Wednesday, 30 September 2015

मनुष्य जीवन: ईश्वर का वरदान



जब कभी भी आप इस संपूर्ण ब्रम्हांड में सभी जीवो के बारे में विचार करें तो मुख्य रूप से चेतना की दृष्टि से इस भौतिक जगत में इसे दो मुख्य रूपों में बाँट सकते हैं।  एक पशु और दूसरा मनुष्य। वैसे तो जीवो के अनेक प्रकार है जैसे पेड़ पौधे, देव, दानव गन्धर्व आदि अनेक दूसरे लोको के विभिन्न प्रकार के जीव। इस भूमण्डल में मनुष्य एक श्रेष्ठ प्राणी समझा जाता है जब हम इसकी तुलना दूसरे अन्य जीवों से करते है। वनस्पतियाँ या पेड़-पौधे मनुष्य की तुलना में निम्न योंनि वाले जीव होते हैं ये अचल होते है और सिर्फ अपने को पोषित करके इस जगत में अन्य जीवों की भाँति अपने कर्मो का भोग शीत , ग्रीष्म आदि कष्टो को सहते हुए करते हैं। ये जड़ श्रेणी के अंतर्गत आते है।

पशु श्रेणी के अंतर्गत बहुत जीव आते है जो चल सकते हैं और चेतना के कारण सुख और दुःख का अनुभव भी कर सकते है। सभी पशु , पक्षी,कीड़े-मकोड़े आदि अपना समय भोजन,नींद,बच्चे पैदा करने और अपनी सुरक्षा करने में व्यतीत करते है। मुख्य रूप से ये इन चार कामो को ही पूरे जीवन में करते रहते हैं और अपने विगत कर्मो का भोग करते रहते है। इस संसार चक्र से बाहर निकलने की इनकी कोई सम्भावना नहीं होती है।

अब अगर हम मनुष्य की बात करे जिसे सभी जीवो में उन्नत और श्रेष्ठ माना जाता है वह भी भोजन की तलाश, आराम की नींद , बच्चे पैदा करना और अपनी सुरक्षा के उपायो में अपने जीवन का अधिकांश  समय खर्च कर देता है। हर व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब, कितने भी बड़े पद या प्रतिष्ठा वाला हो मुख्य रूप से इन चार चीजो में ही आनंद पाने की कोशिश करता हैं - आहार, नींद, मैथुन और भविष्य की सुरक्षा (Eating , Sleeping , Mating & Defending)। यह चार काम तो पशु भी बहुत अच्छी तरह से करते है तो फिर हम मनुष्य क्यों श्रेष्ठ कहलाते है ? जरा इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरुरत है। अगर आप अपने जीवन में इन चार चीजो को ही महत्व दे रहे है फिर तो आप के जीवन पशु जीवन में कोई अंतर नहीं हैं। फिर मनुष्य को क्यों श्रेष्ठ समझा जाय ?

इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये हमें अपने शास्त्रो और श्रीभगवत गीता की मदद लेनी होगी। मनुष्य जीवन में जीव अपने और भगवान के संबंध के बारे में जान सकता है। इस दुखो से भरे संसार चक्र से बाहर निकल कर कभी ना समाप्त होने वाले आनंद को पा सकता है। मनुष्य ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होकर भक्ति का आनंद ले सकता है। जबकि पशु इन सबको नहीं कर सकता है। सिर्फ और सिर्फ मनुष्य जीवन से ही इस निरंतर लाखो करोडो जन्मो से फ़से हुए जीव की मुक्ति संभव है।

ईश्वर ने विवेक नाम की एक ऐसी शक्ति मनुष्य को प्रदान की है जिसके द्वारा मनुष्य मुक्ति और आनंद का दरवाजा खोल सकता है। ये विवेक मनुष्य को सत्संग के बिना नहीं प्राप्त हो सकता और सत्संग बिना ईश्वर की कृपा के नहीं मिल सकता। हर हाल में उस परम शक्ति स्वरुप ईश्वर की करुणा अनिवार्य है।

मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है की हम अपने आपको इस संसार से मुक्त कर के ईश्वर की सहज भक्ति में लगाये और परम शाश्वत आनंद का अनुभव करे। अगले लेख में इन सबकी विस्तार से चर्चा करेंगे कि  विवेक और सत्संग से अपने जीवन को आनंद से भर सकते है।

ॐ शांति
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Thursday, 24 September 2015

बकरीद का सही मायने



जैसा कि आप सभी लोगो को मालूम है कल हमारे मुस्लिम  समाज का एक प्रमुख त्यौहार बकरीद हैं। वैसे तो यह ईद ही है लेकिन बकरो की कुर्बानी देने के कारण इसका नाम बकरीद प्रसिद्ध हो गया। इस त्यौहार की सभी मुस्लिम भाइयो को मुबारकबाद। अगर सही अर्थो में देखा जाय तो त्यौहार मनाने  के पीछे हमारा असली मकसद एक दूसरे से मिलना और रोज़ाना की ज़िन्दगी से कुछ वक़्त निकल कर थोड़ा चिंतन करना और आनंद और उन्नति के बारे में सोचना। वक़्त या समय बदलता रहता हैं , काल चक्र अनवरत घूम रहा है और इस के साथ कुछ पुरानी परम्पराये या रीतियाँ  जिनसे हम कुछ प्रेरणा ले सकते हैं उन्हें याद रखने के लिये हम जश्न या त्यौहार मनाने  की परंपरा रही है।

