Wednesday, 4 November 2015

दामोदर लीला: अदभुत लीला - भाग दो

 इस कार्तिक मास में हम सभी दामोदर लीला का आनंद ले रहे है। पिछले पोस्ट में हमने देखा कि किस तरह प्रेम और करुणा सिंधु श्री हरि अपने भक्त के वश में होकर अपने को बंधन में भी करना स्वीकार कर लेते है। बालक कन्हैया को ऊखल से बाँधने के बाद मैया यशोदा घर के कामों में व्यस्त हो जाती है।

नन्द महाराज के आँगन में दो पेड़ थे जो यमला-अर्जुन के नाम से जाने जाते थे। अपने पूर्व जन्म में ये वृक्ष कुबेर के पुत्र नलकूवर और मणिग्रीव थे जो बहुत ही ऐश्वर्यवान और धनी परिवार में थे जो कि धन के प्रभाव से बहुत अभिमानी और मदमस्त हो गए थे और नारद मुनि के शाप के फलस्वरूप वो माता यशोदा और नन्द महाराज के घर में पेड़ बनकर खड़े थे। यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि सदा सभी का कल्याण चाहने वाले नारद जैसे दयालु वैष्णव भक्त ले इन कुबेर के पुत्रो को शाप क्यों दिया ? इसके पीछे का रहस्य कुछ इस तरह से है।

कुबेर के ये दोनों पुत्र शिव जी के विशेष भक्त थे और उनका आशीर्वाद प्राप्त किये हुए थे और इस बात का इन्हे बहुत गर्व था। एक बार कैलास पर्वत स्थित मन्दाकिनी नदी के किनारे एक पुष्प उपवन में ये दोनों कई सुंदर युवतियों के साथ गायन और विहार कर रहे थे। यहाँ पर इन लोगो ने वारुणी (एक विशेष प्रकार की मदिरा) पिया और नशे में मदमस्त हो गए। नशे के अति प्रभाव के कारण इन लोगो ने मन्दाकिनी नदी में जो की पुष्पों से भरी हुई थी, सुन्दर युवतियों के साथ  जल क्रीड़ा करने लगे।

उसी समय देवऋषि नारद जी वहाँ  से गुजरे और सारा माजरा समझ गये। नारद मुनि  को देखकर युवतियों ने तो अपने अपने शरीरो को वस्त्र से ढक लिया और बहुत शर्म महसूस किया। लेकिन कुबेर के पुत्र अपने घमंड के कारण नग्न अवस्था में ही रहे और उन्होंने अपने आपको वस्त्रो से नहीं ढका और न ही ऋषि को प्रणाम किया।
नारद जी ने जो कि सदा करुणा और कल्याण की भावना से भरे रहते है उन दोनों मदांध कुबेर पुत्रो को पेड़ बनने का शाप  क्योकि उन दोनों ने ऋषि को देख कर भी अपने धन और पद के गर्व के कारण अपने शरीरो को नहीं ढका था  और न ही उन्हें प्रणाम किया था जोकि सनातन संस्कृति है। नारद जी ने आगे कहा कि द्वापर में श्री कृष्ण के दर्शन करने के उपरांत ही तुम इस जड़ योनि से मुक्त हो सकोगे और मेरे आशीर्वाद की वजह से तुम्हे अपने पूर्व जन्म और कर्म का स्मरण सदैव रहेगा।

इतना कह कर नारद मुनि वहाँ से अपने आश्रम चले गये और वे दोनों कुबेर पुत्र नलकूवर और मणिग्रीव अर्जुन के जुड़वाँ वृक्ष  माता यशोदा के आँगन में प्रगट हुए। देवर्षि नारद के वचनो को सत्य करने के लिये छोटे से बाल कृष्ण जिस ऊखल से बंधे थे उसे घसीटते हुए उन दोनों पेड़ो की और धीरे धीरे चले और दोनों अर्जुन पेड़ो के बीच स एनिकल गए परन्तु ऊखल उन पेड़ो के बीच में ही अटक गया। इसके फलस्वरूप कन्हैया आगे नहीं बढ़  पा रहे थे, जिसके कारण उन्होंने ऊखल को निकलने के लिए थोड़ा और खीचते हुए जोर लगाया। जोर लगते ही दोनों विशाल वृक्ष जड़ से उखड गए और जोर की आवाज के साथ भूमि पर गिर पड़े। इसके तुरंत बाद ही वहाँ दो अत्यधिक तेजवान दो देव पुरुष हाथ जोड़ते हुए प्रकट हुए और भगवन कृष्ण की स्तुति करने लगे।

उन दोनों कुबेर पुत्रो ने कहा कि  आप सभी कारणों के कारण स्वरुप सृष्टि के आदि से परम भगवन है और सभी जीवो के अंदर परमात्मा रूप में निवास करते हैं।  आपके बारे में स्वयं ब्रम्हा, शिव आदि परम योगी तक ठीक  जानते है और जिनके लिए आपके दर्शन दुर्लभ हैं  उन्ही श्री हरि के मनोहारी बालरूप के साक्षात दर्शन मुझे नारद जी की कृपा से संभव हो सके है।  वास्तव में नारद जी ने हम दोनों भाइयो पर करुणा के कारण ही शाप दिया और उस शाप के कारण ही अखिल ब्रम्हांड के नियंता के हूँ दर्शन कर पा रहे है। इस तरह बहुत प्रकार से स्तुति करने के उपरांत उन दोनों ने उन परमेश्वर की परिक्रमा की और  भगवन कृष्ण की आज्ञा से स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किया।

उन वृक्षों के गिरने की जोरदार आवाज को सुनकर मैया यशोदा सहित सभी आस पास के गोपियाँ और ग्वाले भाग कर आये और आश्चर्य करने लगे की कैसे ये पेड़ गिर गए। मैया यशोदा ने तुरंत लाला को ऊखल से बंधी रस्सी से खोला और अपने ह्रदय से लगा लिया और भगवान को धन्यवाद दिया की उनका लाला सुरक्षित है। वहाँ पर उपस्थित कुछ बालको ने बोला कि  कन्हैया ने ही पेड़ो को गिराया हैं और उसके बाद दो तेजवान पुरुष निकल कर लाला को हाथ जोड़ कर गए थे। लेकिन उन बालको की बातो पर किसी को विश्वास नही हुआ क्यों कि  गोकुल में सभी कृष्ण के प्रेम में सराबोर थे और वे उन्हें  मानते थे अपितु शुद्ध प्रेम करते थे। इस तरह गोकुलवाशी और नन्द -यशोदा नित प्रतिदिन बाल कृष्ण की लीलाओ का आनंद उठाते रहे।

ॐ शांति
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com




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