प्रिय पाठको, आप अभी को संपूर्ण जगत के आधार श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाये। भगवान श्री कृष्ण हम सभी के जीवन में दिव्य आनंद का संचार करे। मैंने भी इन पिछले दो दिनों में भक्तो के साथ नन्दोत्सव मनाया और आनंद के सागर में डुबकियां लगायी जो कि लिखने में असमर्थ हूँ।
पिछले लेख में हम चर्चा कर रहे थे कि हम सभी जीव कभी सच्चे अर्थो में स्वतंत्र नहीं हो सकते। हम किसी न किसी अधीन ही जीवन जी सकते है। मर्ज़ी आपकी हैं चाहे तो संसार के दास बन जाओ या फिर प्रभु के दास बन जाओ।क्या कभी आपने सोचा हैं की भगवन को इस मृत्युलोक में , इस धराधाम में क्यों अवतार लेना पड़ा ? जिनकी नेत्रों के सिर्फ एक चितवनमात्र से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का विनाश हो जाता है फिर उन्हें इन थोड़े से दुष्ट राक्षशो के वध लिये स्वयं आना पड़ा। श्री कृष्ण अवतार पूर्ण परमब्रम्ह अवतार है उनमे और संपूर्ण ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। भगवन कृष्ण संपूर्ण कलाओ के साथ और सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ इस धरा धाम में प्रगट हुए है।
उनका अवतार हम सभी जीवमात्र के लिए एक करुणा स्वरुप ही हैं। हम सभी को उनकी लीलाओ का श्रवण और पाठन करके आनंद लाभ लेना चाहिये और उनकी कृपा को प्राप्त करना चाहिए। यह बहुत ही सरल है , हमें सिर्फ उस भगवन कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित होना है और उनसे प्रेम का सम्बन्ध बनाना हैं। अगर इतना सा काम हम में से कोई भी कर लेता है उसके जनम जनम के अगणित कर्मो के बंधन नष्ट हो जाते है और वह शास्वत आनंद का अधिकारी हो जाता है। श्री भगवतगीता के १८वे अध्याय में भगवान कृष्ण स्वयं कहते है :
सर्व धर्म परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज।
अहं त्वाम सर्व पापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा सुचः।
इसका अर्थ है : सभी तरह के कर्मकांडो और रीति रिवाजो को छोड़ कर सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के शरण में जाइये। वे आपको सभी तरह के पापो से मुक्त कर देंगे , तनिक भी चिंता करो। स्वयं श्री कृष्ण खुद आपको इतना बड़ा वचन दे रहे है फिर भी कोई महामूर्ख ही होगा जो उनकी शरण ग्रहण न करे।
आप मुझे गलत मत समझे कि मै आपको आपका घर-व्यवसाय छड़ने को कह रहा हूँ। आप सिर्फ इन २४ घंटो में कुछ घंटे, कुछ मिनट, कुछ सेकंड या कुछ पल भी श्री कृष्ण को अर्पण करेंगे तो वह तुम्हारा निश्चित रूप में कल्याण करेंगे इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं होना चाहिए।
अतः सच्ची जन्मष्टमी तभी आपके लिए लाभदायक होगी जब आप कृष्ण को प्रेम करे वह भी बिना किसी स्वार्थ के। अगर प्रेम में स्वार्थ है तो वो प्रेम सच्चा प्रेम नहीं बल्कि व्यापार हो गया। वो तो अपने भक्तो को , प्रेमियों को बहुत प्रेम करता है लेकिन एक हम ही है कि हम उसके पास अपनी तरह तरह की इच्छाओ के साथ व मनोकामनाओ को लेकर जाते है और फिर हम सोचते है की हम उसकी भक्ति कर रहे है। लेकिन कुछ मांगने के लिए की गयी भक्ति प्रेम नहीं सिर्फ एक सौदा होती है। अतः बेहतर यही है अपने कन्हैया को हृदय की गहराइयो से प्रेम करो वह आपको अनंत गुना प्रेम से भर देगा।
आप थोड़ी सी कोशिश करके देखो वो अपनी कृपा आप पर जरूर करेगा। वो तो शुद्ध भक्तो के इंतज़ार में बैठा है की अरे कोई तो आये और उसे सुद्ध प्रेम करे।
बाकी की बाते फिर कभी।
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