प्राचीन काल से ही मानव समाज में किसी ना किसी रूप में कुर्बानी या बलि देने की प्रथा रही है। इसके पीछे कई कारण है। अगर आप में से अधिकांश लोग ये मानते हैं की बलि या कुर्बानी से भगवान या अल्लाह खुश होंगे तो ये आप सबकी गलतफहमी है। दुनियाँ के हर धर्म का एक ही मकसद है कि इस दुनियाँ में जितने भी जीवात्माये हैं वो सभी आपस में प्रेम और आनंद के साथ आपसी सामंजस्य के साथ रहे। आज समस्या यही हैं की लोग धर्म की अपने अपने तरह से अर्थ निकाल रहे है और जो ईश्वर , अल्लाह और यीशू का आदेश है वह मानने को तैयार नहीं है। हम अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर हमारे धर्म ग्रंथो की मनगढ़ंत व्याख्याएँ कर रहे है और भोली भाली जनता उनका अंधानुकरण कर रही है।

उन्हें यह नहीं मालुम है कि ये प्रथायें किन परिस्थितियों में चालु हुई थी और उसके पीछे क्या उद्देश्य होता था। अब तो सिर्फ हम अपनी स्वाद की तुष्टि के लिए ही इन प्रथाओ को ज़िंदा रखे हुए है। इसको ही हम धर्म का नाम पर प्रचारित कर रहे है और दिन प्रतिदिन और मजबूत बनाते जा रहे है। भला कौन सा धर्म अनावश्यक मार काट और निरपराध लोगो का क़त्ल करने की अनुमति देगा। धर्म तो जोड़ना सिखाता है ना कि तोड़ना. धर्म का उद्देश्य प्रेम है ना कि हिंसा।

हिन्दू धर्म में भी बलि परम्परा रही है लेकिन  समय में प्रायः बहुत कम होती जा रही हैं। अब सांकेतिक बलि जैसे नारियल फोड़ना इत्यादि तरीके से हिंसा से बचा जाता है। ऐसे कार्य नहीं होने चाहिये जिससे रक्तपात और किसी जीव को कष्ट पहुंचे। भला हम किसी मासूम और निर्दोष जीव को मार कर कौन सा पुण्य या नेक काम करेंगे। मानवता और इन्शानियत की यही मांग हैं कि हमें किसी भी जीव को कष्ट पहुंचे ऐसा कार्य या प्रथाओ को बढ़ावा नहीं देना चाहिये

अगर क़ुरबानी या बलि देनी है तो अहंकार, ईर्ष्या, लोभ, क्रोध आदि दुर्गुणों की क़ुरबानी देनी चाहिये। जीवन में हिंसा को बढ़ावा देने वाले विचारो की बलि देनी होगी। एक दूसरे को नीचा दिखाना और अकारण ही किसी को दुःख पाहुछने जैसे विचारो की बलि देनी होगी। तभी हम एक सभ्य और सुन्दर समाज की रचना करने में सफल होंगे और धरती को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनायेंगे।  यही हमारा आने वाली भविष्य की पीढ़ियों को इन बेहतरीन तोहफा होगा।

आइये इस ईद हम सभी एक बेहतरीन इंसान बनने का और समाज में भाईचारा और बंधुत्व की भावना को बढ़ाने का संकल्प ले।
ॐ शांति
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Monday, 21 September 2015

राधाष्टमी का महत्व




हम सभी ने अभी कुछ दिनों पहले श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया। जैसा कि आप जानते हैं कि श्रीमती राधारानी के बिना हमारे श्यामसुंदर कभी पूर्ण नहीं हो सकते। आज श्री कृष्ण के आह्लादिनी शक्ति श्रीमती राधा जी का प्राकट्य दिवस है। भाद्रपद की शुक्लपक्ष अष्टमी के दिन ही राधाजी का इस धराधाम में प्राकट्य हुआ था। कहते है सोमवार के दिन था जब उनका प्राकट्य हुआ और संयोग से इस वर्ष राधाष्टमी सोमवार को ही आयी। यह बहुत ही पवित्र दिन है।  ब्रम्हाजी ने इसका महत्व बताते हुए महान भक्त और वैष्णव श्री नारदजी से कहा कि इस दिन व्रत करने से मनुष्य कभी भी नरक का द्वार नहीं देखता है और लाखो एकदशी व्रत का पुण्य, लाखो गौए दान करने का पुण्य और लाखो गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त होता है और साथ में उसे राधारानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 

आइये हम सभी इस अखिल वन्दनीय श्री राधा नाम की कुछ तात्विक अर्थ समझने की चेष्टा करते है। वैसे तो उनके बारे में मेरी मति में कुछ भी समझने या सोचने की क्षमता नहीं है फिरभी जो कुछ भक्तो और वैष्णवो से प्राप्त हुआ हैं वही आपके साथ साँझा (शेयर) कर रहा हूँ। श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार जो भी कोई कृष्ण राधा को दो मानता है या दो रूपों में देखता है वह नारायण की मूर्ति को दो भागो में खंडित करने का अपराध करता है। राधाजी सदा से ही श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है और सदैव उनका ही रूप है ये सिर्फ लौकिक और माधुर्य लीला के लिए ही २ रूप में दिखाई देते है। वास्तव में तो वह उस परम पुरुष आदि नारायण की ही अभिन्न शक्ति है। 

