अगर आप ने कभी श्री वृन्दावन धाम के दर्शन किये है तो आप श्री बाँके बिहारी जी के प्रेम रस से भीगे बिना नहीं आ सकते। वृन्दावन धाम में भक्ति अपने परम ऐश्वर्य में नित्य निवास करती है। श्री राधा और कृष्ण सदा सर्वदा वृन्दावन धाम में परम आनंद दायक और भक्तो को सुख देने वाली लीलाये करते है। हमारा बाँके बिहारी तो भक्तो के प्रेम का भूखा है। कोई उसे शुद्ध प्रेम से बुलाकर देखे तो सही। श्री बिहारी जी महाराज की उपासना प्रेम-रस की उपासना है। वैसे तो कोई भी युग हो हमारे भगवान भक्तो के बीच में सदा ही विराजमान रहते हैं। वे कभी भी एक पल के लिए अपने भक्तो से दूर नहीं होते है।
आज जब मै ये देखता हूँ कि अधिकांश लोग कलियुग की दुहाई देते रहते है और ईश्वर में पूर्ण भरोसा करने में कतराते हैं तब मुझे उन सके प्रति करुणा होती है की कैसे वो हमारे श्री श्याम सुन्दर की कृपा से अनजान रह सकते है। वैसे तो भक्तो और भगवान के बीच में निरंतर ही प्रेम का आदान प्रदान होता रहता है। आज मै श्री बाँकेबिहारी जी से जुडी हुई एक सत्य घटना आपके सामने रखने जा रहा हूँ हो सकता है आप सभी भक्तो में कई लोग इस घटना से पहले से ही परिचित हो। फिर भी आइये एकाग्रचित्त होकर हम उनकी लीला का उन्ही की कृपा से वर्णन करने की कोशिश करते है।
बात आज से करीब ८०-९० वर्ष पहले की है। श्रीगोपालदास , जो की पेशे से एक साधारण अध्यापक थे अलीगढ़ में अपने पाँच प्राणियों के परिवार के साथ रहते थे। परिवार में २ पुत्र और १ पुत्री थी। यूँ तो उन्होंने अध्ययन करके ज्ञान बहुत अर्जित किया था लेकिन उन्हें ज्यादा पैसा कमाने की ललक नहीं थी। जितना मिलता था उतने में ही परिवार का पालन पोषण मजे में हो रहा था। सभी के साथ मित्रता स्थापित करना उनका एक गुण था और इस तरह काफी बड़े बड़े लोगो के साथ काफी जान पहचान हो गयी थी। उन्हें अपनी मित्र मण्डली और उनसे अपने सम्बन्धो पर पूरा भरोसा था। लेकिन जब उनको पुत्री का विवाह करने का समय आया तो उनके किसी भी मित्र ने एक पाई की किसी भी तरह की मदद नहीं की।
अब उनके सामने ये प्रश्न था की आखिर कैसे पैसो की व्यवस्था हो। पुत्री के विवाह का दिन तेजी से नजदीक आ रहा था और इधर पैसो की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी। आखिर कोई रास्ता ना देख कर विवाह के पांच दिन पहले सेठ लक्ष्मीचन्द से मकान गिरवी रख कर पैसो का इंतजाम किया। सेठ लक्ष्मीचन्द बहुत ही बेईमान किस्म का व्यक्ति था वो दो तरह की खाता बही रखता था और अक्सर लोगो से बेईमानी करके उनका मकान सामान सब हड़प कर लेता था। विवाह के बाद गोपालदास जी ने घोर परिश्रम किया और चार महीने में ही सारा कर्जा सेठ को वापस कर दिया। हालाँकि इस दौरान उनकी सेहत बहुत बिगड़ गयी।
