Monday, 31 August 2015

कष्टों से मुक्ति


इस संसार में सभी कष्टो के मुख्यतः दो कारण  हैं।  एक अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होना और दूसरा अपने आपको पूरी प्रकृति का स्वामी मान बैठना। बाकी अन्य भी कारण  है , लेकिन अगर इन दो चीजो को अच्छे से समझ लिया जाय तो बहुत हद तक कष्टो से राहत हो सकती है।

अगर मै  आपसे पूछता हूँ  कि आपका नाम क्या है ? तो आप उत्तर में अपना नाम बता देंगे। जैसा की आप सभी जानते हैं  की हर वस्तु  का इस संसार में नाम होता हैं लेकिन जिस वस्तु का नाम होता है उसका कुछ आकार या कुछ अलग गुण  जैसे महक, रूप, स्वाद, रंग आदि। लेकिन आप वास्तव  में क्या है ? यह नाम तो आपको अपने परिवार या समाज ने दिया है, जो कि सिर्फ कुछ साल पुराना है और कुछ समय बाद ये भी नहीं रहेगा। तो आप नाम तो हो नहीं। फिर आपका असली पहचान क्या है ? कभी सोचा है ? मेरी समझ से शायद आपने कभी न कभी जरूर सोचा होगा लेकिन फिर सही जवाब न आने या अन्य किन्ही कारणों से आपने इस पर ध्यान नहीं दिया होगा। यही वो असली प्रश्न है जिसका सही उत्तर आने से आपके जीवन की अधिकांश समस्याएं आपने आप हल हो जायेंगी।

विषय थोड़ा गम्भीर है अतः मेरा अनुरोध है बहुत ही ध्यान से पढ़िए। साधारण अर्थों  में तो जो चेहरा आप दर्पण में देखते हो आप उसको ही अपने आपकी पहचान मान बैठते हो। लेकिन ये सत्य नहीं हैं , जो शरीर आपको दिख रहा है वह वास्तव में आप नहीं है यह तो मात्र आवरण (खोल) हैं। इस शरीर के भीतर भी "कुछ" हैं जिसके ना रहने से आपका ये शरीर मृत शरीर में बदल जाता है। उस मृत शरीर की इस दुनिया में कोई कीमत नहीं होती। जैसे ही वो "कुछ" आपके शरीर से निकल गया आप इस दुनिया के लायक नहीं रह जाते। आपका सारा भौतक अस्तित्व सिर्फ उस "कुछ " की वजह से ही हैं। अगर वेदांत या अपने पौराणिक ग्रंथो की भाषा में कहे तो ये "कुछ" को ही हम "जीवात्मा" कहते है।

 वास्तव में हमारी सच्ची पहचान यही है कि हम जीवात्मा हैं और उस परम शक्ति के जिसे हम कुदरत, ईश्वर या भगवान कहते हैं  उसके ही एक अंश मात्र है। यह कुदरत या प्रकृति अनंत शक्ति वाली और अतुलनीय है और वास्तव में यह उस परम पुरुष परमेश्वर की शक्ति स्वरुप ही है। लेकिन हम अज्ञानवश इस प्रकृति के मालिक बनना चाहते है निरंतर परेशानी में जीवन बिताते है। हम व्यर्थ ही मिथ्या अभिमान और अनावश्यक भौतिक संसाधनो को पाने के लिये २४ घंटे परेशान रहते हैं और सच्चे आनंद से वंचित रहते है।

एक बात याद रखिये जब तक इस झूठे और मिथ्या शरीर को सच मानकर भौतिक पदार्थो के पीछे भागेंगे आपको सच्चा आनंद नहीं प्राप्त हो सकता हैं  और आप निरंतर एक जन्म से दूसरे जन्म में कभी भी न पूरे होने वाले चक्र में फ़से रहेंगे और निरंतर इस जगत में कष्ट उठाने को मजबूर रहेंगे। आज के इस लेख में सबसे महत्व की बात यह थी कि  आप ये खाल  और मांस की देहमात्र नहीं हो आप वास्तव में उस परम पिता सच्चिदानंद ईश्वर के एक अंश हो इतना जानना है। बाकि ये जो ऊपर से भिन्न भिन्न खोल दीखते हैं जैसे स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े , पेड़- पौधे दिखाई देते है वास्तव में इन सबके अंदर वही जीवात्मा ही हैं जिसके फलस्वरूप हमें ये सब जीवंत  चलायमान लगते है और उस आत्मा के निकलते ही मृत हो जाते है।  इस जीवन और मरण के चक्र को कैसे तोडा जाये और कैसे जीवन में चरम आनंद पाया जाये ऐसे ही कुछ और विचारो के साथ हम फिर मिलेंगे।


ॐ शांति।
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Friday, 28 August 2015

दुःखो के प्रकार



अब तक हमने भौतिक जीवन के विषय में काफी चर्चा कर ली हैं।  संक्षेप में कहे तो भौतिक जीवन वह जीवन है जिसको हम लोग इस संसार में जी रहे है। हर व्यक्ति किसी न किसी संकट से परेशान है। दुःख की साधारण सी परिभाषा है कि  अपने अनुकूल परिणाम न निकलना और सुख का अर्थ है कि अपने अनुकूल परिणाम प्राप्त कर लेना। इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो यह कह सके कि  वह पूरी तरह से प्रसन्न है और उसे किसी भी प्रकार का दुःख या संकट नहीं है। दुःखो को अगर हम देखे तो मूलतः ३ प्रकार के होते है। पहले प्रकार का कष्ट होता है जैसे किसी रोग से पीड़ित होना, अपना मनचाहा कार्य न होना, इस जगत में सफल न हो पाना, ढंग का रोज़गार न मिलना, लोगो से लड़ाई होना आदि आदि। दूसरा कष्ट जैसे दैवी आपदायें सूखा पड़ना, बाढ़  आना , अतिवृष्टि होना या ओले गिरना, तूफान आना, भूकम्प आना, आंधी आना इन्हे हम प्राकृतिक कष्ट की श्रेणी में रख सकते है।

