प्रिय पाठक मित्रो , आप सभी को मेरी ओर से राम राम। जब हम एक दूसरे से मिलते है तो राम राम बोलना हमारी भारतीय संस्कृति का एक अति प्राचीन हिस्सा रहा है। अब इक्कीसवी सदी में मै देखता हूँ कि बदलती शिक्षा व्यवस्था और आधुनिकीकरण के कारण धीरे धीरे हम अपनी संस्कृति से अलग होते जा रहे है। मै बदलाव और विकास का विरोधी नहीं हूँ , लेकिन बदलाव सकारात्मक होना चाहिये। बदलाव का ये अर्थ नहीं कि हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये। अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि हमारी जीवन शैली, हमारा खानपान , हमारा रहने का ढंग और साथ साथ में हमारी मानसिकता भी बदलती जा रही है।
जो भी देश या समाज अपनी संस्कृति के साथ जुड़ा नहीं रह पता है उसका पतन निश्चित है। आज सिर्फ हम शक्ल से भारतीय दिखते है , अक्ल से और सोच से हमारी सोचने की प्रवृत्ति पाश्चात्य चिंतन से प्रभावित होती जा रही है। हमारे जीवन में भोगवाद बढ़ता जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप लालच, ईर्ष्या और मिथ्या दंभ जैसे दुर्गुण हमारे जीवन में अपना अधिकार बढ़ाते जा रहे है। आज हमें जरुरत हैं हमें अपने अंदर फिर से देवी गुणो को विकसित करने की। हम यह न भूले हमारे पूर्वज महान ऋषि और ज्ञानी थे। इसी भारतवर्ष ने दुनिया को ज्ञान का दीपक और जीने का मार्ग दिखलाया है। हमें फिर से अपने मूल में जा कर हमें हमारी असली पहचान और गौरवमयी इतिहास को समझने की जरूरत है नहीं तो वाली पीढ़ी जिस संकट में जियेगी जिसकी हम आप आज कल्पना भी नहीं सकते।
आज हम दैवी गुण क्षमा और कृतज्ञता पर चर्चा कर रहे है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरषोत्तम भगवन श्री रामचन्द्र ने इस पुण्य भूमि भारत में अवतरित हुए और मानव जीवन के लिए एक सच्चा आदर्श प्रस्तुत किया। अगर हम रामचन्द्र जी की सभी गुणों का वर्णन करना चाहे तो हम पुरे जीवन में भी नहीं समझ सकते क्योकि वो तो दैवी गुणों के अपार समुद्र है अगर उनके कुछ गुणों को ही हम जीवन में उतार सके तो भी हमारा जीवन आनंदमय हो सकता हैं और हमारी ये जीवन यात्रा एक आनंद यात्रा के रूप में परिवर्तित हो सकती है।
भगवान राम का एक महत्वपूर्ण गुण है की सदा सामने वाले को क्षमा कर देते है और किसी का किया हुआ उपकार वो कभी नही भूलते हैं। रामचरित मानस में जयंत प्रकरण में राम ने जयंत को क्षमा का दान दिया। रावण का भाई विभीषण जब उनकी सरण में आया तो उन्होंने ने उसे एक भाई की तरह प्रेम दिया। हनुमान जी की सराहना करते हुए प्रभि श्री राम जी कहते है कि इस जन्म में मै तुम्हारा उपकार नहीं उतार सकता और उन्हें भाई भरत जैसा प्रेम और पद दिया। कृतज्ञ होना अपने आप में हैक बड़ा दैवी गुण है। आज हम कृतज्ञता को पूरी तरह भुला बैठे है। हम दुसरो के उपकारों को बहुत जल्दी भुला देते है और उसको कोई महत्व नहीं देते है। भगवन राम ने जीवन में सभी के उपकारों का ध्यान रखा और हमेसा उपकार करने वाले को प्रेम व मान सम्मान भी दिया।
हमारे प्रभु तो शत्रु रावण को भी क्षमा करने को तैयार थे अगर वो उनकी शरणागत हो जाता। उन्होंने हनुमान जी और अंगद के माध्यम से कई बार उस तक सन्देश भेजा। जबकि वो अनंत शक्तिशाली है और रावण का संहार तो पालक झपकते ही कर सकते थे। जब आप सामर्थ्यवान बलशाली होते हुए भी क्षमाशील और कृतज्ञ रहते है तो ये गुण आपकी शोभा को और बढ़ा देते है। किसी ने श्री राम जी से पूछा कि विभीषण को तो आपने लंका का राजा बना दिया है अगर रावण आपकी शरण में आ गया तो क्या देंगे ? प्रभि श्री राम ने तुरंत उत्तर दिया कि मई उसे अयोध्या का राज्य दे दूंगा। ऐसा उत्तम चरित्र है हमारे श्री राम का जिनके अंदर नम्रता, क्षमाशीलता , कृतज्ञता आदि जैसे गुण हैं और इन्ही गुणो के कारण ही आज वह विश्व वन्दनीय है।
फिर मिलेंगे कुछ और विचारो के साथ।
ॐ शांति।
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