इस संसार में सभी कष्टो के मुख्यतः दो कारण हैं। एक अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होना और दूसरा अपने आपको पूरी प्रकृति का स्वामी मान बैठना। बाकी अन्य भी कारण है , लेकिन अगर इन दो चीजो को अच्छे से समझ लिया जाय तो बहुत हद तक कष्टो से राहत हो सकती है।
अगर मै आपसे पूछता हूँ कि आपका नाम क्या है ? तो आप उत्तर में अपना नाम बता देंगे। जैसा की आप सभी जानते हैं की हर वस्तु का इस संसार में नाम होता हैं लेकिन जिस वस्तु का नाम होता है उसका कुछ आकार या कुछ अलग गुण जैसे महक, रूप, स्वाद, रंग आदि। लेकिन आप वास्तव में क्या है ? यह नाम तो आपको अपने परिवार या समाज ने दिया है, जो कि सिर्फ कुछ साल पुराना है और कुछ समय बाद ये भी नहीं रहेगा। तो आप नाम तो हो नहीं। फिर आपका असली पहचान क्या है ? कभी सोचा है ? मेरी समझ से शायद आपने कभी न कभी जरूर सोचा होगा लेकिन फिर सही जवाब न आने या अन्य किन्ही कारणों से आपने इस पर ध्यान नहीं दिया होगा। यही वो असली प्रश्न है जिसका सही उत्तर आने से आपके जीवन की अधिकांश समस्याएं आपने आप हल हो जायेंगी।
विषय थोड़ा गम्भीर है अतः मेरा अनुरोध है बहुत ही ध्यान से पढ़िए। साधारण अर्थों में तो जो चेहरा आप दर्पण में देखते हो आप उसको ही अपने आपकी पहचान मान बैठते हो। लेकिन ये सत्य नहीं हैं , जो शरीर आपको दिख रहा है वह वास्तव में आप नहीं है यह तो मात्र आवरण (खोल) हैं। इस शरीर के भीतर भी "कुछ" हैं जिसके ना रहने से आपका ये शरीर मृत शरीर में बदल जाता है। उस मृत शरीर की इस दुनिया में कोई कीमत नहीं होती। जैसे ही वो "कुछ" आपके शरीर से निकल गया आप इस दुनिया के लायक नहीं रह जाते। आपका सारा भौतक अस्तित्व सिर्फ उस "कुछ " की वजह से ही हैं। अगर वेदांत या अपने पौराणिक ग्रंथो की भाषा में कहे तो ये "कुछ" को ही हम "जीवात्मा" कहते है।
वास्तव में हमारी सच्ची पहचान यही है कि हम जीवात्मा हैं और उस परम शक्ति के जिसे हम कुदरत, ईश्वर या भगवान कहते हैं उसके ही एक अंश मात्र है। यह कुदरत या प्रकृति अनंत शक्ति वाली और अतुलनीय है और वास्तव में यह उस परम पुरुष परमेश्वर की शक्ति स्वरुप ही है। लेकिन हम अज्ञानवश इस प्रकृति के मालिक बनना चाहते है निरंतर परेशानी में जीवन बिताते है। हम व्यर्थ ही मिथ्या अभिमान और अनावश्यक भौतिक संसाधनो को पाने के लिये २४ घंटे परेशान रहते हैं और सच्चे आनंद से वंचित रहते है।
एक बात याद रखिये जब तक इस झूठे और मिथ्या शरीर को सच मानकर भौतिक पदार्थो के पीछे भागेंगे आपको सच्चा आनंद नहीं प्राप्त हो सकता हैं और आप निरंतर एक जन्म से दूसरे जन्म में कभी भी न पूरे होने वाले चक्र में फ़से रहेंगे और निरंतर इस जगत में कष्ट उठाने को मजबूर रहेंगे। आज के इस लेख में सबसे महत्व की बात यह थी कि आप ये खाल और मांस की देहमात्र नहीं हो आप वास्तव में उस परम पिता सच्चिदानंद ईश्वर के एक अंश हो इतना जानना है। बाकि ये जो ऊपर से भिन्न भिन्न खोल दीखते हैं जैसे स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े , पेड़- पौधे दिखाई देते है वास्तव में इन सबके अंदर वही जीवात्मा ही हैं जिसके फलस्वरूप हमें ये सब जीवंत चलायमान लगते है और उस आत्मा के निकलते ही मृत हो जाते है। इस जीवन और मरण के चक्र को कैसे तोडा जाये और कैसे जीवन में चरम आनंद पाया जाये ऐसे ही कुछ और विचारो के साथ हम फिर मिलेंगे।
ॐ शांति।
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