एक तीसरे प्रकार का कष्ट होता है जिसे हम मानसिक कष्ट कह सकते है। जैसे ईर्ष्या की भावना में जलना, क्रोध में जलना , हमेशा मन में असंतोष से भरे रहना , हमेशा चिंताग्रस्त रहना आदि आदि। मेरी समझ से इन सब दुखो हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। दैवी आपदा का हम कुछ नहीं कर सकते। इसे तो हमें सहन करना ही होगा। दूसरा जो बड़ा कष्ट है की कई बार हम जी तोड़ मेहनत के बाद भी असफल रहते है और फिर कष्ट का अनुभव होता है। हम निराशा और तनाव के शिकार हो जाते है। किसी किसी को बिना किसी अधिक प्रयास के सफलता मिल जाती है। अगर हम थोड़ा हमारे वैदिक ग्रंथो जो की अति प्राचीन है उसमे जा कर अगर इसका कारण खोजे तो हम पायेंगे  कि जो भी सुख या दुःख हम अपने जीवन में भोगते हैं  वह हमारे विगत या पिछले कर्मो का ही फल है। कर्मो का फल तो हर जीवमात्र चाहे मनुष्य हो, पशु हो, कीड़े-मकोड़े हो, या वनस्पतियाँ सभी को भोगना ही पड़ता है।

हम जो भी कुछ आज कर रहे है वह हमारे आने वाले अगले जनम के जीवन का फाउंडेशन (आधार) है। अब प्रश्न उठता है कि किस तरह से हम इस जीवन को आनंदमय बना सकते है। इस जगत का एक सत्य है जो कि  सभी को मालूम है कि  हर जीव को एक निर्धारित समय के बाद एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा करनी पड़ती है। इसी तरह जीव इस भौतिक जगत में एक शरीर से दूसरे शरीरो में कष्टो का भोग करता रहता है। इस संसार का एक नाम दुःखालय भी है जिसमे सभी प्राणी अपने अपने कर्म फलो का भोग कर रहे है। अगर आप अपने कष्टो का परमानेंट इलाज चाहते है तो इस संसार के जन्म और मृत्यू के चक्र से छूटने का उपाय खोजना चाहिये।

लेकिन दुर्भाग्य से हम सभी टेंपरेरी हल ढूंढने में लगे रहते है और वो भी नहीं ढूंढ पाते है। अतः इस जगत में भी हम दुःख भोगते है और कर्मो के फलस्वरूप आगे के जन्मो का फंदा भी हम खुद ही बनाते है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते है कि 4 कष्टो से तो हर जीव परेशान है। जन्म , मृत्यु, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (रोग) ही हर जीव का मुख्य कष्ट है और इनसे मुक्ति का उपाय ही हम सभी को खोजने का प्रयास करना चाहिये। तभी हम सच्चे और हमेशा रुकने वाला यानि कभी भी न समाप्त होने वाला आनंद की प्राप्ति कर सकेंगे।

अतः इन कष्टो से मुक्ति के उपाय हम आगे के लेखो में खोजेंगे।

ॐ  शांति।
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Tuesday, 25 August 2015

दैवी गुण - परोपकार




परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि  अघ माई।

जे न मित्र दुःख होई दुखारी , तिन्ही बिलोकत पातक भारी।

आप सभी ने उपरोक्त पंक्तियाँ जो की परम संत मानस मर्मज्ञ गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित हैं , आपने  बचपन से लेकर अभी तक कही न कही अवश्य पढ़ी होंगी। पहली पंक्ति का अर्थ है की जगत में दुसरो  करना ही सबसे बड़ा धर्म है और दूसरे को कष्ट पहुँचाना ही जगत में सबसे बड़ा पाप हैं। दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि  जो व्यक्ति मित्र के दुःख में दुखी नहीं होता उसके दर्शन ही सबसे पड़ा पाप है। अतः ऐसे व्यक्ति की संगती से बचना चाहिये  जो दूसरे के दुःख में भी दुखी नहीं होता। परोपकार की भावना भी दैवी गुणों के अंतर्गत आती है। जो व्यक्ति परहित के विषय में सोचता है उसका हित ये प्रकृति और ईश्वर अपने आप ही कर देती है। परोपकार करने से जो शांति या आनंद का अनुभव होता है उसका वर्णन करना असंभव है,  उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

हमारा भारतवर्ष महान महापुरुषों की गाथाओ से भरा पड़ा है जो कि आज के समय में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। मह्रिषी दधीचि ने असुर वृत्तासुर जो कि समाज के लिये एक बहुत बड़ा खतरा बन गया था उसके वध के लिए अपने शरीर की हड्डियों का दान कर दिया था। उनके शरीर की हड्डियों से एक गदा का निर्माण किया गया और उसी गदा से उस असुर का संहार हुआ। महाराणा प्रताप, महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह जैसे लोगो ने देशवासियो के लिए पूरा जीवन समर्पण कर दिया। महान संत श्री विनोबा भावे ने भू -दान आंदोलन चलाया और समाज के कितने ही असहाय  लोगो की मदद की।

