेबिहारी के  अगली तारीख में कोर्ट में हाज़िर होने का सम्मन जारी कर दिया।  कोर्ट का चपरासी जब लिखे पते पर सम्मन  लेकर वृन्दावन पहुँचा  तो तक साँवला  सलोना लड़का पास आया और बोला "मै  उनका घर बताता हूँ , तुम कहाँ भटकोगे ?" दोपहर  का समय था।  मंदिर के कपट बंद थे। बालक ने चपरासी को आग्रह करके वो सम्मन द्वार पर चस्पा (चिपका) करवा दिया और कहा की " मै  उनसे कह दूंगा, वह जरूर आवेगा। तुम्हारा काम हो गया , जाओ। "

अब कोर्ट की तारीख में एक दिन शेष था। गोपालदास जी ने घर पर कहा - "मै  वृन्दावन जा रहा हूँ - गवाह तैयार करने, परसो कोर्ट में पेशी है। " यह सुनकर घर में सबने उनका मजाक उड़ाना चालू कर दिया और व्यंग कसने लगे। वे वृन्दावन गए और मन्दिर  में जाकर रो रो कर याचना की - " हे प्रभो, हे स्वामी,  हे अंतर्यामी ! अब मेरी लाज आपके ही हाथ में है। " उनकी  आँखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। जब दर्शन बंद हो गए तो उनकी आँख वही उनकी देहली पर लग गयी और वो  वही सो गये। रात को स्वप्न में स्वयं प्रकट होकर श्रीबिहारीजी ने प्रकट होकर कहा - " चिंता मत करो, गवाही मै दूँगा। "

निश्चित तारीख को कोर्ट में गवाह का नाम २ बार पुकारा गया परन्तु कोई भी जवाब नहीं आया। तीसरी बार जब नाम पुकारा गया तो उत्तर आया - 'हाजिर है'

एक वृद्ध व्यक्ति काले कम्बल में लिपटा हुआ कोर्ट में आया और कठघरे में आकर खड़ा हो गया। मुंसिफ ने पूछा आप इनके गवाह है ? गवाह ने स्वीकृति में सर हिला दिया। मुंसिफ ने फिर से कहा - " मुँह  खोल कर साफ़-साफ़ बयां कीजिये- आपका नाम क्या है ?"

गवाह ने जरा सा मुँह खोलकर मुंसिफ की और देखा और बोला -"बिहारी"
नाम सुनने के साथ साथ जैसे ही मुंसिफ ने श्रीमुख की आभा को देखा उसके हाथ से कलम गिर गयी और वह आगे प्रश्न करना ही भूल गया। फिर गवाह अपने आप ही बोला - "गोपालदास ने जितने भी रूपये लिए थे वो ब्याज सहित वापस कर दिए गए है। यदि आपको इसका प्रमाण चाहिये तो सेठ लक्ष्मीचन्द की गद्दी के सीधे हाथ की और वाली अलमारी के ऊपर के खन में एक पीले रंग की बही रखी है। उसमे सारा रुपया 'दास' के नाम से जमा है। वह दो नंबर की बही है। आपको अधिक तकलीफ न हो, इसके लिए मै  बही के पन्नो की संख्या और दिनांक के अनुसार जमा की गयी राशि बतला रहा हूँ , आप बही माँगा कर मिलान कर ले। " इसके बाद गवाह ने दिनांक र राशि का पूरा विवरण दिया। सेठ लक्ष्मीचंद खड़ा खड़ा थर थर काँप रहा था।

फिर मुंसिफ ने कहा - "तुम बही को पहचान सकते हो?"
"जी हुजूर," गवाह ने उत्तर दिया।

मुंसिफ ने उसी समय दो चपरासी लेकर वकील, लक्ष्मीचंद , गवाह और गोपालदास के साथ लक्ष्मीचंद के मकान पहुँचा। वहाँ  जैसा कुछ गवाह ने बताया था वैसा ही मिला। मुंसिफ ने पलट कर देखा - गवाह अब वहाँ नहीं था। सभी लोग एक अजीब तरह के आश्चर्य भरी निगाहो से एक दूसरे की तरफ देखने लगे और गोपालदास जी की आँखो से प्रेम भरे अश्रुओ की धरा बहने लगी। 

श्री बिहारीजी की अहैतुकी कृपा  के बाद से गोपालदासजी कभी घर नहीं लौटे। न्यायधीश ने भी त्याग-पत्र देकर ,वृन्दावन वास करने का निश्चय किया। इस घटना का बहुत से व्यक्तियों पर ऐसा रंग चढ़ा की बिहारीजी की भक्ति के रस में डूब गए। मेरी यही प्रार्थना है कि  आप सभी के  बांके बिहारी जी का प्रेम रस बरसता रहे। 

बोलो श्री बांकेबिहारी लाल महाराज की जय...  !!!!

फिर मिलेंगे
ॐ शांति।
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Thursday, 10 September 2015

हमारा वास्तविक स्वरुप




अगर आपसे कोई पूछे कि आप कौन है तो तुरंत अपना नाम बता देते है। हम अपनी जाति , अपने कुल, अपने शहर , अपने देश आदि के बारे में भी बता देते है। इतना परिचय इस भौतिक संसार के लिए बहुत है। लेकिन जरा गौर से सोचे तो क्या वाकई में यही हमारी असली पहचान है ? उत्तर होगा -"निश्चित रूप से नहीं " यह तो हमारे शरीर की पहचान है।  वास्तव में इस शरीर के अंदर के अंदर भी एक तत्व हैं  जिसे हम अपनी शुद्ध अवस्था में अनुभव कर सकते है, ध्यान या समाधि  में अनुभव कर सकते है और उसी तत्व को हम आत्मा या जीवात्मा कह कर जानते है। वस्तुतः ये आत्मा ही हमारी असली पहचान है और यही हमारा असली स्वरूप है। बाकी जितनी पहचान या जिनके द्वारा इस जीवन में हमें लोग जानते है वास्तव में वह बहुत अल्प समय के लिए है और हमारी असली पहचान नहीं है। ये नाम , शक्ल, आदि तो शरीर की पहचान है।

दुर्भाग्य से हम में से अधिकांश  लोग इस शरीर को ही अपना असली स्वरुप को ही अपना सच्चा स्वरुप समझ बैठते है और इससे जुड़ी हर चीज के प्रति आशक्त या मोहित रहता है और अज्ञानवश सुख और दुःख का अनुभव करता रहता है। हम यह समझते है कि  हमारा जन्म हो रहा हैं  या हमारी मृत्यु हो रही है , हमारा मान सामान हो रहा हैं या हमारा अपमान हो रहा है लेकिन ये सब तो हमारे शरीर के साथ हो रहा है उससे जीवात्मा को कुछ भी लेना देना नहीं है और हम व्यर्थ में ही इसे अधिक महत्व देकर निरंतर परेसान रहते है।

श्री भगवतगीता में भगवन श्री कृष्ण  स्पष्ट कह रहे है कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, और व्याधियां तो शरीर से जुडी है। हमारा आत्मा तो न कभी जन्म लेता है न इसकी कभी मृत्यु होती है।  यह तो अनादिकाल से अविनाशी है इसका कभी भी विनाश नहीं होता। इसका न तो कभी सम्मान होता है न कभी अपमान होता है। ये अपने शाश्वत रूप में विद्यमान मन रहता है। इस शरीर के द्वारा किये गए कर्मो के अनुसार यह आत्मा विभिन्न विभिन्न शरीरो में वास करता हैं. ये शरीर कुछ भी हो सकता है जैसे मनुष्य, देव, राक्षश , यक्ष, गन्धर्व, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ , कीड़े-मकोड़े आदि आदि। अपने द्वारा किये गए कर्मो के आधार पर ही इस आत्मा को 84 लाख शरीरो में कोई एक शरीर में रहन होता है और यही चक्र अनवरत चालू है। मनुष्य भिन्न-भिन्न शरीरो में पता नहीं लाखो - करोडो जन्मो से कर्म भोग करता आ रहा है।

अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होने से अत्यंत कष्ट में जीता हुआ मनुष्य कभी भी सच्चा आनंद का अनुभव नहीं कर पता। वह जब भी नया शरीर धारण करता हैं  उस देह के प्रति ही आशक्त हो जाता है और पुनः अच्छे-बुरे कर्मो से अपने लिए एक नए शरीर की रुपरेखा तैया कर लेता है। सभी शरीरो में मनुष्य देह सर्वश्रेष्ठ है और इस देह में आत्मा अपने  स्वरुप को किसी सद्गुरु की साहयता से पहचान सकता है और उस परमेश्वर की शरण होकर अनंत आनंद की प्राप्ति कर सकता है। देवता भी इस श्रेष्ठ मनुष्य जीवन की कामना रखते है।

गोस्वामी तुलसीदास जी श्री रामचरित मानस में मनुष्य देह की महिमा को कुछ इस प्रकार लिखते है :

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सब ग्रंथनि गावा।।

अपने सच्चे स्वरुप की पहचान ही आपका अनंत आनंद की तरफ पहला कदम है। ईश्वर की अनुकम्पा से मै फिर आप सब से मिलूंगा।

ॐ शांति।
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Monday, 7 September 2015

जन्माष्टमी का पूर्ण लाभ






प्रिय पाठको, आप अभी को संपूर्ण जगत के आधार श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाये। भगवान श्री कृष्ण हम सभी के जीवन में दिव्य आनंद का संचार करे। मैंने भी इन पिछले दो दिनों में भक्तो के साथ नन्दोत्सव मनाया और आनंद के सागर में डुबकियां लगायी जो कि लिखने में असमर्थ हूँ। 


पिछले लेख में हम चर्चा कर रहे थे कि हम सभी जीव कभी सच्चे अर्थो में स्वतंत्र नहीं हो सकते।  हम किसी न किसी  अधीन ही जीवन जी सकते है। मर्ज़ी आपकी हैं  चाहे तो संसार के दास बन जाओ या फिर प्रभु के दास बन जाओ।क्या कभी आपने सोचा हैं की भगवन को इस मृत्युलोक में , इस धराधाम में क्यों अवतार लेना पड़ा ? जिनकी नेत्रों के सिर्फ एक चितवनमात्र से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का विनाश  हो जाता है फिर उन्हें इन थोड़े से दुष्ट राक्षशो के वध लिये स्वयं आना पड़ा। श्री कृष्ण अवतार पूर्ण परमब्रम्ह अवतार है उनमे और संपूर्ण ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। भगवन कृष्ण संपूर्ण कलाओ के साथ और सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ इस धरा धाम में प्रगट हुए है। 

उनका अवतार हम सभी जीवमात्र के लिए एक करुणा स्वरुप ही हैं। हम सभी को उनकी लीलाओ का श्रवण और पाठन करके आनंद लाभ लेना चाहिये  और उनकी कृपा को प्राप्त करना चाहिए। यह बहुत ही सरल है , हमें सिर्फ उस भगवन कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित होना है और उनसे प्रेम का सम्बन्ध बनाना हैं। अगर इतना सा काम हम में से कोई भी कर लेता है उसके जनम जनम के अगणित कर्मो के बंधन नष्ट हो जाते है और वह शास्वत आनंद का अधिकारी हो जाता है। श्री भगवतगीता के १८वे अध्याय में भगवान कृष्ण स्वयं कहते है :

सर्व धर्म परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज। 
अहं त्वाम सर्व पापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा  सुचः। 

इसका अर्थ है : सभी तरह के कर्मकांडो  और रीति रिवाजो को छोड़  कर सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के शरण में जाइये। वे आपको सभी तरह के पापो से मुक्त कर देंगे , तनिक भी चिंता करो। स्वयं श्री कृष्ण खुद आपको इतना बड़ा वचन दे रहे है फिर भी कोई महामूर्ख ही होगा जो उनकी शरण ग्रहण न करे। 

आप मुझे गलत मत समझे कि मै आपको आपका घर-व्यवसाय छड़ने को कह रहा हूँ।  आप सिर्फ इन २४ घंटो में कुछ घंटे, कुछ मिनट, कुछ सेकंड या कुछ पल भी श्री कृष्ण  को अर्पण करेंगे तो वह तुम्हारा निश्चित रूप में कल्याण करेंगे इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं होना चाहिए। 

अतः सच्ची जन्मष्टमी तभी आपके लिए लाभदायक होगी जब आप कृष्ण को प्रेम करे वह भी बिना किसी स्वार्थ के। अगर प्रेम में स्वार्थ है तो वो प्रेम सच्चा प्रेम नहीं बल्कि व्यापार हो गया। वो तो अपने भक्तो को ,  प्रेमियों को बहुत प्रेम करता है लेकिन एक हम ही है कि हम उसके पास अपनी तरह तरह की इच्छाओ के साथ व मनोकामनाओ को लेकर जाते है और फिर हम सोचते है की हम उसकी भक्ति कर रहे है। लेकिन कुछ मांगने के लिए की गयी भक्ति प्रेम नहीं सिर्फ एक सौदा होती है। अतः बेहतर यही है अपने कन्हैया को हृदय की गहराइयो से प्रेम करो वह आपको अनंत गुना प्रेम से भर देगा। 

आप थोड़ी सी कोशिश करके देखो वो अपनी कृपा आप पर जरूर करेगा। वो तो शुद्ध भक्तो के इंतज़ार में बैठा है की अरे कोई तो आये और उसे सुद्ध प्रेम करे। 

बाकी की बाते फिर कभी। 

ॐ शांति। 
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Wednesday, 2 September 2015

क्या हम सभी जीव स्वतंत्र हो सकते हैं ?



आज का शीर्षक पढ़ कर कुछ लोग के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि ये किस तरह का प्रश्न है ? इस भौतिक संसार के अनुसार आप एक आज़ाद देश के एक आज़ाद नागरिक है लेकिन मेरा मतलब यहाँ इस भौतिक या झूठी स्वतंत्रता से नहीं है। हालांकि अगर भौतिक रूप से भी देखे तो आज भी हमारी मानसिकता गुलामी की ही हैं और हमें अपने देश की तुलना में बाहरी देशो के रीति -रिवाज़ या जीवन पद्धत्ति ज्यादा श्रेष्ठ प्रतीत होती है। खैर छोड़िये इस भौतिक स्वतंत्रता या गुलामी की चर्चा फिर कभी। आज हम विचार करते हैं  कि क्या एक जीव कभी स्वतंत्र हो सकता है ?

हमने अपने पिछले ब्लॉग में जीव के बारे में चर्चा की थी।  वास्तव में इस जगत में हम जितने भी प्राणी देखते हैं कोई भी स्वतंत्र नहीं है। चाहे मनुष्य हो या देवता सभी लोग किसी न किसी के गुलाम अवश्य है। हम वास्तव में कभी भी स्वतंत्र हो ही नहीं सकते। आप जरा ध्यान से सोचिये कि हर मनुष्य चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक स्वतंत्र कोई भी नहीं है। आपको किसी न किसी की तो गुलामी करनी होगी चाहे संसार की कर लो चाहे उस परमपिता ईश्वर की कर लो। आपके पास दोनों विकल्प हैं चाहे संसार के दास बन जाओ चाहे तो हरि  के दास बन जाओ। अगर और गहराई से सोचो तो वैसे भी हम सभी मूलतः हरि  के दास तो है ही सिर्फ माया, अज्ञान और अहंकार के कारण हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते और निरंतर इस नश्वर संसार में अपने संचित कर्मो के बंधन के अनुसार  क्षणिक दुःख और सुख का अनुभव करते रहते है।

बेहतर तो यही होगा कि हम काम , क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, दंभ और मिथ्या घमंड की गुलामी ना कर के हमारे उस नारायण, उस हरि , उस कन्हैया, उस परम आत्मा श्री भगवान की शरणागति हो जाये तो हमें परम आनंद व परम सुख की प्राप्ति संभव हो सकेगी। हमें कुछ अलग से करने की जरुरत नहीं है , हमें सिर्फ हमारा वास्तविक स्वरुप और वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने की जरूरत हैं। हम उस परम सत्ता में पूर्ण समर्पण न करके इस प्रकृति जो कि उस ईश्वर की ही शक्ति का एक विस्तार हैं, को अपने वश में करना चाहते है। हम इस प्रकृति के मालिक होने की चाह कर बैठे हैं और कितने लोग तो अपने को इस संसार में सब सर्वश्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न मानते भी हैं। मुझे तो ऐसे लोगो की स्थिति को देखकर करुणा आती हैं की अगले पल का तो पता नहीं हैं फिरभी न जाने क्यों आज का मानव इस विशाल अनंत शक्तिशाली प्रकृति पर अधिकार करने की कोशिश करता रहता है और यही हमारे दुखो का मूल कारण है।