इधर बेईमान सेठ लक्ष्मीचंद ने अपने वकील के जरिये नोटिस भेजा कि अमुक तारीख तक पूरा पैसा ब्याज सहित वापस कर दो या स्वेच्छा से माकन खाली कर दो , अन्यथा कोर्ट के जरिये कार्यवाही की जाएगी। नोटिस पढ़ते ही जैसे गोपालदास जी के ऊपर तो जैसे वज्रपात हो गया उन्होंने तो कभी कोर्ट में जीवन में कदम नहीं रखा था। उन्हें पता था की न्याय के इन मंदिरो में अन्याय का खुला तांडव होता है। उन्होंने अपने कई मित्रो से मदद मांगी लेकिन कोई भी सेठ लक्ष्मीचंद से व्यर्थ में ही बैर नहीं लेना चाहता था। गोपालदास जी ने स्वयं सेठ लक्ष्मीचंद से मुलाकात की लेकिन उसने उनकी एक न सुनी उल्टा बे-इज्जती भी की और मकान उसके नाम से रजिस्ट्री करने के लिए दबाव बनाया।
सब ओर से हारने और परेशान होने के बाद उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। संयोग से हरियाली तीज के अवसर पर एक बस वृन्दावन धाम श्री बाँकेबिहारी जी के झूलनोत्सव पर भक्तो को लेकर जा रही थी। उस बस में उनका ही एक शिष्य कंडक्टर था तो मास्टर साहब बिना इस बात का पता लगाये की बस कहाँ जा रही है उस बस में चढ़ गए। खैर उस बस के कंडक्टर ने मास्टर साहब को आवभगत के साथ बैठने का स्थान दिया। इसके पहले मास्टरसाहब ने बाँकेबिहारी जी के दर्शन कभी नहीं किये थे। यात्रा के दौरान सह यात्रियों ने और कंडक्टर ने श्री बिहारी जी से सम्बंधित चमत्कार और घटनाये मास्टर जी को सुनाई जिससे गोपालदास जी के मन में एक तृप्ति का अनुभव हुआ।
उनके शिष्य ने वृन्दावन पहुचने पर अपने साथ श्री बिहारीजी के मंदिर ले गया और दर्शन कराये। श्री बांके बिहारी जी के सामने अपने जीवन की डोर सौप कर निश्चिन्त हो गए। जैसे ठाकुर जी की करुणा की वर्षा उन पर होने लगी घर वापस लौटने पर उनके अंदर एक अभूतपूर्व आत्मविश्वास जाग उठा था। बिना किसी वकील की सहयता के वो खुद ही कोर्ट में पहुंचे और अपनी सारी बात विस्तारपूर्वक जज को सुना दी। उन्होंने किस तारीख में कितनी रकम सेठ को लौटाई थी इन सबका विवरण कोर्ट में दे दिया। लेकिन जब सेठ की खाता-बही देखी गयी तो उसमे पैसे लौटने का कोई विवरण नहीं मिला। क्योकि बेईमान सेठ दो तरह की खाता - बही रखता था। अब जज ने गोपालदास जी से कहा कि अगर तुमने पैसे लौटाए है तो खाता बही में उसका विवरण क्यों नहीं है ? गोपालदास जी ने पुरे आत्मविश्वास के साथ कहा हुजूर मैंने स्वयं अपने हाथो से सारी किस्तें जमा की है। यह सुनकर जज ने कहा कि , "अच्छा , तुम्हारा कोई गवाह है , जो यह कह सके कि मेरे सामने इन्होने रुपये जमा किये है। यदि कोई हो तो नाम बताओ। "
अब वे सोचने लगे कि किसका नाम लिया जाय कौन इस वक़्त काम आ सकता हैं। लेकिन उन्हें किसी मित्र या रिस्तेदार नज़र नहीं आया क्योकि अब उनकी ज़िन्दगी में कोई साथ देने वाला भरोसे का व्यक्ति नहीं रह गया था। इसी उधेड़बुन के बीच सहसा उनके निराश ह्रदय में श्री बांकेबिहारी जी प्रकट हुए जो की त्रिभंग ललित मुद्रा में मुस्करा रहे थे। उन्होंने मन ही मन श्री बांके बिहारी जी वंदना की। तभी वकील ने टोका - "हुजूर कोई गवाह का नाम तो बताइये। पैसे किसके सामने दिए है ?" गोपालदास जी के मुख से सहसा निकल गया - "गवाह का नाम है : श्री बाँकेबिहारी जी। मैंने जब जब सेठ को पैसे दिए है वो हमेसा मेरे साथ थे। मेरे पास थे। "
"पूरा पता बोलो।" उनसे पूछा गया।
"वृन्दावन, मथुरा। "
"बाप का नाम क्या है बाँकेबिहारी जी के ?"
