समस्त देशवाशियो को करवा चौथ व्रत की सुबह कामनाये। ये व्रत हमारी गौरवशाली संस्कृति का एक हिस्सा रहा है। ये व्रत पति के मंगल और दीर्घायु के लिए हमारे देश में प्राचीन काल से ही होता आया हैं। मै सभी मातृ शक्तियों को सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ। इसी से सम्बंधित मै एक प्रसंग आप सब से साँझा करने जा रहा हूँ।
बात उन दिनों की है जब पांडव वनवास में अपनी माता कुंती और पत्नी द्रौपदी के साथ वन में अपने दिन गुजार रहे थे। उसी समय एक दिन भगवन श्री कृष्ण अपनी पटरानी सत्यभामा समेत पांडवो से मिलने काम्यक वन जा पहुँचे। सत्यभामा को यह देख कर बहुत अचम्भा हुआ कि पाँचो पांडव द्रौपदी को समान प्यार और सम्मान देते है। सत्यभामा ने द्रौपदी को एकांत में पूछा कि आप किस प्रकार इतने तेजस्वी और अलग अलग स्वभाव के वीर पतियों को प्रसन्न रखती हो ? क्या आप कोई तंत्र, मन्त्र , जादू, जप-तप , वशीकरण, स्नान-ध्यान, व्रत-उपवास जानती है ? कृपा कर के मुझे वह उपाय बताओ जिससे कि मैं द्वारकाधीश को अपने वश सकूँ।
द्रौपदी ने उत्तर दिया कि आपने यहाँ पर जिन उपायो का नाम लिया हैं वह सब कुटिल स्वाभाव की स्त्रियाँ करती है। तंत्र-मन्त्र, जादू आदि से स्त्रीं अपने पति को वश में रख ही नहीं सकती। मूर्खतावश जादू और तंत्र के प्रभाव में आकर स्त्रियाँ पतियों को चीजे खिला देती है जिससे की कोढ़ , पागलपन, बहरेपन आदि की समस्याये हो जाती है। इसके कुछ उपाय है वह मई संक्षेप में बताती हूँ।
मेरी पूजनीया सांस माँ ने घर-परिवार और पति के लिए जो कर्तव्य बताये है मै उनके पालन से कभी नहीं डिगती। अपने सांस की बुराई कभी नहीं करती हूँ , पतियो को कभी हीनभाव से नहीं देखती हूँ और भोजन, वस्त्र आदि में शिकायत का प्रयास नहीं करती हूँ।
सत्यभामा, मई कभी कठोर वचन का प्रयोग नहीं करती हूँ और न ही कभी संदेह करती हूँ। विवाद का मौका आने पर उसे ताल जाती हूँ और पतियों के घर से बाहर रहने पर न तो बुरी संगति में बैठती हूँ और न अतिरिक्त श्रृंगार वगैरह करती हूँ। मैंने परिवार के परिचितों से लेकर पुरखो तक सभी के बारे में गहराई से जानकारी। और सभी के प्रति उचित कर्तव्य का निर्वाह करती हूँ।
देवपूजा,पर्व और श्राद्ध आदि के मौके पर माननीयों की पूजा का हमेशा ध्यान रखती हूँ। अनाज और दूसरी वस्तुओ की भंडार में क्या स्थिति है यह मुझे हमेशा पता रहता है। पति की सेवा का मौका चूकती नहीं हूँ, समय पर भोजन देती हूँ , पहले जागती और बाद में सोती हूँ। उनकी पसंद समझ कर उनके मन मुताबिक ही काम करती हूँ। राज्य के खजाने में कितना आया और कितना गया यह मेरी नज़र में होता था। अस्तबल में कितने हाथी और घोड़े है और लाखो दास- दासियों के नाम और सबकी गिनती मुझे पता रहती थी।
रोजाना आठ हजार ब्राम्हण, दस हजार ब्रम्हचारी साधुओ और अट्ठासी हजार स्नातको को भोजन करवाना, अन्न , वस्त्र और दान का काम मैं ही संभालती थी। अपनी भूख और प्यास भूलकर पति, सांस और परिवार की सेवा में लगे रहना और पतियों को तमाम काम-काज से इस तरह निश्चिंत कर देना की वे आराम से अपने धर्म-कर्म में प्रसन्न मन रह सके। यही मेरा पतियों को वश में करने का उपाय है।
स्त्री को अपने स्वाभाव से पति का ह्रदय जीत लेना चाहिए। पति को यह लगने लगे कि अब पत्नी के बिन सरलता से एक पग भी नहीं चला जा सकता, उसकी पत्नी स्वयं से भी ज्यादा अच्छे से समझती है। ऐसी पत्नियों के पुरुष उनके वश में हो जाते है। (श्रोत: महाभारत वनपर्व)
ॐ शांति
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