Thursday, 10 September 2015

हमारा वास्तविक स्वरुप




अगर आपसे कोई पूछे कि आप कौन है तो तुरंत अपना नाम बता देते है। हम अपनी जाति , अपने कुल, अपने शहर , अपने देश आदि के बारे में भी बता देते है। इतना परिचय इस भौतिक संसार के लिए बहुत है। लेकिन जरा गौर से सोचे तो क्या वाकई में यही हमारी असली पहचान है ? उत्तर होगा -"निश्चित रूप से नहीं " यह तो हमारे शरीर की पहचान है।  वास्तव में इस शरीर के अंदर के अंदर भी एक तत्व हैं  जिसे हम अपनी शुद्ध अवस्था में अनुभव कर सकते है, ध्यान या समाधि  में अनुभव कर सकते है और उसी तत्व को हम आत्मा या जीवात्मा कह कर जानते है। वस्तुतः ये आत्मा ही हमारी असली पहचान है और यही हमारा असली स्वरूप है। बाकी जितनी पहचान या जिनके द्वारा इस जीवन में हमें लोग जानते है वास्तव में वह बहुत अल्प समय के लिए है और हमारी असली पहचान नहीं है। ये नाम , शक्ल, आदि तो शरीर की पहचान है।

दुर्भाग्य से हम में से अधिकांश  लोग इस शरीर को ही अपना असली स्वरुप को ही अपना सच्चा स्वरुप समझ बैठते है और इससे जुड़ी हर चीज के प्रति आशक्त या मोहित रहता है और अज्ञानवश सुख और दुःख का अनुभव करता रहता है। हम यह समझते है कि  हमारा जन्म हो रहा हैं  या हमारी मृत्यु हो रही है , हमारा मान सामान हो रहा हैं या हमारा अपमान हो रहा है लेकिन ये सब तो हमारे शरीर के साथ हो रहा है उससे जीवात्मा को कुछ भी लेना देना नहीं है और हम व्यर्थ में ही इसे अधिक महत्व देकर निरंतर परेसान रहते है।

श्री भगवतगीता में भगवन श्री कृष्ण  स्पष्ट कह रहे है कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, और व्याधियां तो शरीर से जुडी है। हमारा आत्मा तो न कभी जन्म लेता है न इसकी कभी मृत्यु होती है।  यह तो अनादिकाल से अविनाशी है इसका कभी भी विनाश नहीं होता। इसका न तो कभी सम्मान होता है न कभी अपमान होता है। ये अपने शाश्वत रूप में विद्यमान मन रहता है। इस शरीर के द्वारा किये गए कर्मो के अनुसार यह आत्मा विभिन्न विभिन्न शरीरो में वास करता हैं. ये शरीर कुछ भी हो सकता है जैसे मनुष्य, देव, राक्षश , यक्ष, गन्धर्व, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ , कीड़े-मकोड़े आदि आदि। अपने द्वारा किये गए कर्मो के आधार पर ही इस आत्मा को 84 लाख शरीरो में कोई एक शरीर में रहन होता है और यही चक्र अनवरत चालू है। मनुष्य भिन्न-भिन्न शरीरो में पता नहीं लाखो - करोडो जन्मो से कर्म भोग करता आ रहा है।

अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होने से अत्यंत कष्ट में जीता हुआ मनुष्य कभी भी सच्चा आनंद का अनुभव नहीं कर पता। वह जब भी नया शरीर धारण करता हैं  उस देह के प्रति ही आशक्त हो जाता है और पुनः अच्छे-बुरे कर्मो से अपने लिए एक नए शरीर की रुपरेखा तैया कर लेता है। सभी शरीरो में मनुष्य देह सर्वश्रेष्ठ है और इस देह में आत्मा अपने  स्वरुप को किसी सद्गुरु की साहयता से पहचान सकता है और उस परमेश्वर की शरण होकर अनंत आनंद की प्राप्ति कर सकता है। देवता भी इस श्रेष्ठ मनुष्य जीवन की कामना रखते है।

गोस्वामी तुलसीदास जी श्री रामचरित मानस में मनुष्य देह की महिमा को कुछ इस प्रकार लिखते है :

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सब ग्रंथनि गावा।।

अपने सच्चे स्वरुप की पहचान ही आपका अनंत आनंद की तरफ पहला कदम है। ईश्वर की अनुकम्पा से मै फिर आप सब से मिलूंगा।

ॐ शांति।
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com 

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