प्राचीन काल से ही दूसरो  का हित  करना हमारी गौरवमयी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन पश्चिम की भोगवादी संस्कृति ने आज हमारी मानसिकता को गुलाम बना लिया है। जहाँ  त्याग , समर्पण, दान और परोपकार जैसे गुणो से भारत की पहचान होती थी , उसी भारत में अब स्वार्थ और लोभ हावी हो रहा है। हम त्यागवाद से भोगवाद की तरफ निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप आज लोग असंतुष्ट और निराशा से घिरे हुए है। अगर आज भी हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन जिए तो स्वस्थ और आनंदमय जीवन जी सकते है। कुँए  खुदवाना, वृक्ष लगवाना, धर्मशाला निर्माण, दान की परंपरा और आध्यात्मिक ज्ञान हमारी वैदिक सभ्यता की पहचान रहे हैं।

आज जरुरत है कि हम अपनी शक्ति और वैदिक सभ्यता को जाने और समझे। अपने अंदर दैवी गुणों को विकसित करे। जिस तरह स्वामी विवेकानंद के समय भारत विश्व गुरु के पद पर आसीन था वो समय हम आज भी ला सकते है।
ॐ  शांति
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Friday, 21 August 2015

दैवी गुण : क्षमाशीलता और कृतज्ञता



प्रिय पाठक मित्रो , आप सभी को मेरी ओर से राम राम। जब हम एक दूसरे से मिलते है तो राम राम बोलना हमारी भारतीय संस्कृति का एक अति प्राचीन हिस्सा रहा है। अब इक्कीसवी सदी में मै देखता हूँ कि बदलती शिक्षा व्यवस्था और आधुनिकीकरण के कारण  धीरे धीरे हम अपनी संस्कृति से अलग होते जा रहे है। मै बदलाव और विकास का विरोधी नहीं हूँ , लेकिन बदलाव सकारात्मक होना चाहिये। बदलाव का ये अर्थ नहीं कि हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये। अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि हमारी जीवन शैली, हमारा खानपान , हमारा रहने का ढंग और साथ साथ में हमारी मानसिकता भी बदलती जा रही है।

जो भी देश या समाज अपनी संस्कृति के साथ जुड़ा नहीं रह पता है उसका पतन निश्चित है। आज सिर्फ हम शक्ल से भारतीय दिखते है , अक्ल से और सोच से हमारी सोचने की प्रवृत्ति पाश्चात्य चिंतन से प्रभावित होती जा रही है। हमारे जीवन में भोगवाद बढ़ता जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप लालच, ईर्ष्या और मिथ्या दंभ  जैसे दुर्गुण हमारे जीवन में अपना अधिकार बढ़ाते जा रहे है। आज हमें जरुरत हैं हमें अपने अंदर फिर से देवी गुणो  को विकसित करने की। हम यह न भूले हमारे पूर्वज महान ऋषि और ज्ञानी थे।  इसी भारतवर्ष ने दुनिया को ज्ञान का दीपक और जीने का मार्ग दिखलाया है। हमें फिर से अपने मूल में जा कर हमें हमारी असली पहचान और गौरवमयी इतिहास को समझने की जरूरत है नहीं तो  वाली पीढ़ी जिस संकट में जियेगी जिसकी हम आप आज कल्पना भी नहीं सकते।

आज हम दैवी गुण क्षमा और कृतज्ञता पर चर्चा कर रहे है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरषोत्तम भगवन श्री रामचन्द्र ने इस पुण्य भूमि भारत में अवतरित हुए और मानव जीवन के लिए एक सच्चा आदर्श प्रस्तुत किया। अगर हम रामचन्द्र जी की सभी गुणों का वर्णन करना चाहे तो हम पुरे जीवन में भी नहीं समझ सकते क्योकि वो तो दैवी गुणों  के अपार समुद्र है अगर उनके कुछ गुणों को ही हम जीवन में उतार  सके तो भी हमारा जीवन आनंदमय हो सकता हैं  और हमारी ये जीवन यात्रा एक आनंद यात्रा के रूप में परिवर्तित हो सकती है।

भगवान राम का एक महत्वपूर्ण गुण  है की सदा सामने वाले को क्षमा कर देते है और किसी का किया हुआ उपकार वो कभी नही  भूलते हैं। रामचरित मानस में जयंत प्रकरण में राम ने जयंत को क्षमा का दान दिया। रावण का भाई विभीषण जब उनकी सरण में आया तो उन्होंने ने उसे एक भाई की तरह प्रेम दिया। हनुमान जी की सराहना करते हुए प्रभि श्री राम जी कहते है कि इस जन्म में मै  तुम्हारा उपकार नहीं उतार सकता और उन्हें भाई भरत  जैसा प्रेम और पद दिया। कृतज्ञ होना अपने आप में हैक बड़ा दैवी गुण  है।  आज हम कृतज्ञता को पूरी तरह भुला बैठे है। हम दुसरो के उपकारों को बहुत जल्दी भुला देते है और उसको कोई महत्व नहीं देते है। भगवन राम ने जीवन में सभी के उपकारों का ध्यान रखा और हमेसा उपकार करने वाले को प्रेम व  मान सम्मान  भी दिया।