मेरा अपना निजी अनुभव तो यही कहता है किए उस परमपिता परमेश्वर की पूर्ण शरणागति ही सच्चे सुख का मार्ग है , आनंद का मार्ग हैऔर मुक्ति का मार्ग है। चलिए बाकी  की बाते फिर कभी।

ॐ  शांति
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Monday, 31 August 2015

कष्टों से मुक्ति


इस संसार में सभी कष्टो के मुख्यतः दो कारण  हैं।  एक अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होना और दूसरा अपने आपको पूरी प्रकृति का स्वामी मान बैठना। बाकी अन्य भी कारण  है , लेकिन अगर इन दो चीजो को अच्छे से समझ लिया जाय तो बहुत हद तक कष्टो से राहत हो सकती है।

अगर मै  आपसे पूछता हूँ  कि आपका नाम क्या है ? तो आप उत्तर में अपना नाम बता देंगे। जैसा की आप सभी जानते हैं  की हर वस्तु  का इस संसार में नाम होता हैं लेकिन जिस वस्तु का नाम होता है उसका कुछ आकार या कुछ अलग गुण  जैसे महक, रूप, स्वाद, रंग आदि। लेकिन आप वास्तव  में क्या है ? यह नाम तो आपको अपने परिवार या समाज ने दिया है, जो कि सिर्फ कुछ साल पुराना है और कुछ समय बाद ये भी नहीं रहेगा। तो आप नाम तो हो नहीं। फिर आपका असली पहचान क्या है ? कभी सोचा है ? मेरी समझ से शायद आपने कभी न कभी जरूर सोचा होगा लेकिन फिर सही जवाब न आने या अन्य किन्ही कारणों से आपने इस पर ध्यान नहीं दिया होगा। यही वो असली प्रश्न है जिसका सही उत्तर आने से आपके जीवन की अधिकांश समस्याएं आपने आप हल हो जायेंगी।

विषय थोड़ा गम्भीर है अतः मेरा अनुरोध है बहुत ही ध्यान से पढ़िए। साधारण अर्थों  में तो जो चेहरा आप दर्पण में देखते हो आप उसको ही अपने आपकी पहचान मान बैठते हो। लेकिन ये सत्य नहीं हैं , जो शरीर आपको दिख रहा है वह वास्तव में आप नहीं है यह तो मात्र आवरण (खोल) हैं। इस शरीर के भीतर भी "कुछ" हैं जिसके ना रहने से आपका ये शरीर मृत शरीर में बदल जाता है। उस मृत शरीर की इस दुनिया में कोई कीमत नहीं होती। जैसे ही वो "कुछ" आपके शरीर से निकल गया आप इस दुनिया के लायक नहीं रह जाते। आपका सारा भौतक अस्तित्व सिर्फ उस "कुछ " की वजह से ही हैं। अगर वेदांत या अपने पौराणिक ग्रंथो की भाषा में कहे तो ये "कुछ" को ही हम "जीवात्मा" कहते है।

 वास्तव में हमारी सच्ची पहचान यही है कि हम जीवात्मा हैं और उस परम शक्ति के जिसे हम कुदरत, ईश्वर या भगवान कहते हैं  उसके ही एक अंश मात्र है। यह कुदरत या प्रकृति अनंत शक्ति वाली और अतुलनीय है और वास्तव में यह उस परम पुरुष परमेश्वर की शक्ति स्वरुप ही है। लेकिन हम अज्ञानवश इस प्रकृति के मालिक बनना चाहते है निरंतर परेशानी में जीवन बिताते है। हम व्यर्थ ही मिथ्या अभिमान और अनावश्यक भौतिक संसाधनो को पाने के लिये २४ घंटे परेशान रहते हैं और सच्चे आनंद से वंचित रहते है।

एक बात याद रखिये जब तक इस झूठे और मिथ्या शरीर को सच मानकर भौतिक पदार्थो के पीछे भागेंगे आपको सच्चा आनंद नहीं प्राप्त हो सकता हैं  और आप निरंतर एक जन्म से दूसरे जन्म में कभी भी न पूरे होने वाले चक्र में फ़से रहेंगे और निरंतर इस जगत में कष्ट उठाने को मजबूर रहेंगे। आज के इस लेख में सबसे महत्व की बात यह थी कि  आप ये खाल  और मांस की देहमात्र नहीं हो आप वास्तव में उस परम पिता सच्चिदानंद ईश्वर के एक अंश हो इतना जानना है। बाकि ये जो ऊपर से भिन्न भिन्न खोल दीखते हैं जैसे स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े , पेड़- पौधे दिखाई देते है वास्तव में इन सबके अंदर वही जीवात्मा ही हैं जिसके फलस्वरूप हमें ये सब जीवंत  चलायमान लगते है और उस आत्मा के निकलते ही मृत हो जाते है।  इस जीवन और मरण के चक्र को कैसे तोडा जाये और कैसे जीवन में चरम आनंद पाया जाये ऐसे ही कुछ और विचारो के साथ हम फिर मिलेंगे।


ॐ शांति।
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Friday, 28 August 2015

दुःखो के प्रकार



अब तक हमने भौतिक जीवन के विषय में काफी चर्चा कर ली हैं।  संक्षेप में कहे तो भौतिक जीवन वह जीवन है जिसको हम लोग इस संसार में जी रहे है। हर व्यक्ति किसी न किसी संकट से परेशान है। दुःख की साधारण सी परिभाषा है कि  अपने अनुकूल परिणाम न निकलना और सुख का अर्थ है कि अपने अनुकूल परिणाम प्राप्त कर लेना। इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो यह कह सके कि  वह पूरी तरह से प्रसन्न है और उसे किसी भी प्रकार का दुःख या संकट नहीं है। दुःखो को अगर हम देखे तो मूलतः ३ प्रकार के होते है। पहले प्रकार का कष्ट होता है जैसे किसी रोग से पीड़ित होना, अपना मनचाहा कार्य न होना, इस जगत में सफल न हो पाना, ढंग का रोज़गार न मिलना, लोगो से लड़ाई होना आदि आदि। दूसरा कष्ट जैसे दैवी आपदायें सूखा पड़ना, बाढ़  आना , अतिवृष्टि होना या ओले गिरना, तूफान आना, भूकम्प आना, आंधी आना इन्हे हम प्राकृतिक कष्ट की श्रेणी में रख सकते है।

एक तीसरे प्रकार का कष्ट होता है जिसे हम मानसिक कष्ट कह सकते है। जैसे ईर्ष्या की भावना में जलना, क्रोध में जलना , हमेशा मन में असंतोष से भरे रहना , हमेशा चिंताग्रस्त रहना आदि आदि। मेरी समझ से इन सब दुखो हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। दैवी आपदा का हम कुछ नहीं कर सकते। इसे तो हमें सहन करना ही होगा। दूसरा जो बड़ा कष्ट है की कई बार हम जी तोड़ मेहनत के बाद भी असफल रहते है और फिर कष्ट का अनुभव होता है। हम निराशा और तनाव के शिकार हो जाते है। किसी किसी को बिना किसी अधिक प्रयास के सफलता मिल जाती है। अगर हम थोड़ा हमारे वैदिक ग्रंथो जो की अति प्राचीन है उसमे जा कर अगर इसका कारण खोजे तो हम पायेंगे  कि जो भी सुख या दुःख हम अपने जीवन में भोगते हैं  वह हमारे विगत या पिछले कर्मो का ही फल है। कर्मो का फल तो हर जीवमात्र चाहे मनुष्य हो, पशु हो, कीड़े-मकोड़े हो, या वनस्पतियाँ सभी को भोगना ही पड़ता है।

