प्रिय पाठको , वैसे तो हम अपने इस ब्लॉग से ज्यादातर सांस्कृतिक या आध्यात्मिक विषयो पर ही विचार प्रकट किये जाते है लेकिन आज मई एक सामाजिक समस्या पर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा वह है ग्लोबल वार्मिंग की समस्या। जी हाँ , आप सबने कही न कही इस शब्द को अवश्य ही कही न कही पढा या सुना होगा। आइये पहले समझ ले इसका अर्थ क्या है। पिछले कई वर्षो में इस दुनियाँ के तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव हुआ है यह निरंतर बढ़ता ही जा रहा हैं। इस कारण अन्य तरह के मौसम में भी परिवर्तन देखने को मिला है। अंतर्राष्ट्रीय मंचो में यह मुद्दा प्रमुख रूप से छाया हुआ है। बढ़ते औधोगीकरण और बदलती जीवन शैली के फलस्वरूप हम नित प्रतिदिन इस समस्या को कही न कही और बढ़ाते जा रहे है। अब यह साफ़ हो गया है कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा अर्थ है हमारे भूमण्डल का बढ़ता हुआ तापमान जो की आज प्रमुख चिंता का बिषय बना हुआ है।
बढ़ता हुआ ए.सी (एयर कंडीशनर) और फ्रिज का प्रयोग इस समस्या को और अधिक बढ़ा रहा है। इन चीजो के उपयोग से कार्बन और अन्य हानिकारक गैसों के निकलने से पृथ्वी का तापमान में बहुत अधिक वृद्धि दर्ज की गयी है और ये गैसें हमारी ओजोन परत के लिए भी नुकसानदायक है। ओजोन पर्त हमारी सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों से रक्षा करती है। आज हम ऊर्जा की खपत कूलिंग यानि ठंडा करने के लिए ज्यादा कर रहे है।
इस ठंडा यानि कूलिंग के चक्कर में दुनियाँ का कूलिंग सिस्टम बिगड़ गया। कृत्रिम रूप से वातावरण चीजो को ठंडा करने की हमारी आदत बहुत घातक सिद्ध हो रही है।
दुनियाँ में पहला घरेलू एयरकंडीशनर 1914 में बना था और पहला फ्रिज 1930 में बना था। लोग धीरे धीरे इन चीजो के गुलाम बनते चले गए। अकेले 2010 में चीन में ५ करोड़ ऐ सी की खपत हो गयी और ये मान साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। अकेले अमेरिका अपनी बिल्डिंग्स को कूल रखने लिये जितनी बिजली खर्च करता हैं उतना अफ्रीका कुल मिला कर भी नहीं उपयोग कर पाता है। मुंबई में भी कुल बिजली का 40 % ऐसी पर ही खर्च हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक , सन 2100 तक दुनिया में एसी के लिये बिजली की मांग 33 गुना बढ़ जायेगी।
समस्या यह है की ना तो विकसित देश जैसे अमेरिका या फिर विकासशील देश कोई भी अपने यहाँ कार्बन जैसी हानिकारक गैसो के उत्सर्जन को रोक नहीं सके है। अधिक मात्रा में हानिकारक गैसें वातावरण में मिलकर वायुमंडल को और अधिक घातक बना रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग इस सदी के लिए एक बड़ी चुनौती है। विकास और आधुनिक जीवन की अंधाधुंध दौड़ में हम अपने विनाश का जाल दिन प्रतिदिन बुनते जा रहे है। विकसित देशो के लोग जीवन शैली बदलना नहीं चाहते और विकासशील देश विकास के नाम पर फ्रिज और एसी का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ाते ही जा रहे है। जहाँ पर जरुरत नहीं हैं वह पर भी सिर्फ दिखावे और स्टेटस सिम्बल के नाम पर इनकी मांग बढ़ती जा रही हैं।
दुनियाँ भर के वैज्ञानिक और एनवायरनमेंट एजेंसिया आये दिन लोगो से इन गैसों में कमी लाने के लिए अपील करती हैं लेकिन ऐसा लगता हैं कि बढ़ता हुआ भौतिकतावाद के कारण इसका रुकना बहुत मुश्किल हो गया हैं और आने वाले समय में गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। अगर हम फ्रिज और एसी का उपयोग काम करने में सफल होते है तभी इस समस्या से कारगर ढंग से निपटा जा सकता है।
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