हमारे प्रभु तो शत्रु रावण को भी क्षमा करने को तैयार थे अगर वो उनकी शरणागत हो जाता। उन्होंने हनुमान जी और अंगद के माध्यम से कई बार उस तक सन्देश भेजा। जबकि वो अनंत शक्तिशाली है और रावण का संहार तो पालक झपकते ही कर सकते थे। जब आप सामर्थ्यवान  बलशाली होते हुए भी क्षमाशील और कृतज्ञ रहते है तो ये गुण आपकी शोभा को और बढ़ा  देते है। किसी ने श्री राम जी से पूछा कि  विभीषण को तो आपने लंका का राजा बना दिया है अगर रावण आपकी शरण में आ गया तो क्या देंगे ? प्रभि श्री राम ने तुरंत उत्तर दिया कि  मई उसे अयोध्या का राज्य दे दूंगा। ऐसा उत्तम चरित्र है हमारे श्री राम का जिनके अंदर नम्रता, क्षमाशीलता , कृतज्ञता आदि जैसे गुण  हैं और इन्ही गुणो  के कारण  ही आज वह  विश्व वन्दनीय है।

फिर मिलेंगे कुछ और विचारो के साथ।
ॐ शांति।
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Monday, 17 August 2015

दैवी गुण - नम्रता और विनयशीलता



आनंदमय जीवन और सुखमय जीवन के लिए हमें अपने अंदर कुछ दैवी गुणों को विकसित करने की जरुरत होती है। गीता में श्री कृष्ण जी ने भी इन गुणों का बहुत अच्छी तरह से उल्लेख किया है। सबसे पहले किसी भी इंसान का नम्र होना बहुत मायने रखता है।  नम्र होना  आप में एक बहुत महत्वपूर्ण दैवी गुण  है। अगर आप किसी के साथ नम्र तरीके से पेश आते है तो सामने वाला कितना भी बुरा क्यों न हो आपका कभी अहित नहीं सोचेगा और उसके अंदर आपके प्रति एक विशेष तरह का आदर भाव उत्पन्न होगा। विनम्रता सज्जन व्यक्तियों का आभूषण होता है। विनम्रता मनुष्य में विनय के द्वारा प्रदर्शित होती है।

रामचरित मानस में जब श्रीराम जी को सागर पार लंका  जाने की जरूरत हुई तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक सागर से तीन दिनों तक रास्ता मांगने के लिए विनय किया। हालाँकि उनके अनुज लक्ष्मण उनकी इस बात से सहमत नहीं थे फिर भी राम ने यहाँ पर विनय का मार्ग अपनाया। वैसे तो भगवन श्रीराम बिना विनय के भी सागर पार करने में समर्थ थे जिनके एक भृकटी घुमाने  भर से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का संहार हो जाता है उन प्रभु  श्री राम जी को सागर के समक्ष विनय की क्या आवश्यकता ? लेकिन भगवान ने मानव वेश में खुद विनय कर के हम सभी को यह सन्देश दिया है की जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो हमें विनम्रता युक्त स्वाभाव नहीं छोड़ना चाहिए।  श्री राम जी के विनय करने के बाद भी जान जड़ बुद्धि  सागर ने रास्ता नहीं दिता तब उसके बाद श्री राम ने सागर पर कोप किया। पहले विनय और फिर जब कोई मार्ग न बचे तो फिर क्रोध का सहारा लिया जा सकता है।  यहाँ पर तुलसीदास जी ने बहुत ही सुन्दर लिखा है :

विनय न मानत  जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत। 
बोले राम सकोप तब , भय बिन होए न प्रीति। 

अगर हम अपने इतिहास की तरफ एक नज़र डाले तो हम पाएंगे कि  जो भी महान पुरुष या अवतार हुए है उनमे विनम्रता का गुण सामान रूप से पाया गया है। ऐसे अनेक महापुरुष है जैसे वीर शिवाजी , महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , विनोबा भावे, पूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री आदि आदि यहाँ पर सभी का नाम लिखना संभव नहीं है। हम कितने गौरवशाली है कि हमने इस पुण्य भूमि भारत में जन्म मिला जिस धरा पर अनेक अनेक महापुरुषों ने अवतार लिया। आज हम अपने जीवन में विनम्रता को भूलते जा रहे है। विनम्रता का अर्थ दुर्बलता नहीं है ये तो वीर पुरुषो और सज्जन पुरुषो का गहना है। कभी कभी हम अपने काम को जल्दी या शार्ट कट में करने के चक्कर में विनम्रता से न काम लेकर धमका कर या प्रभाव पूर्वक अपना काम करवाने की चेष्टा करते है और इस कारण अपने जीवन में ढेर साडी आपत्तियों और कष्टो को न्योता देते है। दूसरा एक और महत्वपूर्ण दैवी गुण  है क्षमाशीलता। इस बारे में में हम अपने अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे।

ॐ  शांति।
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Friday, 14 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 8



इस भौतिक जीवन के अनुभवों से संबंधित चर्चा को हम आज और आगे बढ़ाते है। अभी तक इस भौतिक संसार से होने वाले कष्टो व उसके उपायो के बारे में थोड़ी चर्चा हुई है। हम अज्ञान  के कारण इस संसार में दुखमय जीवन बिताने पर मजबूर है। जैसे जैसे हम जीवन को आरामदेह बनाने के लिए भौतिक प्रगति करते जा रहे है और अधिक से अधिक आराम के साजो सामान बढ़ाते जा रहे है , वैसे वैसे हमारे जीवन में ज्ञान, विवेक, नम्रता, क्षमा, शील जैसे सद्गुणों का लोप होता जा रहा है। गीता में भगवन श्री कृष्ण ने इन सभी गुणों को दैवी गुणों के तुल्य बताया है। मगर दुर्भाग्य से आज इन सभी गुणों का बहुत तेजी से पतन होता जा रहा है।  