हम जो भी कुछ आज कर रहे है वह हमारे आने वाले अगले जनम के जीवन का फाउंडेशन (आधार) है। अब प्रश्न उठता है कि किस तरह से हम इस जीवन को आनंदमय बना सकते है। इस जगत का एक सत्य है जो कि  सभी को मालूम है कि  हर जीव को एक निर्धारित समय के बाद एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा करनी पड़ती है। इसी तरह जीव इस भौतिक जगत में एक शरीर से दूसरे शरीरो में कष्टो का भोग करता रहता है। इस संसार का एक नाम दुःखालय भी है जिसमे सभी प्राणी अपने अपने कर्म फलो का भोग कर रहे है। अगर आप अपने कष्टो का परमानेंट इलाज चाहते है तो इस संसार के जन्म और मृत्यू के चक्र से छूटने का उपाय खोजना चाहिये।

लेकिन दुर्भाग्य से हम सभी टेंपरेरी हल ढूंढने में लगे रहते है और वो भी नहीं ढूंढ पाते है। अतः इस जगत में भी हम दुःख भोगते है और कर्मो के फलस्वरूप आगे के जन्मो का फंदा भी हम खुद ही बनाते है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते है कि 4 कष्टो से तो हर जीव परेशान है। जन्म , मृत्यु, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (रोग) ही हर जीव का मुख्य कष्ट है और इनसे मुक्ति का उपाय ही हम सभी को खोजने का प्रयास करना चाहिये। तभी हम सच्चे और हमेशा रुकने वाला यानि कभी भी न समाप्त होने वाला आनंद की प्राप्ति कर सकेंगे।

अतः इन कष्टो से मुक्ति के उपाय हम आगे के लेखो में खोजेंगे।

ॐ  शांति।
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Tuesday, 25 August 2015

दैवी गुण - परोपकार




परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि  अघ माई।

जे न मित्र दुःख होई दुखारी , तिन्ही बिलोकत पातक भारी।

आप सभी ने उपरोक्त पंक्तियाँ जो की परम संत मानस मर्मज्ञ गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित हैं , आपने  बचपन से लेकर अभी तक कही न कही अवश्य पढ़ी होंगी। पहली पंक्ति का अर्थ है की जगत में दुसरो  करना ही सबसे बड़ा धर्म है और दूसरे को कष्ट पहुँचाना ही जगत में सबसे बड़ा पाप हैं। दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि  जो व्यक्ति मित्र के दुःख में दुखी नहीं होता उसके दर्शन ही सबसे पड़ा पाप है। अतः ऐसे व्यक्ति की संगती से बचना चाहिये  जो दूसरे के दुःख में भी दुखी नहीं होता। परोपकार की भावना भी दैवी गुणों के अंतर्गत आती है। जो व्यक्ति परहित के विषय में सोचता है उसका हित ये प्रकृति और ईश्वर अपने आप ही कर देती है। परोपकार करने से जो शांति या आनंद का अनुभव होता है उसका वर्णन करना असंभव है,  उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

हमारा भारतवर्ष महान महापुरुषों की गाथाओ से भरा पड़ा है जो कि आज के समय में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। मह्रिषी दधीचि ने असुर वृत्तासुर जो कि समाज के लिये एक बहुत बड़ा खतरा बन गया था उसके वध के लिए अपने शरीर की हड्डियों का दान कर दिया था। उनके शरीर की हड्डियों से एक गदा का निर्माण किया गया और उसी गदा से उस असुर का संहार हुआ। महाराणा प्रताप, महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह जैसे लोगो ने देशवासियो के लिए पूरा जीवन समर्पण कर दिया। महान संत श्री विनोबा भावे ने भू -दान आंदोलन चलाया और समाज के कितने ही असहाय  लोगो की मदद की।

प्राचीन काल से ही दूसरो  का हित  करना हमारी गौरवमयी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन पश्चिम की भोगवादी संस्कृति ने आज हमारी मानसिकता को गुलाम बना लिया है। जहाँ  त्याग , समर्पण, दान और परोपकार जैसे गुणो से भारत की पहचान होती थी , उसी भारत में अब स्वार्थ और लोभ हावी हो रहा है। हम त्यागवाद से भोगवाद की तरफ निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप आज लोग असंतुष्ट और निराशा से घिरे हुए है। अगर आज भी हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन जिए तो स्वस्थ और आनंदमय जीवन जी सकते है। कुँए  खुदवाना, वृक्ष लगवाना, धर्मशाला निर्माण, दान की परंपरा और आध्यात्मिक ज्ञान हमारी वैदिक सभ्यता की पहचान रहे हैं।

आज जरुरत है कि हम अपनी शक्ति और वैदिक सभ्यता को जाने और समझे। अपने अंदर दैवी गुणों को विकसित करे। जिस तरह स्वामी विवेकानंद के समय भारत विश्व गुरु के पद पर आसीन था वो समय हम आज भी ला सकते है।
ॐ  शांति
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Friday, 21 August 2015

दैवी गुण : क्षमाशीलता और कृतज्ञता



प्रिय पाठक मित्रो , आप सभी को मेरी ओर से राम राम। जब हम एक दूसरे से मिलते है तो राम राम बोलना हमारी भारतीय संस्कृति का एक अति प्राचीन हिस्सा रहा है। अब इक्कीसवी सदी में मै देखता हूँ कि बदलती शिक्षा व्यवस्था और आधुनिकीकरण के कारण  धीरे धीरे हम अपनी संस्कृति से अलग होते जा रहे है। मै बदलाव और विकास का विरोधी नहीं हूँ , लेकिन बदलाव सकारात्मक होना चाहिये। बदलाव का ये अर्थ नहीं कि हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये। अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि हमारी जीवन शैली, हमारा खानपान , हमारा रहने का ढंग और साथ साथ में हमारी मानसिकता भी बदलती जा रही है।

जो भी देश या समाज अपनी संस्कृति के साथ जुड़ा नहीं रह पता है उसका पतन निश्चित है। आज सिर्फ हम शक्ल से भारतीय दिखते है , अक्ल से और सोच से हमारी सोचने की प्रवृत्ति पाश्चात्य चिंतन से प्रभावित होती जा रही है। हमारे जीवन में भोगवाद बढ़ता जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप लालच, ईर्ष्या और मिथ्या दंभ  जैसे दुर्गुण हमारे जीवन में अपना अधिकार बढ़ाते जा रहे है। आज हमें जरुरत हैं हमें अपने अंदर फिर से देवी गुणो  को विकसित करने की। हम यह न भूले हमारे पूर्वज महान ऋषि और ज्ञानी थे।  इसी भारतवर्ष ने दुनिया को ज्ञान का दीपक और जीने का मार्ग दिखलाया है। हमें फिर से अपने मूल में जा कर हमें हमारी असली पहचान और गौरवमयी इतिहास को समझने की जरूरत है नहीं तो  वाली पीढ़ी जिस संकट में जियेगी जिसकी हम आप आज कल्पना भी नहीं सकते।

आज हम दैवी गुण क्षमा और कृतज्ञता पर चर्चा कर रहे है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरषोत्तम भगवन श्री रामचन्द्र ने इस पुण्य भूमि भारत में अवतरित हुए और मानव जीवन के लिए एक सच्चा आदर्श प्रस्तुत किया। अगर हम रामचन्द्र जी की सभी गुणों का वर्णन करना चाहे तो हम पुरे जीवन में भी नहीं समझ सकते क्योकि वो तो दैवी गुणों  के अपार समुद्र है अगर उनके कुछ गुणों को ही हम जीवन में उतार  सके तो भी हमारा जीवन आनंदमय हो सकता हैं  और हमारी ये जीवन यात्रा एक आनंद यात्रा के रूप में परिवर्तित हो सकती है।

भगवान राम का एक महत्वपूर्ण गुण  है की सदा सामने वाले को क्षमा कर देते है और किसी का किया हुआ उपकार वो कभी नही  भूलते हैं। रामचरित मानस में जयंत प्रकरण में राम ने जयंत को क्षमा का दान दिया। रावण का भाई विभीषण जब उनकी सरण में आया तो उन्होंने ने उसे एक भाई की तरह प्रेम दिया। हनुमान जी की सराहना करते हुए प्रभि श्री राम जी कहते है कि इस जन्म में मै  तुम्हारा उपकार नहीं उतार सकता और उन्हें भाई भरत  जैसा प्रेम और पद दिया। कृतज्ञ होना अपने आप में हैक बड़ा दैवी गुण  है।  आज हम कृतज्ञता को पूरी तरह भुला बैठे है। हम दुसरो के उपकारों को बहुत जल्दी भुला देते है और उसको कोई महत्व नहीं देते है। भगवन राम ने जीवन में सभी के उपकारों का ध्यान रखा और हमेसा उपकार करने वाले को प्रेम व  मान सम्मान  भी दिया।