श्रीकृष्ण की भक्ति को प्राप्त करने वालो के लिए तो राधारानी का महत्व और बढ़ जाता है। इनके प्रसन्न होने से कृष्ण की भक्ति पाना सुनिश्चित हो जाता हैं। श्रीकृष्ण की माधुर्यलीला श्रीमती राधारानी के अपूर्ण है और बिना राधा कृपा से श्रीकृष्ण की कृपा पाना भी असंभव है। वैसे तो श्री भगवन की अनंत शक्तियाँ  और अनंत हैं उनमे से  तीन शक्तियाँ  प्रमुख रूप से है। 

1 . तटस्था शक्ति 
2 . बहिरंगा शक्ति 
3 . अंतरंगा शक्ति 

हम सभी जीव जैसे देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि श्रीभगवान की तटस्था शक्ति हैं और इस ब्रम्हांड में अपने किये कर्मो के अनुसार भिन्न भिन्न तरह के शरीरो में सुख और दुखो का अनुभव करता रहता है। माया के प्रभाव से ये जीवात्मा परमेश्वर से अपने संबंध को भुला बैठा है  दुखी रहता है। 

बहिरंगा शक्ति इस पूरे जगत को और ब्रम्हान्डो को नियंत्रित करने वाली शक्ति है। हम अपने आस-पास जो कुछ भी घटित होते देखते है जैसे सूर्य का निकलना, चन्द्र का निकलना, फसल पकना, फूलो का खिलना, नक्षत्रो और तारो की गति आदि अन्य भौतिक जगत की गतिविधिया ये सभी इसी बहिरंगा शक्ति के द्वारा ही संचालित होती है। इस शक्ति के और भी तीन प्रकार है - सत शक्ति, रज शक्ति और तम शक्ति।

अंतरंगा शक्ति के भी तीन प्रकार होते है।  संगिनी शक्ति अर्थात आधार शक्ति , चित्त शक्ति अर्थात ज्ञान शक्ति और आह्लादिनी शक्ति। आह्लादिनी शक्ति ही श्रीराधा रानी स्वयं है। एक कथा के अनुसार श्री राधा जी के पिता वृषभानु जी वृन्दावन के पास रावलगांव में रहते थे। एक दिन प्रातःकाल यमुना स्नान के लिए गए तो उन्हें एक कमल के पुष्प पर एक स्वर्णकांति से युक्त एक कन्या नदी में बहती हुई अपनी और आती हुई दिखी। उस कन्या का तेज सूर्य किरणों से और भी अधिक आलोकित हो। उनके कोई संतान नहीं थी अतः उन्होंने उसे ईश्वर की कृपा समझकर उसको घर में लाकर उसको पालना शुरू कर दिया। कहते है श्री राधारानी की आँखे जन्म के समय बंद थी और जब कुछ समय बाद यशोदा जी कन्हैया को लेकर वृषभानु जी के घर आई तो उन्होंने पहली बार आँख श्री कृष्ण के सम्मुख ही खोली।

अतः जो भी श्री कृष्ण की कृपा को प्राप्त करना चाहते है उन सभी के लिए श्री राधा जी की कृपा परम आवश्यक है। राधा जी कृपा प्राप्त होते ही भक्ति के मार्ग में कोई अड़चन नहीं आती और भगवन नारायण अति शीघ्र प्रसन्न होते है।

आइये एक बार फिर श्री राधा जी के जन्मोत्सव की आप सभी को बधाई।  जोर से बोलिए जय जय श्री राधे !

ॐ शांति
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Wednesday, 16 September 2015

गणेश चतुर्थी : कैसे मनायें ?



इस बार गणेश चतुर्थी का पर्व १७ सितम्बर , गुरूवार को है। धर्मग्रंथो के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इस दिन जी स्नान, उपवास और दान दिया जाता है, उसका फल श्री गणेश जी की कृपा से कई गुना हो जाता है ऐसा अपने शास्त्रो में वर्णन आता है। इस चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के नाम से पुरे भारतवर्ष में मानते है। कहा जाता है कि  इस दिन भगवन श्री गणेश का व्रत व पूजन करने से मनुष्यों की सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है। 

प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपनी सामर्थ्य और इच्छा के अनुसार सोने,चांदी,पीतल या मिट्टी से बानी भगवान  श्री गणेश की प्रतिमा की स्थापना करे। हालांकि  शास्त्रो मे मिट्टी की बानी प्रतिमा ही श्रेष्ठ मानी गयी है। जिस तरह कण कण में भगवान की कल्पना की गयी है,वह मिट्टी  से ही सार्थक होता है।संकल्प मन्त्र के बाद पुष्प , सिंदूर और गंगाजल आदि से प्रतिमा का पूजन व आरती करन चाहिए। मन्त्र बोलते हुए २१ दूर्वा दल अर्पित करके २१ लड्डुओं का भोग लगाना चाहिये। दूर्वा दल अर्पित करने के समय ये मन्त्र उच्चारण करे।  

ॐ गणाधिपतये नमः  

ॐ उमापुत्राय नमः 

ॐ विघ्ननाशनाय नमः 

ॐ विनायकाय नमः 

ॐ ईशपुत्राय नमः 

ॐ सर्वसिद्धप्रदाय नमः 

ॐ एकदन्ताय नमः 

ॐ इभवक्त्राय नमः 

ॐ मूषकवाहनाय नमः 

ॐ कुमारगुरवे नमः 

इन मंत्रो से पूजा करने से श्री गणेश अति प्रसन्न होते है। कल से गणेश उत्सव प्रारम्भ होने वाला है। घर -घर प्रतिमाओ की पूजन और स्थापना के बाद फिर विसर्जन भी करना होता है। अगर हम मिटटी की बनी प्रतिमाये पूजा में उपयोग में लाये जो की शास्त्रो के अनुसार श्रेष्ठ होती है तो बहुत अच्छा होगा। ऐसा करके हम पर्यावरण को बचने में भी अपना अमूल्य योगदान कर सकते है। 

