इस भौतिक जीवन के अनुभवों से संबंधित चर्चा को हम आज और आगे बढ़ाते है। अभी तक इस भौतिक संसार से होने वाले कष्टो व उसके उपायो के बारे में थोड़ी चर्चा हुई है। हम अज्ञान के कारण इस संसार में दुखमय जीवन बिताने पर मजबूर है। जैसे जैसे हम जीवन को आरामदेह बनाने के लिए भौतिक प्रगति करते जा रहे है और अधिक से अधिक आराम के साजो सामान बढ़ाते जा रहे है , वैसे वैसे हमारे जीवन में ज्ञान, विवेक, नम्रता, क्षमा, शील जैसे सद्गुणों का लोप होता जा रहा है। गीता में भगवन श्री कृष्ण ने इन सभी गुणों को दैवी गुणों के तुल्य बताया है। मगर दुर्भाग्य से आज इन सभी गुणों का बहुत तेजी से पतन होता जा रहा है।
इन दैवी गुणों के पतन के साथ साथ हम अपने जीवन में आसुरी अथवा राक्षसी गुणों जैसे लालच, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ, जरुरत से ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति आदि गुणों को तेजी से विकसित करते जा रहे है। आज हम प्रतिपल इन दुर्गुणों के साथ ही जी रहे है और कलह से भरा कलुषित जीवन जीने को बाध्य है। हर कोई ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधनो को जुटाने में दिन रात हाड़तोड़ मेहनत किये जा रहा है। फिर भी आज किसी के जीवन में आनंद नहीं दिखाई देता है , चेहरे पर संतुष्टि के भाव नज़र नहीं आता हैं। सभी लोग किसी भी तरह से एक कभी न खत्म होने वाली रेस में लगे हुए है और बहुत ही निरीह जीवन बिता रहे है।
दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था भी नैतिक शिक्षा और हमारे देश के गौरवमयी संस्कृति को हमारे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने में पूर्णतया विफल साबित हुई है। आज की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ ए. टी. एम. मशीन (धन उगलने वाली मशीन ) तैयार करती नज़र आ रही है। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक धन कमाना और अधिक से अधिक भौतिक वस्तुओ का संग्रह मात्र रह गया है। आज की शिक्षा चरित्र निर्माण और मानव निर्माण का कार्य कतई नहीं कर रही है। हम अपने आप से दूर होते जा रहे है। हमे ये ही नहीं पता है की हम वास्तव में क्या है और हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है ? पहले हम पढ़ते थे "विद्या ददाति विनयम" अर्थात विद्या विनय देती है लेकिन आज ठीक इससे उल्टा हो रहा है। आज कौन विनम्र है किसमे शील और परोपकार की भावना है ?
आध्यात्मिक जीवन जीना या अपने आपको धार्मिक बनाने से पहले अपने अंदर मानवीय गुणों का विकास कर लो तब भी बहुत सारी समस्याओ का समाधान हो सकता है। अगर अपने अंदर परोपकार, क्षमाशीलता और संतोष जैसे सद्गुणों को विकसित कर ले तब भी हम काफी हद तक आनंदमय जीवन का अनुभव कर सकते है।
अगर किसी भी कार्य को करने से पहले हम विवेक पूर्वक विचार करना सीख ले तो भी हमारे जीवन में बहुत सारी परेशानियाँ कम हो सकती है। अपने जीवन में कैसे दैवी गुणों को या मानवीय गुणों को विकसित करे इसकी चर्चा हम अगले लेखो में करेंगे।
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