हमारे प्रभु तो शत्रु रावण को भी क्षमा करने को तैयार थे अगर वो उनकी शरणागत हो जाता। उन्होंने हनुमान जी और अंगद के माध्यम से कई बार उस तक सन्देश भेजा। जबकि वो अनंत शक्तिशाली है और रावण का संहार तो पालक झपकते ही कर सकते थे। जब आप सामर्थ्यवान  बलशाली होते हुए भी क्षमाशील और कृतज्ञ रहते है तो ये गुण आपकी शोभा को और बढ़ा  देते है। किसी ने श्री राम जी से पूछा कि  विभीषण को तो आपने लंका का राजा बना दिया है अगर रावण आपकी शरण में आ गया तो क्या देंगे ? प्रभि श्री राम ने तुरंत उत्तर दिया कि  मई उसे अयोध्या का राज्य दे दूंगा। ऐसा उत्तम चरित्र है हमारे श्री राम का जिनके अंदर नम्रता, क्षमाशीलता , कृतज्ञता आदि जैसे गुण  हैं और इन्ही गुणो  के कारण  ही आज वह  विश्व वन्दनीय है।

फिर मिलेंगे कुछ और विचारो के साथ।
ॐ शांति।
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Monday, 17 August 2015

दैवी गुण - नम्रता और विनयशीलता



आनंदमय जीवन और सुखमय जीवन के लिए हमें अपने अंदर कुछ दैवी गुणों को विकसित करने की जरुरत होती है। गीता में श्री कृष्ण जी ने भी इन गुणों का बहुत अच्छी तरह से उल्लेख किया है। सबसे पहले किसी भी इंसान का नम्र होना बहुत मायने रखता है।  नम्र होना  आप में एक बहुत महत्वपूर्ण दैवी गुण  है। अगर आप किसी के साथ नम्र तरीके से पेश आते है तो सामने वाला कितना भी बुरा क्यों न हो आपका कभी अहित नहीं सोचेगा और उसके अंदर आपके प्रति एक विशेष तरह का आदर भाव उत्पन्न होगा। विनम्रता सज्जन व्यक्तियों का आभूषण होता है। विनम्रता मनुष्य में विनय के द्वारा प्रदर्शित होती है।

रामचरित मानस में जब श्रीराम जी को सागर पार लंका  जाने की जरूरत हुई तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक सागर से तीन दिनों तक रास्ता मांगने के लिए विनय किया। हालाँकि उनके अनुज लक्ष्मण उनकी इस बात से सहमत नहीं थे फिर भी राम ने यहाँ पर विनय का मार्ग अपनाया। वैसे तो भगवन श्रीराम बिना विनय के भी सागर पार करने में समर्थ थे जिनके एक भृकटी घुमाने  भर से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का संहार हो जाता है उन प्रभु  श्री राम जी को सागर के समक्ष विनय की क्या आवश्यकता ? लेकिन भगवान ने मानव वेश में खुद विनय कर के हम सभी को यह सन्देश दिया है की जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो हमें विनम्रता युक्त स्वाभाव नहीं छोड़ना चाहिए।  श्री राम जी के विनय करने के बाद भी जान जड़ बुद्धि  सागर ने रास्ता नहीं दिता तब उसके बाद श्री राम ने सागर पर कोप किया। पहले विनय और फिर जब कोई मार्ग न बचे तो फिर क्रोध का सहारा लिया जा सकता है।  यहाँ पर तुलसीदास जी ने बहुत ही सुन्दर लिखा है :

विनय न मानत  जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत। 
बोले राम सकोप तब , भय बिन होए न प्रीति। 

अगर हम अपने इतिहास की तरफ एक नज़र डाले तो हम पाएंगे कि  जो भी महान पुरुष या अवतार हुए है उनमे विनम्रता का गुण सामान रूप से पाया गया है। ऐसे अनेक महापुरुष है जैसे वीर शिवाजी , महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , विनोबा भावे, पूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री आदि आदि यहाँ पर सभी का नाम लिखना संभव नहीं है। हम कितने गौरवशाली है कि हमने इस पुण्य भूमि भारत में जन्म मिला जिस धरा पर अनेक अनेक महापुरुषों ने अवतार लिया। आज हम अपने जीवन में विनम्रता को भूलते जा रहे है। विनम्रता का अर्थ दुर्बलता नहीं है ये तो वीर पुरुषो और सज्जन पुरुषो का गहना है। कभी कभी हम अपने काम को जल्दी या शार्ट कट में करने के चक्कर में विनम्रता से न काम लेकर धमका कर या प्रभाव पूर्वक अपना काम करवाने की चेष्टा करते है और इस कारण अपने जीवन में ढेर साडी आपत्तियों और कष्टो को न्योता देते है। दूसरा एक और महत्वपूर्ण दैवी गुण  है क्षमाशीलता। इस बारे में में हम अपने अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे।

ॐ  शांति।
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Friday, 14 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 8



इस भौतिक जीवन के अनुभवों से संबंधित चर्चा को हम आज और आगे बढ़ाते है। अभी तक इस भौतिक संसार से होने वाले कष्टो व उसके उपायो के बारे में थोड़ी चर्चा हुई है। हम अज्ञान  के कारण इस संसार में दुखमय जीवन बिताने पर मजबूर है। जैसे जैसे हम जीवन को आरामदेह बनाने के लिए भौतिक प्रगति करते जा रहे है और अधिक से अधिक आराम के साजो सामान बढ़ाते जा रहे है , वैसे वैसे हमारे जीवन में ज्ञान, विवेक, नम्रता, क्षमा, शील जैसे सद्गुणों का लोप होता जा रहा है। गीता में भगवन श्री कृष्ण ने इन सभी गुणों को दैवी गुणों के तुल्य बताया है। मगर दुर्भाग्य से आज इन सभी गुणों का बहुत तेजी से पतन होता जा रहा है।  

इन दैवी गुणों के पतन के साथ साथ हम अपने जीवन में आसुरी अथवा राक्षसी गुणों जैसे लालच, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ, जरुरत से ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति आदि गुणों को तेजी से विकसित करते जा रहे है। आज हम प्रतिपल इन दुर्गुणों के साथ ही जी रहे है और कलह से भरा कलुषित जीवन जीने को बाध्य है। हर कोई ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधनो को जुटाने में दिन रात हाड़तोड़ मेहनत  किये जा रहा है। फिर भी आज किसी के जीवन में आनंद नहीं दिखाई देता है , चेहरे पर संतुष्टि  के भाव नज़र नहीं आता हैं। सभी लोग किसी भी तरह से एक कभी न खत्म होने वाली रेस में लगे हुए है और बहुत ही निरीह जीवन बिता रहे है।  

दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था भी नैतिक शिक्षा और हमारे देश के गौरवमयी संस्कृति को हमारे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने  में पूर्णतया विफल साबित हुई है। आज की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ ए. टी. एम. मशीन (धन उगलने वाली मशीन ) तैयार करती नज़र आ रही है।  शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक धन कमाना और अधिक से अधिक भौतिक वस्तुओ का संग्रह मात्र रह गया है। आज की शिक्षा चरित्र निर्माण और मानव निर्माण का कार्य कतई  नहीं कर रही है।  हम अपने आप से दूर होते जा रहे है। हमे ये ही नहीं पता है की हम वास्तव में क्या है और हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है ? पहले हम पढ़ते थे "विद्या ददाति विनयम" अर्थात विद्या विनय देती है लेकिन आज ठीक इससे उल्टा हो रहा है। आज कौन विनम्र है किसमे शील और परोपकार की भावना है ?

