हमने अभी तक जीवन को समझने की कोशिश की कि क्यों हम इतना निराशावादी जीवन जीने को मजबूर है क्यों इतना दुःख और तनाव झेलने को मजबूर है। हमारा आनंद दिन प्रतिदिन काम होता जा रहा है जबकि हम रोज नए अविष्कारों और तरक्की के दावे कर है। जीवन को आराम देने वाले साधन हमारे पास बहुत है फिर भी हम में वो आनंद की अनुभूति नहीं हो रही है जो शाश्वत रह सके। कैसे हम शांति पूर्ण और सच्चे आनंद से जीवन जी सकते है इसी विषय को लेकर इस ब्लॉग को लिखा जाता है।
अपने अंतिम लेख में हमने कुछ उपयो की चर्चा की थी कि अगर हम उस आदि शक्ति परम पुरुष ईश्वर पर विश्वास करे या भरोसा करे और अपने सहज स्वाभाव में जीवन जिए तो बहुत हद तक हमारी तकलीफे कम हो सकती है। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियो, भक्तो और विचारको ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ चिंतन किया और उसे ग्रंथो के रूप में मानव कल्याण के हेतु इस जगत को प्रदान किया। हम बहुत सौभाग्यशाली लोग है की हमारा जन्म भारत की भूमि में हुआ जहाँ पर जीवन दर्शन और सच्चे आनंद से जुड़े हुए पहलुओ पर बहुत गंभीरता से चिंतन हुआ और उसकी आधार पर शास्त्रो और पुराणो की रचना हुई।
हम अपने शास्त्रो , सद्ग्रन्थों और संस्कृति से दूर होते जा रहे है जो कि आज के मानव समाज के कष्टप्रद जीवन होने का मुख्य कारण है। जैसे कोई कंपनी कोई प्रोडक्ट लांच करती है और उसके साथ एक मैन्युअल (छोटी पुस्तिका) भी साथ में देती है। ये मैन्युअल, हमें उस प्रोडक्ट को कैसे उपयोग में लाना है इस बारे में सहायता करता है। अगर हम बिना मैन्युअल के ही प्रोडक्ट यूज़ करे तो हो सकता है कि हम उसे सही ढंग से यूज़ न कर पाये। उसी तरह ईश्वर ने इस संपूर्ण ब्रम्हांड की रचना की है और उसके साथ वेद , पुराण आदि ग्रंथो की भी रचना की है जिससे हम सही ढंग से आनंदमय जीवन जी सके और इस पृथ्वी और प्रकृति का आनंद ले सके।
वेद इस सृष्टि के आदि ग्रन्थ और खुद ईश्वर के द्वारा रचित है। इन ग्रंथो में जीवन से सम्बंधित सभी पहलुओ पर बहुत विस्तार से चर्चा की गयी है। दुर्भाग्य से समय के साथ हम होते चले गए और सच्चे जीवन जीने की कला से भी दूर हो गए। हमारी सनातन संस्कृति में ४ वेद , १८ पुराण और उपनिषदों की रचना हुई है। परन्तु आज हमें इसका ज्ञान नहीं है और हमारे शिक्षा व्यस्था भी ऐसी है की जो कुछ भी ज्ञान बचा हुआ है उसे आने वाली पीढ़ियों तक इसे नहीं पंहुचा प् रही है।
हमारी पुरातन जीवन जीने की पद्धति विशुद्ध वैज्ञानिक और प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल रखने पर आधारित थी। आज का आधुनिक विज्ञानं भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है। अमेरिका में स्थित नासा इंस्टिट्यूट ने स्पेस टेक्नोलॉजी कोर्स के लिए संस्कृत अनिवार्य कर दिया है लेकिन हमारे देश में ही लोगो के अपने इस खजाने से दूर रखा जा रहा है और आधुनिक जीवन और दिखावे की जीवन शैली में निरंतर फसते जा रहे है।
वेदो को हम श्रुति भी कहते है जिसका अर्थ है सुनने वाला ज्ञान। प्राचीन समय में मानव मस्तिष्क इतना उन्नत था कि वो सुन कर ज्ञान ग्रहण कर सकता था। फिर पुराणो में कहानी को माध्यम बना कर उसी ज्ञान को कथा के माध्यम से जान सामान्य में आईटी किया गया। लेकिन हमारे परम ज्ञानी और ईश्वर श्री व्यास जी ने समझ लिया था कि कलियुग के मनुष्यो के पास इतना समय और समझ नहीं होगी कि वो सरे वेद और शास्त्रो को अध्ययन कर सके और समझ सके। इसलिए उन्होंने श्रीमदभागवतम् और महाभारत के अंतर्गत श्रीमदभगवद्गीता की रचना की और मह्रिषी वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की। वाल्मीकि कृत रामायण संस्कृत में होने के कारण आज के मनुष्यो को समझने में कठिन थी और उसी कठिनाई को दूर करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी हिंदी भाषा में रामायण पर आधारित श्री रामचरित मानस काव्य ग्रन्थ की रचना आज से करीब ४५० साल पहले की जो कि आज जन -जन में प्रचलित है।
अगर आज हम सिर्फ रामचरितमानस और भगवद्गीता को ही सही अर्थो में समझ ले और इसके सूत्रों को जीवन में उतार सके तो मेरा दावा हैं कि मानव समाज को अभूतपूर्व लाभ होगा और समाज में सभी लोग आनंदमय जीवन जी सकेंगे।
हम आगे भी आपके साथ कुछ और विचारो को लेकर उपस्थित होंगे तब तक के लिए आप सभी को मंगलकामनाये ।
ॐ शान्ति।
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