बहुत ज्यादा ऐश्रव्य प्रदर्शन और शोर शराबे के स्थान पर भाव और भक्ति के साथ पूजन अधिक फलदायी होता है। मैंने देखा हैं कि इधर कई वर्षो से इस त्यौहार में भक्ति रस की कमी महसूस होने लगी है। लोग भद्दे फिल्मी गानो के साथ और नशो के सेवन करके इस त्यौहार को मनाते है जिससे मुझे बहुत पीड़ा का अनुभव होता है। 

मेरी सभी से ये गुजारिश है कि कृपा करके भक्ति के साथ सात्विक भाव में गणेश चतुर्थी मनाये। ईश्वर आप सभी की मनोकामनाए जरूर पूरी करेगा। मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि विश्व में सभी प्राणियों में आनंद और सदभाव की वृद्धि हो। 

ॐ शांति 
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Friday, 11 September 2015

जब श्री बाँके बिहारी जी गवाह बने




अगर आप ने कभी श्री वृन्दावन धाम के दर्शन किये है तो आप श्री बाँके बिहारी जी के प्रेम रस से भीगे बिना नहीं आ सकते। वृन्दावन धाम में भक्ति अपने परम ऐश्वर्य में नित्य निवास करती है। श्री राधा और कृष्ण सदा सर्वदा वृन्दावन धाम में परम आनंद दायक और भक्तो को सुख देने वाली लीलाये करते है। हमारा बाँके  बिहारी तो भक्तो के प्रेम का भूखा है। कोई उसे शुद्ध  प्रेम से बुलाकर देखे तो सही। श्री बिहारी जी महाराज की उपासना प्रेम-रस की उपासना है। वैसे तो कोई भी युग हो हमारे भगवान भक्तो के बीच में सदा ही विराजमान रहते हैं। वे कभी भी एक पल के लिए अपने भक्तो से दूर नहीं होते है।

आज जब मै ये देखता हूँ कि अधिकांश लोग कलियुग की दुहाई देते रहते है और ईश्वर में पूर्ण भरोसा करने में कतराते हैं तब मुझे उन सके प्रति करुणा होती है की कैसे वो हमारे श्री श्याम सुन्दर की कृपा से अनजान रह सकते है। वैसे तो भक्तो और भगवान के बीच में निरंतर ही प्रेम का आदान प्रदान होता रहता है। आज मै श्री बाँकेबिहारी जी से जुडी हुई एक सत्य घटना आपके सामने रखने जा रहा हूँ  हो सकता है आप सभी भक्तो में कई लोग इस घटना से पहले से ही परिचित हो।  फिर भी आइये एकाग्रचित्त होकर हम उनकी लीला का उन्ही की कृपा से वर्णन करने की कोशिश करते है।

बात आज से करीब ८०-९० वर्ष पहले की है। श्रीगोपालदास , जो की पेशे से एक साधारण अध्यापक थे अलीगढ़ में अपने पाँच प्राणियों के परिवार के साथ रहते थे। परिवार में २ पुत्र और १ पुत्री थी।  यूँ  तो उन्होंने अध्ययन करके ज्ञान बहुत अर्जित किया था लेकिन उन्हें ज्यादा पैसा कमाने की ललक नहीं थी। जितना मिलता था उतने में ही परिवार का पालन पोषण मजे में हो रहा था। सभी के साथ मित्रता स्थापित करना उनका एक गुण था और इस तरह काफी बड़े बड़े लोगो के साथ काफी जान पहचान हो गयी थी। उन्हें अपनी मित्र मण्डली और उनसे अपने सम्बन्धो पर पूरा भरोसा था।   लेकिन जब उनको पुत्री का विवाह करने का समय आया तो उनके किसी भी मित्र ने एक पाई की किसी भी तरह की मदद नहीं की।

अब उनके सामने ये प्रश्न था की आखिर कैसे पैसो की व्यवस्था हो। पुत्री के विवाह का दिन तेजी से नजदीक आ रहा था और इधर पैसो की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी।  आखिर कोई रास्ता ना देख कर विवाह के पांच दिन पहले सेठ लक्ष्मीचन्द से मकान गिरवी रख कर पैसो का इंतजाम किया। सेठ लक्ष्मीचन्द बहुत ही बेईमान किस्म का व्यक्ति था वो दो तरह की खाता बही रखता था और अक्सर लोगो से बेईमानी करके उनका मकान सामान  सब हड़प कर लेता था। विवाह के बाद गोपालदास जी ने घोर परिश्रम किया और चार महीने में ही सारा कर्जा सेठ को वापस कर दिया। हालाँकि  इस दौरान उनकी सेहत बहुत बिगड़ गयी।

