अब तक हमने भौतिक जीवन के विषय में काफी चर्चा कर ली हैं। संक्षेप में कहे तो भौतिक जीवन वह जीवन है जिसको हम लोग इस संसार में जी रहे है। हर व्यक्ति किसी न किसी संकट से परेशान है। दुःख की साधारण सी परिभाषा है कि अपने अनुकूल परिणाम न निकलना और सुख का अर्थ है कि अपने अनुकूल परिणाम प्राप्त कर लेना। इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो यह कह सके कि वह पूरी तरह से प्रसन्न है और उसे किसी भी प्रकार का दुःख या संकट नहीं है। दुःखो को अगर हम देखे तो मूलतः ३ प्रकार के होते है। पहले प्रकार का कष्ट होता है जैसे किसी रोग से पीड़ित होना, अपना मनचाहा कार्य न होना, इस जगत में सफल न हो पाना, ढंग का रोज़गार न मिलना, लोगो से लड़ाई होना आदि आदि। दूसरा कष्ट जैसे दैवी आपदायें सूखा पड़ना, बाढ़ आना , अतिवृष्टि होना या ओले गिरना, तूफान आना, भूकम्प आना, आंधी आना इन्हे हम प्राकृतिक कष्ट की श्रेणी में रख सकते है।
एक तीसरे प्रकार का कष्ट होता है जिसे हम मानसिक कष्ट कह सकते है। जैसे ईर्ष्या की भावना में जलना, क्रोध में जलना , हमेशा मन में असंतोष से भरे रहना , हमेशा चिंताग्रस्त रहना आदि आदि। मेरी समझ से इन सब दुखो हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। दैवी आपदा का हम कुछ नहीं कर सकते। इसे तो हमें सहन करना ही होगा। दूसरा जो बड़ा कष्ट है की कई बार हम जी तोड़ मेहनत के बाद भी असफल रहते है और फिर कष्ट का अनुभव होता है। हम निराशा और तनाव के शिकार हो जाते है। किसी किसी को बिना किसी अधिक प्रयास के सफलता मिल जाती है। अगर हम थोड़ा हमारे वैदिक ग्रंथो जो की अति प्राचीन है उसमे जा कर अगर इसका कारण खोजे तो हम पायेंगे कि जो भी सुख या दुःख हम अपने जीवन में भोगते हैं वह हमारे विगत या पिछले कर्मो का ही फल है। कर्मो का फल तो हर जीवमात्र चाहे मनुष्य हो, पशु हो, कीड़े-मकोड़े हो, या वनस्पतियाँ सभी को भोगना ही पड़ता है।
हम जो भी कुछ आज कर रहे है वह हमारे आने वाले अगले जनम के जीवन का फाउंडेशन (आधार) है। अब प्रश्न उठता है कि किस तरह से हम इस जीवन को आनंदमय बना सकते है। इस जगत का एक सत्य है जो कि सभी को मालूम है कि हर जीव को एक निर्धारित समय के बाद एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा करनी पड़ती है। इसी तरह जीव इस भौतिक जगत में एक शरीर से दूसरे शरीरो में कष्टो का भोग करता रहता है। इस संसार का एक नाम दुःखालय भी है जिसमे सभी प्राणी अपने अपने कर्म फलो का भोग कर रहे है। अगर आप अपने कष्टो का परमानेंट इलाज चाहते है तो इस संसार के जन्म और मृत्यू के चक्र से छूटने का उपाय खोजना चाहिये।
लेकिन दुर्भाग्य से हम सभी टेंपरेरी हल ढूंढने में लगे रहते है और वो भी नहीं ढूंढ पाते है। अतः इस जगत में भी हम दुःख भोगते है और कर्मो के फलस्वरूप आगे के जन्मो का फंदा भी हम खुद ही बनाते है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते है कि 4 कष्टो से तो हर जीव परेशान है। जन्म , मृत्यु, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (रोग) ही हर जीव का मुख्य कष्ट है और इनसे मुक्ति का उपाय ही हम सभी को खोजने का प्रयास करना चाहिये। तभी हम सच्चे और हमेशा रुकने वाला यानि कभी भी न समाप्त होने वाला आनंद की प्राप्ति कर सकेंगे।
अतः इन कष्टो से मुक्ति के उपाय हम आगे के लेखो में खोजेंगे।
ॐ शांति।
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