प्रिय पाठको , आप सभी को मेरा प्रणाम। भौतिक जीवन की चर्चा को आज थोड़ा और आगे बढ़ाते है और कुछ अन्य पहलूओ पर चिंतन करते हैं। अंतिम लेख में हमने जाना कि शांतिमय और आनंदमय जीवन जीने में विश्वास की भी अहम भूमिका है। जब तक हमारे जीवन में विश्वास की कमी है तब तक हम अनावश्यक ही व्यर्थ की उलझनों में फँसे रहेंगे।
यहाँ पर मुझे गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस की एक और चौपाई याद आ रही है :
वट विश्वास अचल निज धर्मा।
यहाँ पर बाबा तुलसी हमें एक सफल जीवन का सूत्र देते है कि हर जीव को दृढ़ विश्वास और अपने निज धर्म (स्वभाव) में जिन चाहिये। यहाँ पर धर्म का मतलब कोई विशेष सम्प्रदाय या मजहब से नहीं है , यहाँ पर धर्म का अर्थ है प्रत्येक मानव को अपने मानवीय स्वाभाव के अनुसार आचरण करना चाहिये। अपने स्वाभाव में स्थिर रहिये और संतुष्ट रहिये। इस पुरे ब्रम्हांड में हर जीव चाहे वह जिस तरह की योनि में हो अपने आप में विशिष्ट है यानि खूबियों से भरपूर है लेकिन हम है की अपनी खूबियों को एन्जॉय करने की जगह खुद को हमेशा कोष्टी रहते है और खुद से या जीवन से दुःखी रहते हैं। हमें जरूरत है अपना नजरिये को बदलने का , देखिये ज़िंदगी कितनी खूबसूरत हो जाती है।
क्या आपने कभी किसी जानवर को शिकायत करते देखा है ? क्या पेड़ पौधे भी कभी अपने आप से खफा होते है ? ये प्रकृति , सूरज, चाँद , सितारे, ग्रहमंडल , ऋतुएँ सब अपने निज धर्म में स्थित है। किसी को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं सिर्फ हम मनुष्यो को ही एक दूसरे से समस्या है। सभी पशु-पक्षी , सूरज , चाँद , सितारे आदि अपने अपने स्वाभाव में है निज धर्म में स्थित है और अपने आप में संतुष्ट है। जब शीतल वायु बहती है , जब बारिश होती है सारी प्रकृति हरी भरी हो कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करती है। कभी मोर को किसी बाज से खफा नहीं होता या कभी कुत्ता अपने से बड़े दूसरे जीव जैसे घोड़े या हठी को देख कर कभी दुखी नहीं होता। हर जीव अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ अपने आप में आनंद में डूबा हुआ है तो फिर हम क्यों दुखी है?
इस पूरे संसार में कोई भी व्यक्ति न तो पूरी तरह से गुणों से भरपूर है और न ही पूरी तरह से अवगुणो से भरपूर है। अगर आपको कोई पूरी तरह से १०० % भला या बुरा व्यक्ति मिले भी बताये ,मुझे तो आज तक कोई भी ऐसा इंसान नहीं मिला। कहने का मतलब यही ईश्वर ने जिस तरह से जैसा भी हमें बनाया है हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपने मानवीय स्वाभाव (धर्म) को नहीं छोड़ना चाहिये। तभी हम तनाव मुक्त जीवन जी सकेंगे।
हमारा मानवीय स्वाभाव क्या है ? इस जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे अनेक प्रश्नो के हल हम आगे ढूंढने की कोशिश करेंगे।
ॐ शांति।
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com
यहाँ पर मुझे गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस की एक और चौपाई याद आ रही है :
वट विश्वास अचल निज धर्मा।
यहाँ पर बाबा तुलसी हमें एक सफल जीवन का सूत्र देते है कि हर जीव को दृढ़ विश्वास और अपने निज धर्म (स्वभाव) में जिन चाहिये। यहाँ पर धर्म का मतलब कोई विशेष सम्प्रदाय या मजहब से नहीं है , यहाँ पर धर्म का अर्थ है प्रत्येक मानव को अपने मानवीय स्वाभाव के अनुसार आचरण करना चाहिये। अपने स्वाभाव में स्थिर रहिये और संतुष्ट रहिये। इस पुरे ब्रम्हांड में हर जीव चाहे वह जिस तरह की योनि में हो अपने आप में विशिष्ट है यानि खूबियों से भरपूर है लेकिन हम है की अपनी खूबियों को एन्जॉय करने की जगह खुद को हमेशा कोष्टी रहते है और खुद से या जीवन से दुःखी रहते हैं। हमें जरूरत है अपना नजरिये को बदलने का , देखिये ज़िंदगी कितनी खूबसूरत हो जाती है।
क्या आपने कभी किसी जानवर को शिकायत करते देखा है ? क्या पेड़ पौधे भी कभी अपने आप से खफा होते है ? ये प्रकृति , सूरज, चाँद , सितारे, ग्रहमंडल , ऋतुएँ सब अपने निज धर्म में स्थित है। किसी को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं सिर्फ हम मनुष्यो को ही एक दूसरे से समस्या है। सभी पशु-पक्षी , सूरज , चाँद , सितारे आदि अपने अपने स्वाभाव में है निज धर्म में स्थित है और अपने आप में संतुष्ट है। जब शीतल वायु बहती है , जब बारिश होती है सारी प्रकृति हरी भरी हो कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करती है। कभी मोर को किसी बाज से खफा नहीं होता या कभी कुत्ता अपने से बड़े दूसरे जीव जैसे घोड़े या हठी को देख कर कभी दुखी नहीं होता। हर जीव अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ अपने आप में आनंद में डूबा हुआ है तो फिर हम क्यों दुखी है?
इस पूरे संसार में कोई भी व्यक्ति न तो पूरी तरह से गुणों से भरपूर है और न ही पूरी तरह से अवगुणो से भरपूर है। अगर आपको कोई पूरी तरह से १०० % भला या बुरा व्यक्ति मिले भी बताये ,मुझे तो आज तक कोई भी ऐसा इंसान नहीं मिला। कहने का मतलब यही ईश्वर ने जिस तरह से जैसा भी हमें बनाया है हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपने मानवीय स्वाभाव (धर्म) को नहीं छोड़ना चाहिये। तभी हम तनाव मुक्त जीवन जी सकेंगे।
हमारा मानवीय स्वाभाव क्या है ? इस जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे अनेक प्रश्नो के हल हम आगे ढूंढने की कोशिश करेंगे।
ॐ शांति।
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