इधर बेईमान सेठ लक्ष्मीचंद ने अपने वकील के जरिये नोटिस भेजा कि अमुक तारीख तक पूरा पैसा ब्याज सहित वापस कर दो या स्वेच्छा से माकन खाली कर दो , अन्यथा कोर्ट के जरिये कार्यवाही की जाएगी। नोटिस पढ़ते ही जैसे गोपालदास जी के ऊपर तो जैसे वज्रपात हो गया उन्होंने तो कभी कोर्ट में जीवन में कदम नहीं रखा था। उन्हें पता था की न्याय के इन मंदिरो में अन्याय का खुला तांडव होता है। उन्होंने अपने कई मित्रो से मदद मांगी लेकिन कोई भी सेठ लक्ष्मीचंद से व्यर्थ में ही बैर नहीं लेना चाहता था। गोपालदास जी ने स्वयं सेठ लक्ष्मीचंद से मुलाकात की लेकिन उसने उनकी एक न सुनी उल्टा बे-इज्जती भी की और मकान उसके नाम से रजिस्ट्री करने के लिए दबाव बनाया।

सब ओर  से हारने और परेशान होने के बाद उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। संयोग से हरियाली तीज के अवसर पर एक बस वृन्दावन धाम श्री बाँकेबिहारी जी के झूलनोत्सव पर भक्तो को लेकर जा रही थी। उस बस में उनका ही एक शिष्य कंडक्टर था तो मास्टर साहब बिना इस बात का पता लगाये की बस कहाँ जा रही है उस बस में चढ़ गए। खैर उस बस के कंडक्टर ने मास्टर साहब को आवभगत के साथ बैठने का स्थान दिया। इसके पहले मास्टरसाहब ने बाँकेबिहारी  जी के दर्शन कभी नहीं किये थे। यात्रा के दौरान सह यात्रियों ने और कंडक्टर ने श्री बिहारी जी से सम्बंधित चमत्कार और घटनाये मास्टर जी को सुनाई जिससे गोपालदास जी के मन में एक तृप्ति का अनुभव हुआ।

उनके शिष्य ने वृन्दावन पहुचने पर अपने साथ श्री बिहारीजी के मंदिर ले गया और दर्शन कराये। श्री बांके बिहारी जी  के सामने अपने जीवन की डोर सौप कर निश्चिन्त हो गए। जैसे ठाकुर जी की करुणा की वर्षा उन पर होने लगी घर वापस लौटने पर उनके अंदर एक अभूतपूर्व आत्मविश्वास जाग उठा था। बिना किसी वकील की सहयता के वो खुद ही कोर्ट में पहुंचे और अपनी सारी  बात विस्तारपूर्वक जज को सुना दी। उन्होंने किस तारीख में कितनी रकम सेठ को लौटाई थी इन सबका विवरण कोर्ट में दे दिया। लेकिन जब सेठ की खाता-बही देखी गयी तो उसमे पैसे लौटने का कोई विवरण नहीं मिला। क्योकि बेईमान सेठ दो तरह की खाता - बही रखता था। अब जज ने गोपालदास जी से कहा कि अगर तुमने पैसे लौटाए है तो खाता बही में उसका विवरण क्यों नहीं है ? गोपालदास जी ने पुरे आत्मविश्वास के साथ कहा हुजूर मैंने स्वयं अपने हाथो से सारी किस्तें जमा की है। यह सुनकर जज ने कहा कि , "अच्छा , तुम्हारा कोई गवाह है , जो यह कह सके कि मेरे सामने इन्होने रुपये जमा किये है। यदि कोई हो तो नाम बताओ। "

अब वे सोचने लगे कि किसका नाम लिया जाय कौन इस वक़्त काम आ सकता हैं। लेकिन उन्हें किसी मित्र या रिस्तेदार नज़र नहीं आया क्योकि अब उनकी ज़िन्दगी में कोई साथ देने वाला भरोसे का व्यक्ति नहीं रह गया था। इसी उधेड़बुन के बीच सहसा उनके निराश ह्रदय में श्री बांकेबिहारी जी प्रकट हुए जो की त्रिभंग ललित मुद्रा में मुस्करा रहे थे। उन्होंने मन ही मन श्री बांके बिहारी जी वंदना की।  तभी वकील  ने टोका - "हुजूर कोई गवाह का नाम तो बताइये।  पैसे किसके सामने दिए है ?" गोपालदास जी के मुख से सहसा निकल गया - "गवाह का नाम है : श्री बाँकेबिहारी  जी। मैंने जब जब सेठ को पैसे दिए है वो हमेसा मेरे साथ थे।  मेरे पास थे। "

"पूरा पता बोलो।" उनसे पूछा गया।
"वृन्दावन, मथुरा। "
"बाप का नाम क्या है बाँकेबिहारी  जी के ?"
" बाप का नाम  ..... SSS " - गोपालदास जी सकपकाये, फिर अचानक उनके मुख से निकला - "स्वामी हरिदास"

कोर्ट ने फिर बांकेबिहारी के  अगली तारीख में कोर्ट में हाज़िर होने का सम्मन जारी कर दिया।  कोर्ट का चपरासी जब लिखे पते पर सम्मन  लेकर वृन्दावन पहुँचा  तो तक साँवला  सलोना लड़का पास आया और बोला "मै  उनका घर बताता हूँ , तुम कहाँ भटकोगे ?" दोपहर  का समय था।  मंदिर के कपट बंद थे। बालक ने चपरासी को आग्रह करके वो सम्मन द्वार पर चस्पा (चिपका) करवा दिया और कहा की " मै  उनसे कह दूंगा, वह जरूर आवेगा। तुम्हारा काम हो गया , जाओ। "