इन दैवी गुणों के पतन के साथ साथ हम अपने जीवन में आसुरी अथवा राक्षसी गुणों जैसे लालच, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ, जरुरत से ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति आदि गुणों को तेजी से विकसित करते जा रहे है। आज हम प्रतिपल इन दुर्गुणों के साथ ही जी रहे है और कलह से भरा कलुषित जीवन जीने को बाध्य है। हर कोई ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधनो को जुटाने में दिन रात हाड़तोड़ मेहनत  किये जा रहा है। फिर भी आज किसी के जीवन में आनंद नहीं दिखाई देता है , चेहरे पर संतुष्टि  के भाव नज़र नहीं आता हैं। सभी लोग किसी भी तरह से एक कभी न खत्म होने वाली रेस में लगे हुए है और बहुत ही निरीह जीवन बिता रहे है।  

दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था भी नैतिक शिक्षा और हमारे देश के गौरवमयी संस्कृति को हमारे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने  में पूर्णतया विफल साबित हुई है। आज की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ ए. टी. एम. मशीन (धन उगलने वाली मशीन ) तैयार करती नज़र आ रही है।  शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक धन कमाना और अधिक से अधिक भौतिक वस्तुओ का संग्रह मात्र रह गया है। आज की शिक्षा चरित्र निर्माण और मानव निर्माण का कार्य कतई  नहीं कर रही है।  हम अपने आप से दूर होते जा रहे है। हमे ये ही नहीं पता है की हम वास्तव में क्या है और हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है ? पहले हम पढ़ते थे "विद्या ददाति विनयम" अर्थात विद्या विनय देती है लेकिन आज ठीक इससे उल्टा हो रहा है। आज कौन विनम्र है किसमे शील और परोपकार की भावना है ?

आध्यात्मिक जीवन जीना या अपने आपको धार्मिक बनाने से पहले अपने अंदर मानवीय गुणों का विकास कर लो तब भी बहुत सारी  समस्याओ का समाधान हो सकता है।  अगर अपने अंदर परोपकार, क्षमाशीलता और संतोष जैसे सद्गुणों को विकसित कर ले तब भी हम काफी हद तक आनंदमय जीवन का अनुभव कर सकते है।
अगर किसी भी कार्य को करने से पहले हम विवेक पूर्वक विचार करना सीख ले तो भी हमारे जीवन में बहुत सारी परेशानियाँ कम हो सकती है। अपने जीवन में कैसे दैवी गुणों को या मानवीय गुणों को विकसित करे इसकी चर्चा हम अगले लेखो में करेंगे। 

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Thursday, 13 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 7



इन दिनों कुछ व्यस्त होने के कारण , आप लोगो से मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए मै  आप सभी से विनम्रता पूर्वक क्षमा मांगता हूँ। हम भौतिक जीवन के बारे  चर्चा कर रहे थे। भौतिक जीवन से संबन्धित कुछ दुखो के बारे में और उस दुःख से मुक्ति के कुछ उपयो पर भी चर्चा कर रहे थे। आइये , आज उसी चर्चा को कुछ आगे बढ़ाते हुए भौतिक जीवन  के दुःखो से मुक्ति के कुछ और उपायों पर गौर करते है।

जीवन में आनंद किसे नहीं चाहिये ? आज इस संसार के प्रत्येक प्राणी को आनंद की तलाश है। देखिये, आनंद भी दो तरह का होता है। एक होता है अल्पकालिक आनंद और दूसरा होता है शास्वत आनंद। अल्पकालिक आनंद की अवधि कुछ निश्चित समय अवधि के लिए होती है और जैसे ही वह समय अवधि समाप्त हुई वह आनंद भी समाप्त हो जाता है। जैसे जो भी भौतिक वस्तु हमारे पास नहीं होती और सहसा वो हमें प्राप्त हो जाती है तो हमें आनंद की अनुभूति होती है लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता है आपका आनंद भी कम  होता जाता हैं। एक बिंदु ऐसा आता है की फिर हमें आनंद का अनुभव बंद हो जाता है और वही स्थिति या वस्तु बोझ प्रतीत होने लगती है। हमने अक्सर लोगो को बोलते सुना है यार ज़िन्दगी बोझ हो गयी है , यार ढो रहे है ज़िन्दगी को, यार कट रही है ज़िन्दगी। अधिकतर सर्व साधन संपन्न लोग भी ऐसी ही शिकायत करते नजर आते है।

हमें कितना भी अपार धन, यश, और अन्य भौतिक साधन प्राप्त हो जाये मगर हमारा आनंद टिकता ही नहीं। कुछ समय बाद फिर उसकी खोज करने लगते है जिससे हमें आनंद मिले। आखिर कब तक आप उस हिरन की तरह इस जनम से दूसरे जन्मो तक आनंद की खोज में यूँ ही भटकते रहोगे? हिरन भी अज्ञानवश अपने अंदर की कस्तूरी की सुगंध को ना जान कर उसकी खोज में जंगल जंगल भटकता रहता  है। हम किसी भी देश में किसी भी पंथ में जन्म ले इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बस हमें अपने सच्चे स्वरुप और अपने अंतिम लक्ष्य की पहचान होनी चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में बहुत सत्य ही लिखा है :

मोह सकल व्याधिन कर मूला।

अर्थात इस भौतिक संसार में मोह (अज्ञान) ही समस्त दुःखो  का एक मात्र मूल कारण  है।  हम सभी को अपने अंदर जो अज्ञान की मोटी मोटी परते जमी हुई है उसे साफ़ करना है। इस  कारण  ही हम सच्चे स्व आनंद को नहीं पहचान पाते। एक बात तो मई पुरे दावे से कह सकता हूँ  कि हम सभी का सच्चा स्वरुप पूर्ण आनंद का ही स्वरुप है लेकिन मोहवश हम इसे इस संसार में खोज रहे है जो कि इस संसार में मिलना संभव ही नहीं है।

