आप सभी को पिछले नौ दिनों से चल रहे नवरात्रि उत्सव और आने वाले त्यौहार विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाये। विजयदशमी का त्यौहार जिसे दशहरा के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार को अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने आसुरी और दुष्ट स्वाभाव वाले रावण का वध किया था और पूरे भूमण्डल को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।
भगवान राम की इस विजय के उपलक्ष्य में हर वर्ष हम रावण दहन करते है यानि रावण के विशाल पुतले बना कर उसे जलाते है। ये परंपरा कई युगो और सदियों से चली आ रही है। मै भी बचपन से इस त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ हू। पहले तो ये सिर्फ मेरे लिए मनोरंजन और स्कूल की एक और छुट्टी के जितना ही महत्व रखता था। लेकिन जब से होश संभाला तब से हर वर्ष मैं यह सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि जिस रावण के पुतले को इतनी भीड़ के बीच में हम हर वर्ष जलाते हैं वही रावण हर वर्ष और अधिक शक्तिशाली बन कर हमारे बीच उपस्थित हो जाता है। आखिर कब तक हमें उसे यूँ ही जलाते रहेंगे और कब तक वह और अधिक मजबूती से हमारे बीच यूँ ही हर वर्ष आता रहेगा।
अगर गहराई से सोचे तो अब सिर्फ दशहरे के दिन रावण जलना मात्र रस्म अदायगी रह गया है। हम सिर्फ अपनी ऊर्जा और समय ही नष्ट कर रहे है यदि हम सही मायनो में बुराई को पराजित न कर सके। बुराई भी दो प्रकार की है, एक तो जो हम अपने आस पास देखते है यानि बाहर देखते है और एक हमारे मन में भी बुराइयो का भंडार है। हम अपने आस - पास कितने बलिष्ठ रावण बहुत बड़ी संख्या में देखते रहते हैं। अपने मन का रावण तो और भी अधिक शक्तिशाली है। जब से हम अपनी गौरवशाली संस्कृति से दूर होकर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में रंग गए है तब से तो ये और अधिक मजबूत होकर अट्टहास कर के हम सबको चुनौती देता नजर आ रहा हैं।
कहते हैं जव राम और रावण के बीच घोर संग्राम हो रहा था, उस समय भी रावण के जितने सिर राम जी काटते थे उतने ही सर पुनः नए हो जाते थे। इस प्रकार जब राम अत्यधिक परेशान हो गए तब रावण के भाई विभीषण ने युक्ति बताई और तब रावण मार जा सका। आज भी हम देखते है कि हम जितना भी अधिक बुराइयो के खात्मे का प्रयास करते है, बुराई और प्रचंड रूप में हमारे सामने आ कर हमें ललकारने लगती है।
अगर हम अपने समाज में व्याप्त बुराइयो जैसे भ्रष्टाचार, नशे की आदतो जैसी बुराइयो को मार सके तभी सही अर्थो में रावण जलने की सार्थकता है नहीं तो इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता है। आइये हम सभी संकल्प लेते है कि हम सब अपने अंदर के रावण को पराजित करेंगे और सद्गुणों को विकसित करेंगे। इसी के साथ आप सभी को फिर से विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाये।
ॐ शांति
9892724426
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