अब कोर्ट की तारीख में एक दिन शेष था। गोपालदास जी ने घर पर कहा - "मै  वृन्दावन जा रहा हूँ - गवाह तैयार करने, परसो कोर्ट में पेशी है। " यह सुनकर घर में सबने उनका मजाक उड़ाना चालू कर दिया और व्यंग कसने लगे। वे वृन्दावन गए और मन्दिर  में जाकर रो रो कर याचना की - " हे प्रभो, हे स्वामी,  हे अंतर्यामी ! अब मेरी लाज आपके ही हाथ में है। " उनकी  आँखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। जब दर्शन बंद हो गए तो उनकी आँख वही उनकी देहली पर लग गयी और वो  वही सो गये। रात को स्वप्न में स्वयं प्रकट होकर श्रीबिहारीजी ने प्रकट होकर कहा - " चिंता मत करो, गवाही मै दूँगा। "

निश्चित तारीख को कोर्ट में गवाह का नाम २ बार पुकारा गया परन्तु कोई भी जवाब नहीं आया। तीसरी बार जब नाम पुकारा गया तो उत्तर आया - 'हाजिर है'

एक वृद्ध व्यक्ति काले कम्बल में लिपटा हुआ कोर्ट में आया और कठघरे में आकर खड़ा हो गया। मुंसिफ ने पूछा आप इनके गवाह है ? गवाह ने स्वीकृति में सर हिला दिया। मुंसिफ ने फिर से कहा - " मुँह  खोल कर साफ़-साफ़ बयां कीजिये- आपका नाम क्या है ?"

गवाह ने जरा सा मुँह खोलकर मुंसिफ की और देखा और बोला -"बिहारी"
नाम सुनने के साथ साथ जैसे ही मुंसिफ ने श्रीमुख की आभा को देखा उसके हाथ से कलम गिर गयी और वह आगे प्रश्न करना ही भूल गया। फिर गवाह अपने आप ही बोला - "गोपालदास ने जितने भी रूपये लिए थे वो ब्याज सहित वापस कर दिए गए है। यदि आपको इसका प्रमाण चाहिये तो सेठ लक्ष्मीचन्द की गद्दी के सीधे हाथ की और वाली अलमारी के ऊपर के खन में एक पीले रंग की बही रखी है। उसमे सारा रुपया 'दास' के नाम से जमा है। वह दो नंबर की बही है। आपको अधिक तकलीफ न हो, इसके लिए मै  बही के पन्नो की संख्या और दिनांक के अनुसार जमा की गयी राशि बतला रहा हूँ , आप बही माँगा कर मिलान कर ले। " इसके बाद गवाह ने दिनांक र राशि का पूरा विवरण दिया। सेठ लक्ष्मीचंद खड़ा खड़ा थर थर काँप रहा था।

फिर मुंसिफ ने कहा - "तुम बही को पहचान सकते हो?"
"जी हुजूर," गवाह ने उत्तर दिया।

मुंसिफ ने उसी समय दो चपरासी लेकर वकील, लक्ष्मीचंद , गवाह और गोपालदास के साथ लक्ष्मीचंद के मकान पहुँचा। वहाँ  जैसा कुछ गवाह ने बताया था वैसा ही मिला। मुंसिफ ने पलट कर देखा - गवाह अब वहाँ नहीं था। सभी लोग एक अजीब तरह के आश्चर्य भरी निगाहो से एक दूसरे की तरफ देखने लगे और गोपालदास जी की आँखो से प्रेम भरे अश्रुओ की धरा बहने लगी। 

श्री बिहारीजी की अहैतुकी कृपा  के बाद से गोपालदासजी कभी घर नहीं लौटे। न्यायधीश ने भी त्याग-पत्र देकर ,वृन्दावन वास करने का निश्चय किया। इस घटना का बहुत से व्यक्तियों पर ऐसा रंग चढ़ा की बिहारीजी की भक्ति के रस में डूब गए। मेरी यही प्रार्थना है कि  आप सभी के  बांके बिहारी जी का प्रेम रस बरसता रहे। 

बोलो श्री बांकेबिहारी लाल महाराज की जय...  !!!!

फिर मिलेंगे
ॐ शांति।
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Thursday, 10 September 2015

हमारा वास्तविक स्वरुप




अगर आपसे कोई पूछे कि आप कौन है तो तुरंत अपना नाम बता देते है। हम अपनी जाति , अपने कुल, अपने शहर , अपने देश आदि के बारे में भी बता देते है। इतना परिचय इस भौतिक संसार के लिए बहुत है। लेकिन जरा गौर से सोचे तो क्या वाकई में यही हमारी असली पहचान है ? उत्तर होगा -"निश्चित रूप से नहीं " यह तो हमारे शरीर की पहचान है।  वास्तव में इस शरीर के अंदर के अंदर भी एक तत्व हैं  जिसे हम अपनी शुद्ध अवस्था में अनुभव कर सकते है, ध्यान या समाधि  में अनुभव कर सकते है और उसी तत्व को हम आत्मा या जीवात्मा कह कर जानते है। वस्तुतः ये आत्मा ही हमारी असली पहचान है और यही हमारा असली स्वरूप है। बाकी जितनी पहचान या जिनके द्वारा इस जीवन में हमें लोग जानते है वास्तव में वह बहुत अल्प समय के लिए है और हमारी असली पहचान नहीं है। ये नाम , शक्ल, आदि तो शरीर की पहचान है।