मेरा अनुभव रहा है कि अगर आप इस भौतिक जगत में आनंद खोजोगे तो वो सिर्फ अल्पकालिक ही मिलेगा। चाहे जितनी तरक्की के दावे कर लो चाहे जितना उन्नति के दावे कर लो जब तक आप अपने सच्चे स्वरुप और अंतिम लक्ष्य को नहीं पहचान पाते तब तक आप उस शास्वत आनंद को नहीं पा सकते। इस मोह को कैसे दूर किया जा सकता है उन उपयो की चर्चा हम आगे के लेखो में करेंगे।
ॐ शांति
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Thursday, 6 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 6



आप सभी को हमारा प्यार भरा नमस्कार पहुंचे। आशा है कि  आप सभी लोग इस आनंद यात्रा में मेरे साथ आनंद का अनुभव कर रहे होंगे। अगर किसी को किसी भी तरह का कोई सुझाव या कमेंट्स देना है तो बे-झिझक अपनी बात हम तक पंहुचा सकते है। लेख के अंत में मोबाइल नंबर और ईमेल दोनों दिया हुआ है।

अभी तक के लेखो में हमने भौतिक जीवन के कष्टो के बारे में चर्चा की और कुछ उपयो पर विचार किया गया। हम सभी का एकमात्र उद्देश्य उस परम आनंद की प्राप्ति करना है जो कभी नष्ट न हो। इस आनंद की खोज में हम कई कई जन्मो से भटक रहे है। मगर हमें आज तक यह हासिल नहीं हो पाया है। इसका कारण  है की हम इसे गलत जगह में खोज रहे है , हम इस भौतिक संसार के सुख-सुविधाओ में आनंद खोजते है जो की नाशवान है, सदा नहीं रहता है।

हमारी हालत उस छोटे से बच्चे की तरह हो गयी है की  वो एक खिलौने से कुछ समय तक खेलता है और आनंद लेता है मगर उसके टूटते ही फिर दूसरे खिलौनों की खोज में लग जाता है। आखिर कब तक हम इन संसार के नाशवान खिलौनों ( बंगला , गाड़ी , बैंक बैलेंस, सुन्दर औरतो और पुरुषो से संबंध , विलासितापूर्ण साधन) में सुख की खोज करते रहेंगे। इस जीवन की मृग मरीचिका से कभी तो निकलना होगा। कब तक हिरणो की तरह इस संसार के जटिल जंगल में हम यूँ ही भटकते रहेंगे। हम सभी की हालत उस हिरन के जैसे ही है जो अपने अंदर ही छिपी कस्तूरी को नहीं पहचान पता और उस सुगंध को जो उस कस्तूरी से ही आ रही है उसे खोजने के लिए इधर उधर भटकता रहता है। हम भी उस परम सुख की खोज में इस संसार में यहाँ से वहाँ भटकते रहते है।

हमारे कष्टो का भी यही कारण है। हम अपने सच्चे स्वरुप को भूल बैठे है और इस माया से भरे आडम्बर से भरे संसार को सत्य मान कर बैठे है और  आनंद खोजने की चेष्टा कर  रहे है। जिस किसी को भी अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान हो गया ,जिसने भी अपने  पहचान कर ली वो तो मानो आनंद के समुन्दर में गोते लगाने लगा। ये वो आनंद है जो कभी नहीं ख़त्म होने वाला है। हम सभी को अपने अपने स्वरुप को पहचानना होगा तभी हम जीवन में आनंद की प्राप्ति कर सकते है।

अपना सच्चा स्वरुप कैसी पहचाने और भौतिक संसार से सम्बंधित और भी विषयो पर यह चर्चा आगे भी जारी रहेगी। आप सभी हमारे साथ बने रहिये।
ॐ  शांति।
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Wednesday, 5 August 2015

जीवन रहस्य : प्राचीन ग्रंथो का महत्व - भाग 5



हमने अभी तक जीवन को समझने की कोशिश की कि क्यों हम इतना निराशावादी जीवन जीने को मजबूर है क्यों इतना दुःख और तनाव झेलने को मजबूर है।  हमारा आनंद दिन प्रतिदिन काम होता जा रहा है जबकि हम रोज नए अविष्कारों और तरक्की के दावे कर है।  जीवन को आराम देने वाले साधन हमारे पास बहुत है फिर भी हम में  वो आनंद की अनुभूति नहीं हो रही है जो शाश्वत रह सके। कैसे हम शांति पूर्ण और सच्चे आनंद से जीवन जी सकते है इसी विषय को लेकर इस ब्लॉग को लिखा जाता है।

अपने अंतिम लेख में हमने कुछ उपयो की चर्चा की थी कि  अगर हम उस आदि शक्ति परम पुरुष ईश्वर पर विश्वास करे या भरोसा करे और अपने सहज स्वाभाव में जीवन जिए तो बहुत हद तक हमारी तकलीफे कम हो सकती है। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियो, भक्तो और विचारको ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ चिंतन किया और उसे ग्रंथो के रूप में मानव कल्याण के हेतु इस जगत को प्रदान किया। हम बहुत सौभाग्यशाली लोग है की हमारा जन्म भारत की भूमि में हुआ जहाँ पर जीवन दर्शन और सच्चे आनंद से जुड़े हुए पहलुओ पर बहुत गंभीरता से चिंतन हुआ और उसकी आधार पर शास्त्रो और पुराणो की रचना हुई।

