आप सभी को हमारा प्यार भरा नमस्कार पहुंचे। आशा है कि आप सभी लोग इस आनंद यात्रा में मेरे साथ आनंद का अनुभव कर रहे होंगे। अगर किसी को किसी भी तरह का कोई सुझाव या कमेंट्स देना है तो बे-झिझक अपनी बात हम तक पंहुचा सकते है। लेख के अंत में मोबाइल नंबर और ईमेल दोनों दिया हुआ है।
अभी तक के लेखो में हमने भौतिक जीवन के कष्टो के बारे में चर्चा की और कुछ उपयो पर विचार किया गया। हम सभी का एकमात्र उद्देश्य उस परम आनंद की प्राप्ति करना है जो कभी नष्ट न हो। इस आनंद की खोज में हम कई कई जन्मो से भटक रहे है। मगर हमें आज तक यह हासिल नहीं हो पाया है। इसका कारण है की हम इसे गलत जगह में खोज रहे है , हम इस भौतिक संसार के सुख-सुविधाओ में आनंद खोजते है जो की नाशवान है, सदा नहीं रहता है।
हमारी हालत उस छोटे से बच्चे की तरह हो गयी है की वो एक खिलौने से कुछ समय तक खेलता है और आनंद लेता है मगर उसके टूटते ही फिर दूसरे खिलौनों की खोज में लग जाता है। आखिर कब तक हम इन संसार के नाशवान खिलौनों ( बंगला , गाड़ी , बैंक बैलेंस, सुन्दर औरतो और पुरुषो से संबंध , विलासितापूर्ण साधन) में सुख की खोज करते रहेंगे। इस जीवन की मृग मरीचिका से कभी तो निकलना होगा। कब तक हिरणो की तरह इस संसार के जटिल जंगल में हम यूँ ही भटकते रहेंगे। हम सभी की हालत उस हिरन के जैसे ही है जो अपने अंदर ही छिपी कस्तूरी को नहीं पहचान पता और उस सुगंध को जो उस कस्तूरी से ही आ रही है उसे खोजने के लिए इधर उधर भटकता रहता है। हम भी उस परम सुख की खोज में इस संसार में यहाँ से वहाँ भटकते रहते है।
हमारे कष्टो का भी यही कारण है। हम अपने सच्चे स्वरुप को भूल बैठे है और इस माया से भरे आडम्बर से भरे संसार को सत्य मान कर बैठे है और आनंद खोजने की चेष्टा कर रहे है। जिस किसी को भी अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान हो गया ,जिसने भी अपने पहचान कर ली वो तो मानो आनंद के समुन्दर में गोते लगाने लगा। ये वो आनंद है जो कभी नहीं ख़त्म होने वाला है। हम सभी को अपने अपने स्वरुप को पहचानना होगा तभी हम जीवन में आनंद की प्राप्ति कर सकते है।
अपना सच्चा स्वरुप कैसी पहचाने और भौतिक संसार से सम्बंधित और भी विषयो पर यह चर्चा आगे भी जारी रहेगी। आप सभी हमारे साथ बने रहिये।
ॐ शांति।
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