जैसा कि आप सभी लोगो को मालूम है कल हमारे मुस्लिम समाज का एक प्रमुख त्यौहार बकरीद हैं। वैसे तो यह ईद ही है लेकिन बकरो की कुर्बानी देने के कारण इसका नाम बकरीद प्रसिद्ध हो गया। इस त्यौहार की सभी मुस्लिम भाइयो को मुबारकबाद। अगर सही अर्थो में देखा जाय तो त्यौहार मनाने के पीछे हमारा असली मकसद एक दूसरे से मिलना और रोज़ाना की ज़िन्दगी से कुछ वक़्त निकल कर थोड़ा चिंतन करना और आनंद और उन्नति के बारे में सोचना। वक़्त या समय बदलता रहता हैं , काल चक्र अनवरत घूम रहा है और इस के साथ कुछ पुरानी परम्पराये या रीतियाँ जिनसे हम कुछ प्रेरणा ले सकते हैं उन्हें याद रखने के लिये हम जश्न या त्यौहार मनाने की परंपरा रही है।
प्राचीन काल से ही मानव समाज में किसी ना किसी रूप में कुर्बानी या बलि देने की प्रथा रही है। इसके पीछे कई कारण है। अगर आप में से अधिकांश लोग ये मानते हैं की बलि या कुर्बानी से भगवान या अल्लाह खुश होंगे तो ये आप सबकी गलतफहमी है। दुनियाँ के हर धर्म का एक ही मकसद है कि इस दुनियाँ में जितने भी जीवात्माये हैं वो सभी आपस में प्रेम और आनंद के साथ आपसी सामंजस्य के साथ रहे। आज समस्या यही हैं की लोग धर्म की अपने अपने तरह से अर्थ निकाल रहे है और जो ईश्वर , अल्लाह और यीशू का आदेश है वह मानने को तैयार नहीं है। हम अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर हमारे धर्म ग्रंथो की मनगढ़ंत व्याख्याएँ कर रहे है और भोली भाली जनता उनका अंधानुकरण कर रही है।
उन्हें यह नहीं मालुम है कि ये प्रथायें किन परिस्थितियों में चालु हुई थी और उसके पीछे क्या उद्देश्य होता था। अब तो सिर्फ हम अपनी स्वाद की तुष्टि के लिए ही इन प्रथाओ को ज़िंदा रखे हुए है। इसको ही हम धर्म का नाम पर प्रचारित कर रहे है और दिन प्रतिदिन और मजबूत बनाते जा रहे है। भला कौन सा धर्म अनावश्यक मार काट और निरपराध लोगो का क़त्ल करने की अनुमति देगा। धर्म तो जोड़ना सिखाता है ना कि तोड़ना. धर्म का उद्देश्य प्रेम है ना कि हिंसा।
हिन्दू धर्म में भी बलि परम्परा रही है लेकिन समय में प्रायः बहुत कम होती जा रही हैं। अब सांकेतिक बलि जैसे नारियल फोड़ना इत्यादि तरीके से हिंसा से बचा जाता है। ऐसे कार्य नहीं होने चाहिये जिससे रक्तपात और किसी जीव को कष्ट पहुंचे। भला हम किसी मासूम और निर्दोष जीव को मार कर कौन सा पुण्य या नेक काम करेंगे। मानवता और इन्शानियत की यही मांग हैं कि हमें किसी भी जीव को कष्ट पहुंचे ऐसा कार्य या प्रथाओ को बढ़ावा नहीं देना चाहिये
अगर क़ुरबानी या बलि देनी है तो अहंकार, ईर्ष्या, लोभ, क्रोध आदि दुर्गुणों की क़ुरबानी देनी चाहिये। जीवन में हिंसा को बढ़ावा देने वाले विचारो की बलि देनी होगी। एक दूसरे को नीचा दिखाना और अकारण ही किसी को दुःख पाहुछने जैसे विचारो की बलि देनी होगी। तभी हम एक सभ्य और सुन्दर समाज की रचना करने में सफल होंगे और धरती को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनायेंगे। यही हमारा आने वाली भविष्य की पीढ़ियों को इन बेहतरीन तोहफा होगा।
आइये इस ईद हम सभी एक बेहतरीन इंसान बनने का और समाज में भाईचारा और बंधुत्व की भावना को बढ़ाने का संकल्प ले।
ॐ शांति
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