दुर्भाग्य से हम में से अधिकांश  लोग इस शरीर को ही अपना असली स्वरुप को ही अपना सच्चा स्वरुप समझ बैठते है और इससे जुड़ी हर चीज के प्रति आशक्त या मोहित रहता है और अज्ञानवश सुख और दुःख का अनुभव करता रहता है। हम यह समझते है कि  हमारा जन्म हो रहा हैं  या हमारी मृत्यु हो रही है , हमारा मान सामान हो रहा हैं या हमारा अपमान हो रहा है लेकिन ये सब तो हमारे शरीर के साथ हो रहा है उससे जीवात्मा को कुछ भी लेना देना नहीं है और हम व्यर्थ में ही इसे अधिक महत्व देकर निरंतर परेसान रहते है।

श्री भगवतगीता में भगवन श्री कृष्ण  स्पष्ट कह रहे है कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, और व्याधियां तो शरीर से जुडी है। हमारा आत्मा तो न कभी जन्म लेता है न इसकी कभी मृत्यु होती है।  यह तो अनादिकाल से अविनाशी है इसका कभी भी विनाश नहीं होता। इसका न तो कभी सम्मान होता है न कभी अपमान होता है। ये अपने शाश्वत रूप में विद्यमान मन रहता है। इस शरीर के द्वारा किये गए कर्मो के अनुसार यह आत्मा विभिन्न विभिन्न शरीरो में वास करता हैं. ये शरीर कुछ भी हो सकता है जैसे मनुष्य, देव, राक्षश , यक्ष, गन्धर्व, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ , कीड़े-मकोड़े आदि आदि। अपने द्वारा किये गए कर्मो के आधार पर ही इस आत्मा को 84 लाख शरीरो में कोई एक शरीर में रहन होता है और यही चक्र अनवरत चालू है। मनुष्य भिन्न-भिन्न शरीरो में पता नहीं लाखो - करोडो जन्मो से कर्म भोग करता आ रहा है।

अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान न होने से अत्यंत कष्ट में जीता हुआ मनुष्य कभी भी सच्चा आनंद का अनुभव नहीं कर पता। वह जब भी नया शरीर धारण करता हैं  उस देह के प्रति ही आशक्त हो जाता है और पुनः अच्छे-बुरे कर्मो से अपने लिए एक नए शरीर की रुपरेखा तैया कर लेता है। सभी शरीरो में मनुष्य देह सर्वश्रेष्ठ है और इस देह में आत्मा अपने  स्वरुप को किसी सद्गुरु की साहयता से पहचान सकता है और उस परमेश्वर की शरण होकर अनंत आनंद की प्राप्ति कर सकता है। देवता भी इस श्रेष्ठ मनुष्य जीवन की कामना रखते है।

गोस्वामी तुलसीदास जी श्री रामचरित मानस में मनुष्य देह की महिमा को कुछ इस प्रकार लिखते है :

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सब ग्रंथनि गावा।।

अपने सच्चे स्वरुप की पहचान ही आपका अनंत आनंद की तरफ पहला कदम है। ईश्वर की अनुकम्पा से मै फिर आप सब से मिलूंगा।

ॐ शांति।
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Monday, 7 September 2015

जन्माष्टमी का पूर्ण लाभ






प्रिय पाठको, आप अभी को संपूर्ण जगत के आधार श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाये। भगवान श्री कृष्ण हम सभी के जीवन में दिव्य आनंद का संचार करे। मैंने भी इन पिछले दो दिनों में भक्तो के साथ नन्दोत्सव मनाया और आनंद के सागर में डुबकियां लगायी जो कि लिखने में असमर्थ हूँ। 


पिछले लेख में हम चर्चा कर रहे थे कि हम सभी जीव कभी सच्चे अर्थो में स्वतंत्र नहीं हो सकते।  हम किसी न किसी  अधीन ही जीवन जी सकते है। मर्ज़ी आपकी हैं  चाहे तो संसार के दास बन जाओ या फिर प्रभु के दास बन जाओ।क्या कभी आपने सोचा हैं की भगवन को इस मृत्युलोक में , इस धराधाम में क्यों अवतार लेना पड़ा ? जिनकी नेत्रों के सिर्फ एक चितवनमात्र से अनंत अनंत ब्रम्हान्डो का विनाश  हो जाता है फिर उन्हें इन थोड़े से दुष्ट राक्षशो के वध लिये स्वयं आना पड़ा। श्री कृष्ण अवतार पूर्ण परमब्रम्ह अवतार है उनमे और संपूर्ण ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। भगवन कृष्ण संपूर्ण कलाओ के साथ और सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ इस धरा धाम में प्रगट हुए है। 

उनका अवतार हम सभी जीवमात्र के लिए एक करुणा स्वरुप ही हैं। हम सभी को उनकी लीलाओ का श्रवण और पाठन करके आनंद लाभ लेना चाहिये  और उनकी कृपा को प्राप्त करना चाहिए। यह बहुत ही सरल है , हमें सिर्फ उस भगवन कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित होना है और उनसे प्रेम का सम्बन्ध बनाना हैं। अगर इतना सा काम हम में से कोई भी कर लेता है उसके जनम जनम के अगणित कर्मो के बंधन नष्ट हो जाते है और वह शास्वत आनंद का अधिकारी हो जाता है। श्री भगवतगीता के १८वे अध्याय में भगवान कृष्ण स्वयं कहते है :

सर्व धर्म परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज। 
अहं त्वाम सर्व पापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा  सुचः। 

इसका अर्थ है : सभी तरह के कर्मकांडो  और रीति रिवाजो को छोड़  कर सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के शरण में जाइये। वे आपको सभी तरह के पापो से मुक्त कर देंगे , तनिक भी चिंता करो। स्वयं श्री कृष्ण खुद आपको इतना बड़ा वचन दे रहे है फिर भी कोई महामूर्ख ही होगा जो उनकी शरण ग्रहण न करे। 

