Wednesday, 30 September 2015

मनुष्य जीवन: ईश्वर का वरदान



जब कभी भी आप इस संपूर्ण ब्रम्हांड में सभी जीवो के बारे में विचार करें तो मुख्य रूप से चेतना की दृष्टि से इस भौतिक जगत में इसे दो मुख्य रूपों में बाँट सकते हैं।  एक पशु और दूसरा मनुष्य। वैसे तो जीवो के अनेक प्रकार है जैसे पेड़ पौधे, देव, दानव गन्धर्व आदि अनेक दूसरे लोको के विभिन्न प्रकार के जीव। इस भूमण्डल में मनुष्य एक श्रेष्ठ प्राणी समझा जाता है जब हम इसकी तुलना दूसरे अन्य जीवों से करते है। वनस्पतियाँ या पेड़-पौधे मनुष्य की तुलना में निम्न योंनि वाले जीव होते हैं ये अचल होते है और सिर्फ अपने को पोषित करके इस जगत में अन्य जीवों की भाँति अपने कर्मो का भोग शीत , ग्रीष्म आदि कष्टो को सहते हुए करते हैं। ये जड़ श्रेणी के अंतर्गत आते है।

पशु श्रेणी के अंतर्गत बहुत जीव आते है जो चल सकते हैं और चेतना के कारण सुख और दुःख का अनुभव भी कर सकते है। सभी पशु , पक्षी,कीड़े-मकोड़े आदि अपना समय भोजन,नींद,बच्चे पैदा करने और अपनी सुरक्षा करने में व्यतीत करते है। मुख्य रूप से ये इन चार कामो को ही पूरे जीवन में करते रहते हैं और अपने विगत कर्मो का भोग करते रहते है। इस संसार चक्र से बाहर निकलने की इनकी कोई सम्भावना नहीं होती है।

अब अगर हम मनुष्य की बात करे जिसे सभी जीवो में उन्नत और श्रेष्ठ माना जाता है वह भी भोजन की तलाश, आराम की नींद , बच्चे पैदा करना और अपनी सुरक्षा के उपायो में अपने जीवन का अधिकांश  समय खर्च कर देता है। हर व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब, कितने भी बड़े पद या प्रतिष्ठा वाला हो मुख्य रूप से इन चार चीजो में ही आनंद पाने की कोशिश करता हैं - आहार, नींद, मैथुन और भविष्य की सुरक्षा (Eating , Sleeping , Mating & Defending)। यह चार काम तो पशु भी बहुत अच्छी तरह से करते है तो फिर हम मनुष्य क्यों श्रेष्ठ कहलाते है ? जरा इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरुरत है। अगर आप अपने जीवन में इन चार चीजो को ही महत्व दे रहे है फिर तो आप के जीवन पशु जीवन में कोई अंतर नहीं हैं। फिर मनुष्य को क्यों श्रेष्ठ समझा जाय ?

इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये हमें अपने शास्त्रो और श्रीभगवत गीता की मदद लेनी होगी। मनुष्य जीवन में जीव अपने और भगवान के संबंध के बारे में जान सकता है। इस दुखो से भरे संसार चक्र से बाहर निकल कर कभी ना समाप्त होने वाले आनंद को पा सकता है। मनुष्य ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होकर भक्ति का आनंद ले सकता है। जबकि पशु इन सबको नहीं कर सकता है। सिर्फ और सिर्फ मनुष्य जीवन से ही इस निरंतर लाखो करोडो जन्मो से फ़से हुए जीव की मुक्ति संभव है।

ईश्वर ने विवेक नाम की एक ऐसी शक्ति मनुष्य को प्रदान की है जिसके द्वारा मनुष्य मुक्ति और आनंद का दरवाजा खोल सकता है। ये विवेक मनुष्य को सत्संग के बिना नहीं प्राप्त हो सकता और सत्संग बिना ईश्वर की कृपा के नहीं मिल सकता। हर हाल में उस परम शक्ति स्वरुप ईश्वर की करुणा अनिवार्य है।

मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है की हम अपने आपको इस संसार से मुक्त कर के ईश्वर की सहज भक्ति में लगाये और परम शाश्वत आनंद का अनुभव करे। अगले लेख में इन सबकी विस्तार से चर्चा करेंगे कि  विवेक और सत्संग से अपने जीवन को आनंद से भर सकते है।

ॐ शांति
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com


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