इस बार गणेश चतुर्थी का पर्व १७ सितम्बर , गुरूवार को है। धर्मग्रंथो के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इस दिन जी स्नान, उपवास और दान दिया जाता है, उसका फल श्री गणेश जी की कृपा से कई गुना हो जाता है ऐसा अपने शास्त्रो में वर्णन आता है। इस चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के नाम से पुरे भारतवर्ष में मानते है। कहा जाता है कि इस दिन भगवन श्री गणेश का व्रत व पूजन करने से मनुष्यों की सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है।
प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपनी सामर्थ्य और इच्छा के अनुसार सोने,चांदी,पीतल या मिट्टी से बानी भगवान श्री गणेश की प्रतिमा की स्थापना करे। हालांकि शास्त्रो मे मिट्टी की बानी प्रतिमा ही श्रेष्ठ मानी गयी है। जिस तरह कण कण में भगवान की कल्पना की गयी है,वह मिट्टी से ही सार्थक होता है।संकल्प मन्त्र के बाद पुष्प , सिंदूर और गंगाजल आदि से प्रतिमा का पूजन व आरती करन चाहिए। मन्त्र बोलते हुए २१ दूर्वा दल अर्पित करके २१ लड्डुओं का भोग लगाना चाहिये। दूर्वा दल अर्पित करने के समय ये मन्त्र उच्चारण करे।
ॐ गणाधिपतये नमः
ॐ उमापुत्राय नमः
ॐ विघ्ननाशनाय नमः
ॐ विनायकाय नमः
ॐ ईशपुत्राय नमः
ॐ सर्वसिद्धप्रदाय नमः
ॐ एकदन्ताय नमः
ॐ इभवक्त्राय नमः
ॐ मूषकवाहनाय नमः
ॐ कुमारगुरवे नमः
इन मंत्रो से पूजा करने से श्री गणेश अति प्रसन्न होते है। कल से गणेश उत्सव प्रारम्भ होने वाला है। घर -घर प्रतिमाओ की पूजन और स्थापना के बाद फिर विसर्जन भी करना होता है। अगर हम मिटटी की बनी प्रतिमाये पूजा में उपयोग में लाये जो की शास्त्रो के अनुसार श्रेष्ठ होती है तो बहुत अच्छा होगा। ऐसा करके हम पर्यावरण को बचने में भी अपना अमूल्य योगदान कर सकते है।
बहुत ज्यादा ऐश्रव्य प्रदर्शन और शोर शराबे के स्थान पर भाव और भक्ति के साथ पूजन अधिक फलदायी होता है। मैंने देखा हैं कि इधर कई वर्षो से इस त्यौहार में भक्ति रस की कमी महसूस होने लगी है। लोग भद्दे फिल्मी गानो के साथ और नशो के सेवन करके इस त्यौहार को मनाते है जिससे मुझे बहुत पीड़ा का अनुभव होता है।
मेरी सभी से ये गुजारिश है कि कृपा करके भक्ति के साथ सात्विक भाव में गणेश चतुर्थी मनाये। ईश्वर आप सभी की मनोकामनाए जरूर पूरी करेगा। मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि विश्व में सभी प्राणियों में आनंद और सदभाव की वृद्धि हो।
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