आज का शीर्षक पढ़ कर कुछ लोग के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि ये किस तरह का प्रश्न है ? इस भौतिक संसार के अनुसार आप एक आज़ाद देश के एक आज़ाद नागरिक है लेकिन मेरा मतलब यहाँ इस भौतिक या झूठी स्वतंत्रता से नहीं है। हालांकि अगर भौतिक रूप से भी देखे तो आज भी हमारी मानसिकता गुलामी की ही हैं और हमें अपने देश की तुलना में बाहरी देशो के रीति -रिवाज़ या जीवन पद्धत्ति ज्यादा श्रेष्ठ प्रतीत होती है। खैर छोड़िये इस भौतिक स्वतंत्रता या गुलामी की चर्चा फिर कभी। आज हम विचार करते हैं कि क्या एक जीव कभी स्वतंत्र हो सकता है ?
हमने अपने पिछले ब्लॉग में जीव के बारे में चर्चा की थी। वास्तव में इस जगत में हम जितने भी प्राणी देखते हैं कोई भी स्वतंत्र नहीं है। चाहे मनुष्य हो या देवता सभी लोग किसी न किसी के गुलाम अवश्य है। हम वास्तव में कभी भी स्वतंत्र हो ही नहीं सकते। आप जरा ध्यान से सोचिये कि हर मनुष्य चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक स्वतंत्र कोई भी नहीं है। आपको किसी न किसी की तो गुलामी करनी होगी चाहे संसार की कर लो चाहे उस परमपिता ईश्वर की कर लो। आपके पास दोनों विकल्प हैं चाहे संसार के दास बन जाओ चाहे तो हरि के दास बन जाओ। अगर और गहराई से सोचो तो वैसे भी हम सभी मूलतः हरि के दास तो है ही सिर्फ माया, अज्ञान और अहंकार के कारण हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते और निरंतर इस नश्वर संसार में अपने संचित कर्मो के बंधन के अनुसार क्षणिक दुःख और सुख का अनुभव करते रहते है।
बेहतर तो यही होगा कि हम काम , क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, दंभ और मिथ्या घमंड की गुलामी ना कर के हमारे उस नारायण, उस हरि , उस कन्हैया, उस परम आत्मा श्री भगवान की शरणागति हो जाये तो हमें परम आनंद व परम सुख की प्राप्ति संभव हो सकेगी। हमें कुछ अलग से करने की जरुरत नहीं है , हमें सिर्फ हमारा वास्तविक स्वरुप और वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने की जरूरत हैं। हम उस परम सत्ता में पूर्ण समर्पण न करके इस प्रकृति जो कि उस ईश्वर की ही शक्ति का एक विस्तार हैं, को अपने वश में करना चाहते है। हम इस प्रकृति के मालिक होने की चाह कर बैठे हैं और कितने लोग तो अपने को इस संसार में सब सर्वश्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न मानते भी हैं। मुझे तो ऐसे लोगो की स्थिति को देखकर करुणा आती हैं की अगले पल का तो पता नहीं हैं फिरभी न जाने क्यों आज का मानव इस विशाल अनंत शक्तिशाली प्रकृति पर अधिकार करने की कोशिश करता रहता है और यही हमारे दुखो का मूल कारण है।
मेरा अपना निजी अनुभव तो यही कहता है किए उस परमपिता परमेश्वर की पूर्ण शरणागति ही सच्चे सुख का मार्ग है , आनंद का मार्ग हैऔर मुक्ति का मार्ग है। चलिए बाकी की बाते फिर कभी।
ॐ शांति
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