आनंदमय जीवन और सुखमय जीवन के लिए हमें अपने अंदर कुछ दैवी गुणों को विकसित करने की जरुरत होती है। गीता में श्री कृष्ण जी ने भी इन गुणों का बहुत अच्छी तरह से उल्लेख किया है। सबसे पहले किसी भी इंसान का नम्र होना बहुत मायने रखता है। नम्र होना आप में एक बहुत महत्वपूर्ण दैवी गुण है। अगर आप किसी के साथ नम्र तरीके से पेश आते है तो सामने वाला कितना भी बुरा क्यों न हो आपका कभी अहित नहीं सोचेगा और उसके अंदर आपके प्रति एक विशेष तरह का आदर भाव उत्पन्न होगा। विनम्रता सज्जन व्यक्तियों का आभूषण होता है। विनम्रता मनुष्य में विनय के द्वारा प्रदर्शित होती है।
रामचरित मानस में जब श्रीराम जी को सागर पार लंका जाने की जरूरत हुई तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक सागर से तीन दिनों तक रास्ता मांगने के लिए विनय किया। हालाँकि उनके अनुज लक्ष्मण उनकी इस बात से सहमत नहीं थे फिर भी राम ने यहाँ पर विनय का मार्ग अपनाया। वैसे तो भगवन श्रीराम बिना विनय के भी सागर पार करने में समर्थ थे जिनके एक भृकटी घुमाने भर से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का संहार हो जाता है उन प्रभु श्री राम जी को सागर के समक्ष विनय की क्या आवश्यकता ? लेकिन भगवान ने मानव वेश में खुद विनय कर के हम सभी को यह सन्देश दिया है की जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो हमें विनम्रता युक्त स्वाभाव नहीं छोड़ना चाहिए। श्री राम जी के विनय करने के बाद भी जान जड़ बुद्धि सागर ने रास्ता नहीं दिता तब उसके बाद श्री राम ने सागर पर कोप किया। पहले विनय और फिर जब कोई मार्ग न बचे तो फिर क्रोध का सहारा लिया जा सकता है। यहाँ पर तुलसीदास जी ने बहुत ही सुन्दर लिखा है :
विनय न मानत जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब , भय बिन होए न प्रीति।
अगर हम अपने इतिहास की तरफ एक नज़र डाले तो हम पाएंगे कि जो भी महान पुरुष या अवतार हुए है उनमे विनम्रता का गुण सामान रूप से पाया गया है। ऐसे अनेक महापुरुष है जैसे वीर शिवाजी , महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , विनोबा भावे, पूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री आदि आदि यहाँ पर सभी का नाम लिखना संभव नहीं है। हम कितने गौरवशाली है कि हमने इस पुण्य भूमि भारत में जन्म मिला जिस धरा पर अनेक अनेक महापुरुषों ने अवतार लिया। आज हम अपने जीवन में विनम्रता को भूलते जा रहे है। विनम्रता का अर्थ दुर्बलता नहीं है ये तो वीर पुरुषो और सज्जन पुरुषो का गहना है। कभी कभी हम अपने काम को जल्दी या शार्ट कट में करने के चक्कर में विनम्रता से न काम लेकर धमका कर या प्रभाव पूर्वक अपना काम करवाने की चेष्टा करते है और इस कारण अपने जीवन में ढेर साडी आपत्तियों और कष्टो को न्योता देते है। दूसरा एक और महत्वपूर्ण दैवी गुण है क्षमाशीलता। इस बारे में में हम अपने अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे।
ॐ शांति।
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