" बाप का नाम ..... SSS " - गोपालदास जी सकपकाये, फिर अचानक उनके मुख से निकला - "स्वामी हरिदास"
कोर्ट ने फिर बांकेबिहारी के अगली तारीख में कोर्ट में हाज़िर होने का सम्मन जारी कर दिया। कोर्ट का चपरासी जब लिखे पते पर सम्मन लेकर वृन्दावन पहुँचा तो तक साँवला सलोना लड़का पास आया और बोला "मै उनका घर बताता हूँ , तुम कहाँ भटकोगे ?" दोपहर का समय था। मंदिर के कपट बंद थे। बालक ने चपरासी को आग्रह करके वो सम्मन द्वार पर चस्पा (चिपका) करवा दिया और कहा की " मै उनसे कह दूंगा, वह जरूर आवेगा। तुम्हारा काम हो गया , जाओ। "
अब कोर्ट की तारीख में एक दिन शेष था। गोपालदास जी ने घर पर कहा - "मै वृन्दावन जा रहा हूँ - गवाह तैयार करने, परसो कोर्ट में पेशी है। " यह सुनकर घर में सबने उनका मजाक उड़ाना चालू कर दिया और व्यंग कसने लगे। वे वृन्दावन गए और मन्दिर में जाकर रो रो कर याचना की - " हे प्रभो, हे स्वामी, हे अंतर्यामी ! अब मेरी लाज आपके ही हाथ में है। " उनकी आँखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। जब दर्शन बंद हो गए तो उनकी आँख वही उनकी देहली पर लग गयी और वो वही सो गये। रात को स्वप्न में स्वयं प्रकट होकर श्रीबिहारीजी ने प्रकट होकर कहा - " चिंता मत करो, गवाही मै दूँगा। "
निश्चित तारीख को कोर्ट में गवाह का नाम २ बार पुकारा गया परन्तु कोई भी जवाब नहीं आया। तीसरी बार जब नाम पुकारा गया तो उत्तर आया - 'हाजिर है'
एक वृद्ध व्यक्ति काले कम्बल में लिपटा हुआ कोर्ट में आया और कठघरे में आकर खड़ा हो गया। मुंसिफ ने पूछा आप इनके गवाह है ? गवाह ने स्वीकृति में सर हिला दिया। मुंसिफ ने फिर से कहा - " मुँह खोल कर साफ़-साफ़ बयां कीजिये- आपका नाम क्या है ?"
गवाह ने जरा सा मुँह खोलकर मुंसिफ की और देखा और बोला -"बिहारी"
नाम सुनने के साथ साथ जैसे ही मुंसिफ ने श्रीमुख की आभा को देखा उसके हाथ से कलम गिर गयी और वह आगे प्रश्न करना ही भूल गया। फिर गवाह अपने आप ही बोला - "गोपालदास ने जितने भी रूपये लिए थे वो ब्याज सहित वापस कर दिए गए है। यदि आपको इसका प्रमाण चाहिये तो सेठ लक्ष्मीचन्द की गद्दी के सीधे हाथ की और वाली अलमारी के ऊपर के खन में एक पीले रंग की बही रखी है। उसमे सारा रुपया 'दास' के नाम से जमा है। वह दो नंबर की बही है। आपको अधिक तकलीफ न हो, इसके लिए मै बही के पन्नो की संख्या और दिनांक के अनुसार जमा की गयी राशि बतला रहा हूँ , आप बही माँगा कर मिलान कर ले। " इसके बाद गवाह ने दिनांक र राशि का पूरा विवरण दिया। सेठ लक्ष्मीचंद खड़ा खड़ा थर थर काँप रहा था।
फिर मुंसिफ ने कहा - "तुम बही को पहचान सकते हो?"
"जी हुजूर," गवाह ने उत्तर दिया।
मुंसिफ ने उसी समय दो चपरासी लेकर वकील, लक्ष्मीचंद , गवाह और गोपालदास के साथ लक्ष्मीचंद के मकान पहुँचा। वहाँ जैसा कुछ गवाह ने बताया था वैसा ही मिला। मुंसिफ ने पलट कर देखा - गवाह अब वहाँ नहीं था। सभी लोग एक अजीब तरह के आश्चर्य भरी निगाहो से एक दूसरे की तरफ देखने लगे और गोपालदास जी की आँखो से प्रेम भरे अश्रुओ की धरा बहने लगी।
श्री बिहारीजी की अहैतुकी कृपा के बाद से गोपालदासजी कभी घर नहीं लौटे। न्यायधीश ने भी त्याग-पत्र देकर ,वृन्दावन वास करने का निश्चय किया। इस घटना का बहुत से व्यक्तियों पर ऐसा रंग चढ़ा की बिहारीजी की भक्ति के रस में डूब गए। मेरी यही प्रार्थना है कि आप सभी के बांके बिहारी जी का प्रेम रस बरसता रहे।
बोलो श्री बांकेबिहारी लाल महाराज की जय... !!!!
फिर मिलेंगे
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com
very heart touching but true story, thank you for sharing it...Bolo Bakebihari Lal Ki Jay..
ReplyDeleteHari Vyapak Sarvtra Samana, Prem se Pragat Hoi mai Jana.
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