आध्यात्मिक जीवन जीना या अपने आपको धार्मिक बनाने से पहले अपने अंदर मानवीय गुणों का विकास कर लो तब भी बहुत सारी  समस्याओ का समाधान हो सकता है।  अगर अपने अंदर परोपकार, क्षमाशीलता और संतोष जैसे सद्गुणों को विकसित कर ले तब भी हम काफी हद तक आनंदमय जीवन का अनुभव कर सकते है।
अगर किसी भी कार्य को करने से पहले हम विवेक पूर्वक विचार करना सीख ले तो भी हमारे जीवन में बहुत सारी परेशानियाँ कम हो सकती है। अपने जीवन में कैसे दैवी गुणों को या मानवीय गुणों को विकसित करे इसकी चर्चा हम अगले लेखो में करेंगे। 

ॐ  शांति। 
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Thursday, 13 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 7



इन दिनों कुछ व्यस्त होने के कारण , आप लोगो से मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए मै  आप सभी से विनम्रता पूर्वक क्षमा मांगता हूँ। हम भौतिक जीवन के बारे  चर्चा कर रहे थे। भौतिक जीवन से संबन्धित कुछ दुखो के बारे में और उस दुःख से मुक्ति के कुछ उपयो पर भी चर्चा कर रहे थे। आइये , आज उसी चर्चा को कुछ आगे बढ़ाते हुए भौतिक जीवन  के दुःखो से मुक्ति के कुछ और उपायों पर गौर करते है।

जीवन में आनंद किसे नहीं चाहिये ? आज इस संसार के प्रत्येक प्राणी को आनंद की तलाश है। देखिये, आनंद भी दो तरह का होता है। एक होता है अल्पकालिक आनंद और दूसरा होता है शास्वत आनंद। अल्पकालिक आनंद की अवधि कुछ निश्चित समय अवधि के लिए होती है और जैसे ही वह समय अवधि समाप्त हुई वह आनंद भी समाप्त हो जाता है। जैसे जो भी भौतिक वस्तु हमारे पास नहीं होती और सहसा वो हमें प्राप्त हो जाती है तो हमें आनंद की अनुभूति होती है लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता है आपका आनंद भी कम  होता जाता हैं। एक बिंदु ऐसा आता है की फिर हमें आनंद का अनुभव बंद हो जाता है और वही स्थिति या वस्तु बोझ प्रतीत होने लगती है। हमने अक्सर लोगो को बोलते सुना है यार ज़िन्दगी बोझ हो गयी है , यार ढो रहे है ज़िन्दगी को, यार कट रही है ज़िन्दगी। अधिकतर सर्व साधन संपन्न लोग भी ऐसी ही शिकायत करते नजर आते है।

हमें कितना भी अपार धन, यश, और अन्य भौतिक साधन प्राप्त हो जाये मगर हमारा आनंद टिकता ही नहीं। कुछ समय बाद फिर उसकी खोज करने लगते है जिससे हमें आनंद मिले। आखिर कब तक आप उस हिरन की तरह इस जनम से दूसरे जन्मो तक आनंद की खोज में यूँ ही भटकते रहोगे? हिरन भी अज्ञानवश अपने अंदर की कस्तूरी की सुगंध को ना जान कर उसकी खोज में जंगल जंगल भटकता रहता  है। हम किसी भी देश में किसी भी पंथ में जन्म ले इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बस हमें अपने सच्चे स्वरुप और अपने अंतिम लक्ष्य की पहचान होनी चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में बहुत सत्य ही लिखा है :

मोह सकल व्याधिन कर मूला।

अर्थात इस भौतिक संसार में मोह (अज्ञान) ही समस्त दुःखो  का एक मात्र मूल कारण  है।  हम सभी को अपने अंदर जो अज्ञान की मोटी मोटी परते जमी हुई है उसे साफ़ करना है। इस  कारण  ही हम सच्चे स्व आनंद को नहीं पहचान पाते। एक बात तो मई पुरे दावे से कह सकता हूँ  कि हम सभी का सच्चा स्वरुप पूर्ण आनंद का ही स्वरुप है लेकिन मोहवश हम इसे इस संसार में खोज रहे है जो कि इस संसार में मिलना संभव ही नहीं है।

मेरा अनुभव रहा है कि अगर आप इस भौतिक जगत में आनंद खोजोगे तो वो सिर्फ अल्पकालिक ही मिलेगा। चाहे जितनी तरक्की के दावे कर लो चाहे जितना उन्नति के दावे कर लो जब तक आप अपने सच्चे स्वरुप और अंतिम लक्ष्य को नहीं पहचान पाते तब तक आप उस शास्वत आनंद को नहीं पा सकते। इस मोह को कैसे दूर किया जा सकता है उन उपयो की चर्चा हम आगे के लेखो में करेंगे।
ॐ शांति
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Thursday, 6 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 6



आप सभी को हमारा प्यार भरा नमस्कार पहुंचे। आशा है कि  आप सभी लोग इस आनंद यात्रा में मेरे साथ आनंद का अनुभव कर रहे होंगे। अगर किसी को किसी भी तरह का कोई सुझाव या कमेंट्स देना है तो बे-झिझक अपनी बात हम तक पंहुचा सकते है। लेख के अंत में मोबाइल नंबर और ईमेल दोनों दिया हुआ है।

अभी तक के लेखो में हमने भौतिक जीवन के कष्टो के बारे में चर्चा की और कुछ उपयो पर विचार किया गया। हम सभी का एकमात्र उद्देश्य उस परम आनंद की प्राप्ति करना है जो कभी नष्ट न हो। इस आनंद की खोज में हम कई कई जन्मो से भटक रहे है। मगर हमें आज तक यह हासिल नहीं हो पाया है। इसका कारण  है की हम इसे गलत जगह में खोज रहे है , हम इस भौतिक संसार के सुख-सुविधाओ में आनंद खोजते है जो की नाशवान है, सदा नहीं रहता है।

हमारी हालत उस छोटे से बच्चे की तरह हो गयी है की  वो एक खिलौने से कुछ समय तक खेलता है और आनंद लेता है मगर उसके टूटते ही फिर दूसरे खिलौनों की खोज में लग जाता है। आखिर कब तक हम इन संसार के नाशवान खिलौनों ( बंगला , गाड़ी , बैंक बैलेंस, सुन्दर औरतो और पुरुषो से संबंध , विलासितापूर्ण साधन) में सुख की खोज करते रहेंगे। इस जीवन की मृग मरीचिका से कभी तो निकलना होगा। कब तक हिरणो की तरह इस संसार के जटिल जंगल में हम यूँ ही भटकते रहेंगे। हम सभी की हालत उस हिरन के जैसे ही है जो अपने अंदर ही छिपी कस्तूरी को नहीं पहचान पता और उस सुगंध को जो उस कस्तूरी से ही आ रही है उसे खोजने के लिए इधर उधर भटकता रहता है। हम भी उस परम सुख की खोज में इस संसार में यहाँ से वहाँ भटकते रहते है।

हमारे कष्टो का भी यही कारण है। हम अपने सच्चे स्वरुप को भूल बैठे है और इस माया से भरे आडम्बर से भरे संसार को सत्य मान कर बैठे है और  आनंद खोजने की चेष्टा कर  रहे है। जिस किसी को भी अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान हो गया ,जिसने भी अपने  पहचान कर ली वो तो मानो आनंद के समुन्दर में गोते लगाने लगा। ये वो आनंद है जो कभी नहीं ख़त्म होने वाला है। हम सभी को अपने अपने स्वरुप को पहचानना होगा तभी हम जीवन में आनंद की प्राप्ति कर सकते है।

अपना सच्चा स्वरुप कैसी पहचाने और भौतिक संसार से सम्बंधित और भी विषयो पर यह चर्चा आगे भी जारी रहेगी। आप सभी हमारे साथ बने रहिये।
ॐ  शांति।
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Wednesday, 5 August 2015

जीवन रहस्य : प्राचीन ग्रंथो का महत्व - भाग 5



हमने अभी तक जीवन को समझने की कोशिश की कि क्यों हम इतना निराशावादी जीवन जीने को मजबूर है क्यों इतना दुःख और तनाव झेलने को मजबूर है।  हमारा आनंद दिन प्रतिदिन काम होता जा रहा है जबकि हम रोज नए अविष्कारों और तरक्की के दावे कर है।  जीवन को आराम देने वाले साधन हमारे पास बहुत है फिर भी हम में  वो आनंद की अनुभूति नहीं हो रही है जो शाश्वत रह सके। कैसे हम शांति पूर्ण और सच्चे आनंद से जीवन जी सकते है इसी विषय को लेकर इस ब्लॉग को लिखा जाता है।

