Tuesday, 25 August 2015

दैवी गुण - परोपकार




परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि  अघ माई।

जे न मित्र दुःख होई दुखारी , तिन्ही बिलोकत पातक भारी।

आप सभी ने उपरोक्त पंक्तियाँ जो की परम संत मानस मर्मज्ञ गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित हैं , आपने  बचपन से लेकर अभी तक कही न कही अवश्य पढ़ी होंगी। पहली पंक्ति का अर्थ है की जगत में दुसरो  करना ही सबसे बड़ा धर्म है और दूसरे को कष्ट पहुँचाना ही जगत में सबसे बड़ा पाप हैं। दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि  जो व्यक्ति मित्र के दुःख में दुखी नहीं होता उसके दर्शन ही सबसे पड़ा पाप है। अतः ऐसे व्यक्ति की संगती से बचना चाहिये  जो दूसरे के दुःख में भी दुखी नहीं होता। परोपकार की भावना भी दैवी गुणों के अंतर्गत आती है। जो व्यक्ति परहित के विषय में सोचता है उसका हित ये प्रकृति और ईश्वर अपने आप ही कर देती है। परोपकार करने से जो शांति या आनंद का अनुभव होता है उसका वर्णन करना असंभव है,  उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

हमारा भारतवर्ष महान महापुरुषों की गाथाओ से भरा पड़ा है जो कि आज के समय में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। मह्रिषी दधीचि ने असुर वृत्तासुर जो कि समाज के लिये एक बहुत बड़ा खतरा बन गया था उसके वध के लिए अपने शरीर की हड्डियों का दान कर दिया था। उनके शरीर की हड्डियों से एक गदा का निर्माण किया गया और उसी गदा से उस असुर का संहार हुआ। महाराणा प्रताप, महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह जैसे लोगो ने देशवासियो के लिए पूरा जीवन समर्पण कर दिया। महान संत श्री विनोबा भावे ने भू -दान आंदोलन चलाया और समाज के कितने ही असहाय  लोगो की मदद की।

प्राचीन काल से ही दूसरो  का हित  करना हमारी गौरवमयी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन पश्चिम की भोगवादी संस्कृति ने आज हमारी मानसिकता को गुलाम बना लिया है। जहाँ  त्याग , समर्पण, दान और परोपकार जैसे गुणो से भारत की पहचान होती थी , उसी भारत में अब स्वार्थ और लोभ हावी हो रहा है। हम त्यागवाद से भोगवाद की तरफ निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप आज लोग असंतुष्ट और निराशा से घिरे हुए है। अगर आज भी हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन जिए तो स्वस्थ और आनंदमय जीवन जी सकते है। कुँए  खुदवाना, वृक्ष लगवाना, धर्मशाला निर्माण, दान की परंपरा और आध्यात्मिक ज्ञान हमारी वैदिक सभ्यता की पहचान रहे हैं।

आज जरुरत है कि हम अपनी शक्ति और वैदिक सभ्यता को जाने और समझे। अपने अंदर दैवी गुणों को विकसित करे। जिस तरह स्वामी विवेकानंद के समय भारत विश्व गुरु के पद पर आसीन था वो समय हम आज भी ला सकते है।
ॐ  शांति
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com


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