हम अपने शास्त्रो , सद्ग्रन्थों और संस्कृति से दूर होते जा रहे है जो कि आज के मानव समाज के कष्टप्रद जीवन होने का मुख्य कारण है। जैसे कोई कंपनी कोई प्रोडक्ट लांच करती है और उसके साथ एक मैन्युअल (छोटी पुस्तिका) भी साथ में देती है। ये मैन्युअल, हमें उस प्रोडक्ट को कैसे उपयोग में  लाना है इस बारे में सहायता करता है। अगर हम बिना मैन्युअल के ही प्रोडक्ट यूज़  करे तो हो सकता है कि हम उसे सही ढंग से यूज़ न कर पाये। उसी तरह ईश्वर ने इस संपूर्ण ब्रम्हांड की रचना की है और उसके साथ वेद , पुराण आदि ग्रंथो की भी रचना की है जिससे हम सही ढंग से आनंदमय जीवन जी सके और इस पृथ्वी और प्रकृति का आनंद ले सके।

वेद इस सृष्टि के आदि ग्रन्थ और खुद ईश्वर के द्वारा रचित है। इन ग्रंथो में जीवन से सम्बंधित सभी पहलुओ पर बहुत विस्तार से चर्चा की गयी है।  दुर्भाग्य से समय के साथ हम  होते चले गए और सच्चे जीवन जीने की कला से भी दूर हो गए। हमारी सनातन संस्कृति में ४ वेद , १८ पुराण और उपनिषदों की रचना हुई है। परन्तु आज हमें इसका ज्ञान नहीं है और हमारे शिक्षा व्यस्था भी ऐसी है की जो कुछ भी ज्ञान बचा हुआ है उसे आने वाली पीढ़ियों  तक इसे नहीं पंहुचा प् रही है।

हमारी पुरातन जीवन जीने की पद्धति विशुद्ध  वैज्ञानिक और प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल रखने पर आधारित थी। आज का आधुनिक विज्ञानं भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुका  है। अमेरिका में स्थित नासा इंस्टिट्यूट ने स्पेस टेक्नोलॉजी कोर्स के लिए संस्कृत अनिवार्य कर दिया है लेकिन हमारे देश में ही लोगो के अपने इस खजाने से दूर रखा जा रहा है और आधुनिक जीवन और दिखावे की जीवन शैली में निरंतर फसते  जा रहे है।

वेदो को हम श्रुति भी कहते है जिसका अर्थ है सुनने वाला ज्ञान। प्राचीन समय में मानव मस्तिष्क  इतना उन्नत था कि वो सुन कर ज्ञान ग्रहण कर सकता था।  फिर पुराणो में कहानी को माध्यम बना कर उसी ज्ञान को कथा के माध्यम से जान सामान्य में आईटी किया गया। लेकिन हमारे परम ज्ञानी और ईश्वर  श्री व्यास जी ने समझ लिया था कि कलियुग के मनुष्यो के पास इतना समय और समझ नहीं होगी कि वो सरे वेद और शास्त्रो को अध्ययन  कर सके और समझ सके। इसलिए उन्होंने श्रीमदभागवतम्  और महाभारत के अंतर्गत श्रीमदभगवद्गीता की रचना की और मह्रिषी वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की। वाल्मीकि कृत रामायण संस्कृत में होने के कारण आज के मनुष्यो को समझने में कठिन थी और उसी कठिनाई को दूर करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी  हिंदी भाषा में रामायण पर आधारित श्री रामचरित मानस काव्य ग्रन्थ की रचना आज से करीब ४५० साल पहले की जो  कि आज जन -जन  में प्रचलित है।

अगर आज हम सिर्फ  रामचरितमानस और भगवद्गीता को ही सही अर्थो में समझ ले और इसके सूत्रों को जीवन में उतार सके तो मेरा दावा हैं कि मानव समाज को अभूतपूर्व लाभ होगा और समाज में सभी लोग आनंदमय जीवन जी सकेंगे।

हम आगे भी आपके साथ कुछ और विचारो को लेकर उपस्थित होंगे तब तक के लिए आप सभी को मंगलकामनाये । 

ॐ शान्ति।
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Monday, 3 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 4

प्रिय पाठको , आप सभी को मेरा प्रणाम। भौतिक जीवन की चर्चा को आज थोड़ा और आगे बढ़ाते है और कुछ अन्य पहलूओ पर चिंतन करते हैं। अंतिम लेख में हमने जाना कि शांतिमय और आनंदमय जीवन जीने में विश्वास की भी अहम भूमिका है। जब तक हमारे जीवन में विश्वास की कमी है तब तक हम अनावश्यक ही व्यर्थ की उलझनों में फँसे रहेंगे।

यहाँ पर मुझे गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस की एक और चौपाई याद आ रही है :

वट विश्वास अचल निज धर्मा।

यहाँ पर बाबा तुलसी हमें एक सफल जीवन का सूत्र देते है कि हर जीव को दृढ़ विश्वास और अपने निज धर्म (स्वभाव) में जिन चाहिये। यहाँ पर धर्म का मतलब कोई विशेष सम्प्रदाय या मजहब से नहीं है , यहाँ पर धर्म का अर्थ है प्रत्येक मानव को अपने मानवीय स्वाभाव के अनुसार आचरण करना चाहिये। अपने स्वाभाव में स्थिर रहिये और संतुष्ट रहिये। इस पुरे ब्रम्हांड में हर जीव चाहे वह जिस तरह की योनि में हो अपने आप में विशिष्ट है यानि खूबियों से भरपूर है लेकिन हम है की अपनी खूबियों को एन्जॉय करने की जगह खुद को हमेशा कोष्टी रहते है और खुद से या जीवन से दुःखी रहते हैं।  हमें जरूरत है अपना नजरिये को बदलने का , देखिये ज़िंदगी कितनी खूबसूरत हो जाती है।

