Thursday, 13 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 7



इन दिनों कुछ व्यस्त होने के कारण , आप लोगो से मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए मै  आप सभी से विनम्रता पूर्वक क्षमा मांगता हूँ। हम भौतिक जीवन के बारे  चर्चा कर रहे थे। भौतिक जीवन से संबन्धित कुछ दुखो के बारे में और उस दुःख से मुक्ति के कुछ उपयो पर भी चर्चा कर रहे थे। आइये , आज उसी चर्चा को कुछ आगे बढ़ाते हुए भौतिक जीवन  के दुःखो से मुक्ति के कुछ और उपायों पर गौर करते है।

जीवन में आनंद किसे नहीं चाहिये ? आज इस संसार के प्रत्येक प्राणी को आनंद की तलाश है। देखिये, आनंद भी दो तरह का होता है। एक होता है अल्पकालिक आनंद और दूसरा होता है शास्वत आनंद। अल्पकालिक आनंद की अवधि कुछ निश्चित समय अवधि के लिए होती है और जैसे ही वह समय अवधि समाप्त हुई वह आनंद भी समाप्त हो जाता है। जैसे जो भी भौतिक वस्तु हमारे पास नहीं होती और सहसा वो हमें प्राप्त हो जाती है तो हमें आनंद की अनुभूति होती है लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता है आपका आनंद भी कम  होता जाता हैं। एक बिंदु ऐसा आता है की फिर हमें आनंद का अनुभव बंद हो जाता है और वही स्थिति या वस्तु बोझ प्रतीत होने लगती है। हमने अक्सर लोगो को बोलते सुना है यार ज़िन्दगी बोझ हो गयी है , यार ढो रहे है ज़िन्दगी को, यार कट रही है ज़िन्दगी। अधिकतर सर्व साधन संपन्न लोग भी ऐसी ही शिकायत करते नजर आते है।

हमें कितना भी अपार धन, यश, और अन्य भौतिक साधन प्राप्त हो जाये मगर हमारा आनंद टिकता ही नहीं। कुछ समय बाद फिर उसकी खोज करने लगते है जिससे हमें आनंद मिले। आखिर कब तक आप उस हिरन की तरह इस जनम से दूसरे जन्मो तक आनंद की खोज में यूँ ही भटकते रहोगे? हिरन भी अज्ञानवश अपने अंदर की कस्तूरी की सुगंध को ना जान कर उसकी खोज में जंगल जंगल भटकता रहता  है। हम किसी भी देश में किसी भी पंथ में जन्म ले इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बस हमें अपने सच्चे स्वरुप और अपने अंतिम लक्ष्य की पहचान होनी चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में बहुत सत्य ही लिखा है :

मोह सकल व्याधिन कर मूला।

अर्थात इस भौतिक संसार में मोह (अज्ञान) ही समस्त दुःखो  का एक मात्र मूल कारण  है।  हम सभी को अपने अंदर जो अज्ञान की मोटी मोटी परते जमी हुई है उसे साफ़ करना है। इस  कारण  ही हम सच्चे स्व आनंद को नहीं पहचान पाते। एक बात तो मई पुरे दावे से कह सकता हूँ  कि हम सभी का सच्चा स्वरुप पूर्ण आनंद का ही स्वरुप है लेकिन मोहवश हम इसे इस संसार में खोज रहे है जो कि इस संसार में मिलना संभव ही नहीं है।

मेरा अनुभव रहा है कि अगर आप इस भौतिक जगत में आनंद खोजोगे तो वो सिर्फ अल्पकालिक ही मिलेगा। चाहे जितनी तरक्की के दावे कर लो चाहे जितना उन्नति के दावे कर लो जब तक आप अपने सच्चे स्वरुप और अंतिम लक्ष्य को नहीं पहचान पाते तब तक आप उस शास्वत आनंद को नहीं पा सकते। इस मोह को कैसे दूर किया जा सकता है उन उपयो की चर्चा हम आगे के लेखो में करेंगे।
ॐ शांति
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com

No comments:

Post a Comment