अपने अंतिम लेख में हमने कुछ उपयो की चर्चा की थी कि  अगर हम उस आदि शक्ति परम पुरुष ईश्वर पर विश्वास करे या भरोसा करे और अपने सहज स्वाभाव में जीवन जिए तो बहुत हद तक हमारी तकलीफे कम हो सकती है। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियो, भक्तो और विचारको ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ चिंतन किया और उसे ग्रंथो के रूप में मानव कल्याण के हेतु इस जगत को प्रदान किया। हम बहुत सौभाग्यशाली लोग है की हमारा जन्म भारत की भूमि में हुआ जहाँ पर जीवन दर्शन और सच्चे आनंद से जुड़े हुए पहलुओ पर बहुत गंभीरता से चिंतन हुआ और उसकी आधार पर शास्त्रो और पुराणो की रचना हुई।

हम अपने शास्त्रो , सद्ग्रन्थों और संस्कृति से दूर होते जा रहे है जो कि आज के मानव समाज के कष्टप्रद जीवन होने का मुख्य कारण है। जैसे कोई कंपनी कोई प्रोडक्ट लांच करती है और उसके साथ एक मैन्युअल (छोटी पुस्तिका) भी साथ में देती है। ये मैन्युअल, हमें उस प्रोडक्ट को कैसे उपयोग में  लाना है इस बारे में सहायता करता है। अगर हम बिना मैन्युअल के ही प्रोडक्ट यूज़  करे तो हो सकता है कि हम उसे सही ढंग से यूज़ न कर पाये। उसी तरह ईश्वर ने इस संपूर्ण ब्रम्हांड की रचना की है और उसके साथ वेद , पुराण आदि ग्रंथो की भी रचना की है जिससे हम सही ढंग से आनंदमय जीवन जी सके और इस पृथ्वी और प्रकृति का आनंद ले सके।

वेद इस सृष्टि के आदि ग्रन्थ और खुद ईश्वर के द्वारा रचित है। इन ग्रंथो में जीवन से सम्बंधित सभी पहलुओ पर बहुत विस्तार से चर्चा की गयी है।  दुर्भाग्य से समय के साथ हम  होते चले गए और सच्चे जीवन जीने की कला से भी दूर हो गए। हमारी सनातन संस्कृति में ४ वेद , १८ पुराण और उपनिषदों की रचना हुई है। परन्तु आज हमें इसका ज्ञान नहीं है और हमारे शिक्षा व्यस्था भी ऐसी है की जो कुछ भी ज्ञान बचा हुआ है उसे आने वाली पीढ़ियों  तक इसे नहीं पंहुचा प् रही है।

हमारी पुरातन जीवन जीने की पद्धति विशुद्ध  वैज्ञानिक और प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल रखने पर आधारित थी। आज का आधुनिक विज्ञानं भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुका  है। अमेरिका में स्थित नासा इंस्टिट्यूट ने स्पेस टेक्नोलॉजी कोर्स के लिए संस्कृत अनिवार्य कर दिया है लेकिन हमारे देश में ही लोगो के अपने इस खजाने से दूर रखा जा रहा है और आधुनिक जीवन और दिखावे की जीवन शैली में निरंतर फसते  जा रहे है।

वेदो को हम श्रुति भी कहते है जिसका अर्थ है सुनने वाला ज्ञान। प्राचीन समय में मानव मस्तिष्क  इतना उन्नत था कि वो सुन कर ज्ञान ग्रहण कर सकता था।  फिर पुराणो में कहानी को माध्यम बना कर उसी ज्ञान को कथा के माध्यम से जान सामान्य में आईटी किया गया। लेकिन हमारे परम ज्ञानी और ईश्वर  श्री व्यास जी ने समझ लिया था कि कलियुग के मनुष्यो के पास इतना समय और समझ नहीं होगी कि वो सरे वेद और शास्त्रो को अध्ययन  कर सके और समझ सके। इसलिए उन्होंने श्रीमदभागवतम्  और महाभारत के अंतर्गत श्रीमदभगवद्गीता की रचना की और मह्रिषी वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की। वाल्मीकि कृत रामायण संस्कृत में होने के कारण आज के मनुष्यो को समझने में कठिन थी और उसी कठिनाई को दूर करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी  हिंदी भाषा में रामायण पर आधारित श्री रामचरित मानस काव्य ग्रन्थ की रचना आज से करीब ४५० साल पहले की जो  कि आज जन -जन  में प्रचलित है।

अगर आज हम सिर्फ  रामचरितमानस और भगवद्गीता को ही सही अर्थो में समझ ले और इसके सूत्रों को जीवन में उतार सके तो मेरा दावा हैं कि मानव समाज को अभूतपूर्व लाभ होगा और समाज में सभी लोग आनंदमय जीवन जी सकेंगे।

हम आगे भी आपके साथ कुछ और विचारो को लेकर उपस्थित होंगे तब तक के लिए आप सभी को मंगलकामनाये । 

ॐ शान्ति।
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Monday, 3 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 4

प्रिय पाठको , आप सभी को मेरा प्रणाम। भौतिक जीवन की चर्चा को आज थोड़ा और आगे बढ़ाते है और कुछ अन्य पहलूओ पर चिंतन करते हैं। अंतिम लेख में हमने जाना कि शांतिमय और आनंदमय जीवन जीने में विश्वास की भी अहम भूमिका है। जब तक हमारे जीवन में विश्वास की कमी है तब तक हम अनावश्यक ही व्यर्थ की उलझनों में फँसे रहेंगे।

यहाँ पर मुझे गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस की एक और चौपाई याद आ रही है :

वट विश्वास अचल निज धर्मा।

यहाँ पर बाबा तुलसी हमें एक सफल जीवन का सूत्र देते है कि हर जीव को दृढ़ विश्वास और अपने निज धर्म (स्वभाव) में जिन चाहिये। यहाँ पर धर्म का मतलब कोई विशेष सम्प्रदाय या मजहब से नहीं है , यहाँ पर धर्म का अर्थ है प्रत्येक मानव को अपने मानवीय स्वाभाव के अनुसार आचरण करना चाहिये। अपने स्वाभाव में स्थिर रहिये और संतुष्ट रहिये। इस पुरे ब्रम्हांड में हर जीव चाहे वह जिस तरह की योनि में हो अपने आप में विशिष्ट है यानि खूबियों से भरपूर है लेकिन हम है की अपनी खूबियों को एन्जॉय करने की जगह खुद को हमेशा कोष्टी रहते है और खुद से या जीवन से दुःखी रहते हैं।  हमें जरूरत है अपना नजरिये को बदलने का , देखिये ज़िंदगी कितनी खूबसूरत हो जाती है।

क्या आपने कभी किसी जानवर को शिकायत करते देखा है ? क्या पेड़ पौधे भी कभी अपने आप से खफा होते है ? ये प्रकृति , सूरज, चाँद , सितारे, ग्रहमंडल , ऋतुएँ सब अपने निज धर्म में स्थित है। किसी को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं सिर्फ हम मनुष्यो को ही एक दूसरे से समस्या है। सभी पशु-पक्षी , सूरज , चाँद , सितारे आदि अपने अपने स्वाभाव में है निज धर्म में स्थित है और अपने आप में संतुष्ट है। जब शीतल वायु बहती है , जब बारिश होती है सारी प्रकृति हरी भरी हो कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करती है। कभी मोर को किसी बाज से खफा नहीं होता या कभी कुत्ता अपने से बड़े दूसरे जीव जैसे घोड़े या हठी को देख कर कभी दुखी नहीं होता। हर जीव अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ अपने आप में आनंद में डूबा हुआ है तो फिर हम क्यों दुखी है?