क्या आपने कभी किसी जानवर को शिकायत करते देखा है ? क्या पेड़ पौधे भी कभी अपने आप से खफा होते है ? ये प्रकृति , सूरज, चाँद , सितारे, ग्रहमंडल , ऋतुएँ सब अपने निज धर्म में स्थित है। किसी को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं सिर्फ हम मनुष्यो को ही एक दूसरे से समस्या है। सभी पशु-पक्षी , सूरज , चाँद , सितारे आदि अपने अपने स्वाभाव में है निज धर्म में स्थित है और अपने आप में संतुष्ट है। जब शीतल वायु बहती है , जब बारिश होती है सारी प्रकृति हरी भरी हो कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करती है। कभी मोर को किसी बाज से खफा नहीं होता या कभी कुत्ता अपने से बड़े दूसरे जीव जैसे घोड़े या हठी को देख कर कभी दुखी नहीं होता। हर जीव अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ अपने आप में आनंद में डूबा हुआ है तो फिर हम क्यों दुखी है?

इस पूरे संसार में कोई भी व्यक्ति न तो पूरी तरह से गुणों से भरपूर है और न ही पूरी तरह से अवगुणो से भरपूर है। अगर आपको कोई पूरी तरह से १०० %  भला या बुरा व्यक्ति मिले  भी बताये ,मुझे तो आज तक कोई भी ऐसा इंसान नहीं मिला। कहने का मतलब यही ईश्वर ने जिस तरह से जैसा भी हमें बनाया है हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपने मानवीय स्वाभाव (धर्म) को नहीं  छोड़ना चाहिये। तभी हम तनाव मुक्त जीवन जी सकेंगे।

हमारा मानवीय स्वाभाव क्या है ? इस जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे अनेक प्रश्नो के हल हम आगे ढूंढने की कोशिश करेंगे।

ॐ शांति।
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Sunday, 2 August 2015

जीवन रहस्य - भाग 3



पिछले लेख में हम लोगो ने भौतिक जीवन के दुःखो के बारे में चर्चा किया था। हमने ये भी पाया कि कही न कही विश्वास के चलते हम अपने जीवन को व्यर्थ की उलझनों में डालते जा रहे है। हम उन घटनाओ के पीछे ज्यादा सोचते है जो की हमारे नियंत्रण में ही नहीं है जैसे अगर आपको यात्रा करनी है तो ड्राइवर पर भरोसा कर के आराम से सफर का मज़ा ले सकते है और अगर आपको ड्राइवर पर भरोसा नहीं है तो आप व्यर्थ की चिंता में पूरे सफर में फंसे रहेंगे। इसी तरह जो घटना तुम्हारे नियंत्रण में ही नहीं है उसे सोच कर भला क्या लाभ ?

रामचरित मानस में तो बहुत साफ शब्दों मे गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते है :

हानि लाभ जीवन मरण , यश अपयश विधि हाथ। 

इसका अर्थ है कि उपरोक्त 6 वस्तुओ पर आपका कोई जोर नहीं है और ये परम पिता परमात्मा की इच्छा पर ही निर्भर है। यहाँ पर मै स्पष्ट कर दूँगा कि जिसे मै परम पिता परमेश्वर , ईश्वर, भगवन, श्री कृष्ण या श्री राम कहूँगा हो सकता है आप में कई लोग उसे कुछ अलग नामो से जानते हो जैसे प्रकृति, अल्लाह, जीसस , वाहे गुरु या किसी अन्य नाम से मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अंततः हम किसी न किसी शक्ति के नियंत्रण में ही है यही सार बात है। आप जिस किसी में भी अपनी श्रद्धा या विश्वास रखते है कृपा करके उसे बनाये रखे।

श्रद्धा या विश्वास की बात आई है तो मई एक छोटा सा उदहारण देना चाहूंगा। एक सर्कस वाला व्यक्ति दो 80 फ़्लोर (मंजिल) वाली इमारतों के सबसे ऊपरी भाग में बीच में एक रस्सी बंधता है और उस पर बैलेंस (संतुलन) बना कर एक ईमारत से दूसरी ईमारत पर जाने का निश्चय करता है और देखने वाली भीड़ से पूछता है की क्या मई ये काम कर सकता हू सब जोर से कहते है "हाँ " , फिर वो अपने दो साथियो को कंधे पर बिठा कर उस रस्सी से एक ईमारत से दूसरे ईमारत तक पार कर के पहुँच  जाता है। उपस्थित भीड़ तालियों से उसे चीयर (अभिवादन) करती है।  अब वो कहता है कि भीड़ में से कोई व्यक्ति रस्सी पर चलने के दौरान उस पर बैठना चाहेगा तो सारी भीड़ में एक सन्नाटा सा छा  जाता है और कोई तैयार नहीं होता।

हमारी और आपकी श्रद्धा और विश्वास का यही हाल है। हम रोज ईश्वर के चमत्कारों और उसके बारे में पुराणो और ग्रंथो में पढ़ते  और सुनते है लेकिन जब खुद के यकीन की बारी आती है तो हमारा विश्वास  या श्रद्धा कही न कही कमजोर हो जाती है। इतना देखने , सुनने या जानने के बाद भी हम उस शक्ति या ईश्वर पर भरोसा नही कर पाते है। अगर हम उस परम शक्ति पर फुल 100 % भरोसा रखे तो हमारी लाइफ कितनी आनंद से भरी हो सकती है।  एक बार उस पर भरोसा कर के तो देखिये …!!!!!

हम आगे भी विचार विमर्श जारी रखेंगे फिर मिलेंगे तब तक के लिए

ॐ  शांति।
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