आप मुझे गलत मत समझे कि मै आपको आपका घर-व्यवसाय छड़ने को कह रहा हूँ।  आप सिर्फ इन २४ घंटो में कुछ घंटे, कुछ मिनट, कुछ सेकंड या कुछ पल भी श्री कृष्ण  को अर्पण करेंगे तो वह तुम्हारा निश्चित रूप में कल्याण करेंगे इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं होना चाहिए। 

अतः सच्ची जन्मष्टमी तभी आपके लिए लाभदायक होगी जब आप कृष्ण को प्रेम करे वह भी बिना किसी स्वार्थ के। अगर प्रेम में स्वार्थ है तो वो प्रेम सच्चा प्रेम नहीं बल्कि व्यापार हो गया। वो तो अपने भक्तो को ,  प्रेमियों को बहुत प्रेम करता है लेकिन एक हम ही है कि हम उसके पास अपनी तरह तरह की इच्छाओ के साथ व मनोकामनाओ को लेकर जाते है और फिर हम सोचते है की हम उसकी भक्ति कर रहे है। लेकिन कुछ मांगने के लिए की गयी भक्ति प्रेम नहीं सिर्फ एक सौदा होती है। अतः बेहतर यही है अपने कन्हैया को हृदय की गहराइयो से प्रेम करो वह आपको अनंत गुना प्रेम से भर देगा। 

आप थोड़ी सी कोशिश करके देखो वो अपनी कृपा आप पर जरूर करेगा। वो तो शुद्ध भक्तो के इंतज़ार में बैठा है की अरे कोई तो आये और उसे सुद्ध प्रेम करे। 

बाकी की बाते फिर कभी। 

ॐ शांति। 
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Wednesday, 2 September 2015

क्या हम सभी जीव स्वतंत्र हो सकते हैं ?



आज का शीर्षक पढ़ कर कुछ लोग के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि ये किस तरह का प्रश्न है ? इस भौतिक संसार के अनुसार आप एक आज़ाद देश के एक आज़ाद नागरिक है लेकिन मेरा मतलब यहाँ इस भौतिक या झूठी स्वतंत्रता से नहीं है। हालांकि अगर भौतिक रूप से भी देखे तो आज भी हमारी मानसिकता गुलामी की ही हैं और हमें अपने देश की तुलना में बाहरी देशो के रीति -रिवाज़ या जीवन पद्धत्ति ज्यादा श्रेष्ठ प्रतीत होती है। खैर छोड़िये इस भौतिक स्वतंत्रता या गुलामी की चर्चा फिर कभी। आज हम विचार करते हैं  कि क्या एक जीव कभी स्वतंत्र हो सकता है ?

हमने अपने पिछले ब्लॉग में जीव के बारे में चर्चा की थी।  वास्तव में इस जगत में हम जितने भी प्राणी देखते हैं कोई भी स्वतंत्र नहीं है। चाहे मनुष्य हो या देवता सभी लोग किसी न किसी के गुलाम अवश्य है। हम वास्तव में कभी भी स्वतंत्र हो ही नहीं सकते। आप जरा ध्यान से सोचिये कि हर मनुष्य चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक स्वतंत्र कोई भी नहीं है। आपको किसी न किसी की तो गुलामी करनी होगी चाहे संसार की कर लो चाहे उस परमपिता ईश्वर की कर लो। आपके पास दोनों विकल्प हैं चाहे संसार के दास बन जाओ चाहे तो हरि  के दास बन जाओ। अगर और गहराई से सोचो तो वैसे भी हम सभी मूलतः हरि  के दास तो है ही सिर्फ माया, अज्ञान और अहंकार के कारण हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते और निरंतर इस नश्वर संसार में अपने संचित कर्मो के बंधन के अनुसार  क्षणिक दुःख और सुख का अनुभव करते रहते है।

बेहतर तो यही होगा कि हम काम , क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, दंभ और मिथ्या घमंड की गुलामी ना कर के हमारे उस नारायण, उस हरि , उस कन्हैया, उस परम आत्मा श्री भगवान की शरणागति हो जाये तो हमें परम आनंद व परम सुख की प्राप्ति संभव हो सकेगी। हमें कुछ अलग से करने की जरुरत नहीं है , हमें सिर्फ हमारा वास्तविक स्वरुप और वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने की जरूरत हैं। हम उस परम सत्ता में पूर्ण समर्पण न करके इस प्रकृति जो कि उस ईश्वर की ही शक्ति का एक विस्तार हैं, को अपने वश में करना चाहते है। हम इस प्रकृति के मालिक होने की चाह कर बैठे हैं और कितने लोग तो अपने को इस संसार में सब सर्वश्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न मानते भी हैं। मुझे तो ऐसे लोगो की स्थिति को देखकर करुणा आती हैं की अगले पल का तो पता नहीं हैं फिरभी न जाने क्यों आज का मानव इस विशाल अनंत शक्तिशाली प्रकृति पर अधिकार करने की कोशिश करता रहता है और यही हमारे दुखो का मूल कारण है।

मेरा अपना निजी अनुभव तो यही कहता है किए उस परमपिता परमेश्वर की पूर्ण शरणागति ही सच्चे सुख का मार्ग है , आनंद का मार्ग हैऔर मुक्ति का मार्ग है। चलिए बाकी  की बाते फिर कभी।

ॐ  शांति
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