इस पूरे संसार में कोई भी व्यक्ति न तो पूरी तरह से गुणों से भरपूर है और न ही पूरी तरह से अवगुणो से भरपूर है। अगर आपको कोई पूरी तरह से १०० %  भला या बुरा व्यक्ति मिले  भी बताये ,मुझे तो आज तक कोई भी ऐसा इंसान नहीं मिला। कहने का मतलब यही ईश्वर ने जिस तरह से जैसा भी हमें बनाया है हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपने मानवीय स्वाभाव (धर्म) को नहीं  छोड़ना चाहिये। तभी हम तनाव मुक्त जीवन जी सकेंगे।

हमारा मानवीय स्वाभाव क्या है ? इस जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे अनेक प्रश्नो के हल हम आगे ढूंढने की कोशिश करेंगे।

ॐ शांति।
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Sunday, 2 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 3



पिछले लेख में हम लोगो ने भौतिक जीवन के दुःखो के बारे में चर्चा किया था। हमने ये भी पाया कि कही न कही विश्वास के चलते हम अपने जीवन को व्यर्थ की उलझनों में डालते जा रहे है। हम उन घटनाओ के पीछे ज्यादा सोचते है जो की हमारे नियंत्रण में ही नहीं है जैसे अगर आपको यात्रा करनी है तो ड्राइवर पर भरोसा कर के आराम से सफर का मज़ा ले सकते है और अगर आपको ड्राइवर पर भरोसा नहीं है तो आप व्यर्थ की चिंता में पूरे सफर में फंसे रहेंगे। इसी तरह जो घटना तुम्हारे नियंत्रण में ही नहीं है उसे सोच कर भला क्या लाभ ?

रामचरित मानस में तो बहुत साफ शब्दों मे गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते है :

हानि लाभ जीवन मरण , यश अपयश विधि हाथ। 

इसका अर्थ है कि उपरोक्त 6 वस्तुओ पर आपका कोई जोर नहीं है और ये परम पिता परमात्मा की इच्छा पर ही निर्भर है। यहाँ पर मै स्पष्ट कर दूँगा कि जिसे मै परम पिता परमेश्वर , ईश्वर, भगवन, श्री कृष्ण या श्री राम कहूँगा हो सकता है आप में कई लोग उसे कुछ अलग नामो से जानते हो जैसे प्रकृति, अल्लाह, जीसस , वाहे गुरु या किसी अन्य नाम से मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अंततः हम किसी न किसी शक्ति के नियंत्रण में ही है यही सार बात है। आप जिस किसी में भी अपनी श्रद्धा या विश्वास रखते है कृपा करके उसे बनाये रखे।

श्रद्धा या विश्वास की बात आई है तो मई एक छोटा सा उदहारण देना चाहूंगा। एक सर्कस वाला व्यक्ति दो 80 फ़्लोर (मंजिल) वाली इमारतों के सबसे ऊपरी भाग में बीच में एक रस्सी बंधता है और उस पर बैलेंस (संतुलन) बना कर एक ईमारत से दूसरी ईमारत पर जाने का निश्चय करता है और देखने वाली भीड़ से पूछता है की क्या मई ये काम कर सकता हू सब जोर से कहते है "हाँ " , फिर वो अपने दो साथियो को कंधे पर बिठा कर उस रस्सी से एक ईमारत से दूसरे ईमारत तक पार कर के पहुँच  जाता है। उपस्थित भीड़ तालियों से उसे चीयर (अभिवादन) करती है।  अब वो कहता है कि भीड़ में से कोई व्यक्ति रस्सी पर चलने के दौरान उस पर बैठना चाहेगा तो सारी भीड़ में एक सन्नाटा सा छा  जाता है और कोई तैयार नहीं होता।

हमारी और आपकी श्रद्धा और विश्वास का यही हाल है। हम रोज ईश्वर के चमत्कारों और उसके बारे में पुराणो और ग्रंथो में पढ़ते  और सुनते है लेकिन जब खुद के यकीन की बारी आती है तो हमारा विश्वास  या श्रद्धा कही न कही कमजोर हो जाती है। इतना देखने , सुनने या जानने के बाद भी हम उस शक्ति या ईश्वर पर भरोसा नही कर पाते है। अगर हम उस परम शक्ति पर फुल 100 % भरोसा रखे तो हमारी लाइफ कितनी आनंद से भरी हो सकती है।  एक बार उस पर भरोसा कर के तो देखिये …!!!!!

हम आगे भी विचार विमर्श जारी रखेंगे फिर मिलेंगे तब तक के लिए

ॐ  शांति।
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Thursday, 30 July 2015

जीवन रहस्य - भाग-2

जीवन रहस्य - भाग-2

मुझे आप सभी को यह बताते हुए आनंद हो रहा है कि मै आप लोगो तक सफलतापूर्वक पहुंच रहा हूँ। पिछले 2 - 3 दिनों से कई लोगो ने कॉल कर के कांटेक्ट भी किया और आगे भी लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। इन प्यार भरी प्रतिक्रियाओ के लिए मई आप सभी को धन्यवाद देता हूँ। आज गुरु पूर्णिमा का पवन दिन है , आइये हम सभी अपने अपने गुरुजनो के चरणो में श्रद्धाभाव से प्रणाम करते हुए अपनी यात्रा जारी रखते है।

कल हम ने कुछ भौतिक जीवन के बारे में चर्चा शुरू की थी। वर्तमान में हम सभी लोग इस भौतिक जगत में जीवन जी रहे है। किसी से भी पूछो कि  आप कैसे हो ? (How are you ?) तो बड़ा सीधा और रत रटाया जवाब आता है कि मै  ठीक हूँ (I  am fine ). मेरी समझ से ये ही दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है जो हम एक दूसरे से बोलते है। थोड़ा सहज होने के बाद अगर आप फिर से यही प्रश्न करे तो जवाब बहुत अलग आता है। कुछ महान भगवद भक्तो को छोड़ दे तो  मेरा आज तक तो यही अनुभव रहा है की हर आदमी आज दुखी है, तकलीफ में है और चिन्ताओ से निरंतर घिरा हुआ है।  किसी को नौकरी की टेंशन, किसी को पारिवारिक टेंशन , किसी को पडोसी से टेंशन, किसी को अधिक से अधिक धन कमाने की टेंशन , किसी को दुसरो की तरक्की से टेंशन और पता नहीं कितनी कितनी प्रकार की टेंशन ? भगवन बचाये इस तरह की चिन्ताओ से।

अगर शांति से सोचे तो हम किस बात की चिंता करते है ? आने वाले कल की , जिस पर हमारा कोई जोर नहीं है या नियंत्रण नहीं है। फिर भी हम है कि  दिन रात चिंता में घुले जा रहे है। यह जगत कभी किसी के लिए नहीं रुका है और न ही कभी रुकेगा। हम आप रहे या न रहे ये संसार यूँ ही चलता रहेगा तो किस बात की चिंता करे और क्यों करे? जब चिंता करने के लिए एक परम शक्ति जगत का आधार है तो हम क्यों अपन आप को कष्ट देते रहते है। इसका एक ही कारण  है कि हम किसी पर विश्वास नहीं करते ,हम लोगो में भरोसे की कमी हो गयी है और दूसरे भी कारण  है जिन पर हम आगे चर्चा करेंगे। किसी पर भरोसा न होना भी हमारे  दुखो का एक अहम कारण  है। हमारा भरोसा किसी पर भी नहीं है न जीते जागते इंसानो पर और न ही उस परम पिता परम शक्ति ईश्वर पर। एक बात तो सुनिश्चित है कि  अगर हम जीवन में भरोसा करने लग जाये तो बहुत सी समस्याएं अपन ेआप हल हो जाती है।

एक छोटा सा उदहारण देना चाहूंगा कि अगर हम किसी वाहन जैसे ट्रेन , बस, या हवाई जहाज में यात्रा करते है तो हम उसके चालक पर यानि ड्राइवर पर भरोसा करते है। बिना भरोसे के आप एक दिन भी इस संसार में जी ही नहीं सकते। आपको अपने आस पास जो भी  उन पर भरोसा करना ही होता है अगर नहीं करेंगे तो व्यर्थ यानि बिना मतलब की उलझनों को पाल कर अपना जीवन ख़राब करोगे। इसी तरह अगर आप इस संपूर्ण प्रकृति के मालिक, जिसके इशारो पर ये संपूर्ण ब्रम्हांड का सिस्टम चल रहा है उस पर भरोसा नहीं करोगे तो आप इस जगत में कभी भी आनंद और शुकुन से नहीं जी सकते।

ॐ शांति।।
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