Friday, 30 October 2015

स्त्रियों के खुशहाल जीवन के सूत्र



समस्त देशवाशियो को करवा चौथ व्रत की सुबह कामनाये। ये व्रत हमारी गौरवशाली संस्कृति का एक हिस्सा रहा है। ये व्रत पति के मंगल और दीर्घायु के लिए हमारे देश में प्राचीन काल से ही होता आया हैं। मै  सभी मातृ  शक्तियों को सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ। इसी से सम्बंधित मै  एक प्रसंग आप सब से साँझा करने जा रहा हूँ।

बात उन दिनों की है जब पांडव वनवास में अपनी माता कुंती और पत्नी द्रौपदी के साथ वन में अपने दिन गुजार  रहे थे। उसी समय एक दिन भगवन श्री कृष्ण अपनी पटरानी सत्यभामा समेत पांडवो से मिलने काम्यक वन जा पहुँचे। सत्यभामा को यह देख कर बहुत अचम्भा हुआ कि पाँचो पांडव द्रौपदी को समान प्यार और सम्मान देते है। सत्यभामा ने द्रौपदी को एकांत में पूछा कि  आप किस प्रकार इतने तेजस्वी और अलग अलग स्वभाव के वीर पतियों को प्रसन्न रखती हो ? क्या आप कोई तंत्र, मन्त्र , जादू, जप-तप , वशीकरण, स्नान-ध्यान, व्रत-उपवास जानती है ? कृपा कर के मुझे वह उपाय बताओ जिससे कि  मैं द्वारकाधीश को अपने वश  सकूँ।

द्रौपदी ने उत्तर दिया कि  आपने यहाँ पर जिन उपायो का नाम लिया हैं  वह सब कुटिल स्वाभाव की स्त्रियाँ करती है। तंत्र-मन्त्र, जादू आदि से स्त्रीं अपने पति को वश  में रख ही नहीं सकती। मूर्खतावश जादू और तंत्र के प्रभाव में आकर स्त्रियाँ पतियों को चीजे खिला देती है जिससे की कोढ़ , पागलपन, बहरेपन आदि की समस्याये  हो जाती है। इसके कुछ उपाय है वह मई संक्षेप में बताती हूँ।

मेरी पूजनीया सांस माँ ने घर-परिवार और पति के लिए जो कर्तव्य बताये है मै उनके पालन से कभी नहीं डिगती। अपने सांस की बुराई कभी नहीं करती हूँ , पतियो को कभी हीनभाव से नहीं देखती हूँ और भोजन, वस्त्र आदि में शिकायत का प्रयास नहीं करती हूँ।

सत्यभामा, मई कभी कठोर वचन का प्रयोग नहीं करती हूँ और न ही कभी संदेह करती हूँ। विवाद का मौका आने पर उसे ताल जाती हूँ और पतियों के घर से बाहर रहने पर न तो बुरी संगति में बैठती हूँ  और न अतिरिक्त श्रृंगार वगैरह करती हूँ। मैंने परिवार के परिचितों से लेकर पुरखो तक सभी के बारे में गहराई से जानकारी।  और सभी के प्रति उचित कर्तव्य का निर्वाह करती हूँ।

देवपूजा,पर्व और श्राद्ध आदि के मौके पर माननीयों की पूजा का हमेशा  ध्यान रखती हूँ। अनाज और दूसरी वस्तुओ की भंडार में क्या स्थिति है यह मुझे हमेशा पता रहता है। पति की सेवा का मौका चूकती नहीं हूँ, समय पर भोजन देती हूँ , पहले जागती और बाद में सोती हूँ। उनकी पसंद समझ कर उनके मन मुताबिक ही काम करती हूँ। राज्य के खजाने में कितना आया और कितना गया यह मेरी नज़र में होता था। अस्तबल में कितने हाथी और घोड़े है और लाखो दास- दासियों  के नाम और सबकी गिनती मुझे पता रहती थी।

रोजाना आठ हजार ब्राम्हण, दस हजार ब्रम्हचारी साधुओ और अट्ठासी हजार स्नातको को भोजन करवाना, अन्न , वस्त्र और दान का काम मैं ही संभालती थी। अपनी भूख और प्यास भूलकर पति, सांस और परिवार की सेवा में लगे रहना और पतियों को तमाम काम-काज से इस तरह निश्चिंत कर देना की वे आराम से अपने धर्म-कर्म में प्रसन्न मन  रह सके। यही मेरा पतियों को वश  में करने का उपाय है।

स्त्री को अपने स्वाभाव से पति का ह्रदय जीत लेना चाहिए। पति को यह लगने लगे कि अब पत्नी के बिन सरलता से एक पग भी नहीं चला जा सकता, उसकी पत्नी  स्वयं से भी ज्यादा अच्छे से समझती है। ऐसी पत्नियों के पुरुष उनके वश  में हो जाते है। (श्रोत: महाभारत वनपर्व)

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Wednesday, 28 October 2015

साधु पुरुष के कुछ लक्षण



हमें अक्सर हमारे घरों और स्कूल में यह सिखाया जाता हैं कि हमेशा अच्छे लोगो का संग करो। संगति का जीवन में बहुत महत्व होता है। हम जिन लोगो के साथ अपना समय व्यतीत करते है उनका प्रभाव हमारे स्वाभाव व जीवन पर बहुत अधिक गहरा होता है। हमें कुसंग से बचना चाहिये और हमेशा साधु पुरुषो का संग करना चाहिये अर्थात सत्संग का अवसर ढूंढ़ते रहना चाहिये। 

"सठ सुधरहि सत संगति पाही "

"एक घड़ी आधी घडी , आधी में पुनि आध।
तुलसी संगति साधु की, हरे कोटि अपराध।"

कुसंग के कारण ही महारानी कैकेयी क्या से क्या हो गयी थी। साधू पुरुष का संग पाकर रत्नाकर डाकू ब्रम्हज्ञानी हो गया और बालक ध्रुव ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में नारद मुनि के सत्संग से परम अटल पद और ईश्वर की कृपा प्राप्त की। ऐसे अनेको उदहारण हमारे वर्तमान जीवन में और इतिहास में देखने को मिलते है। यहाँ पर महत्वपूर्ण बात यह है कि साधु पुरुष की पहचान कैसे की जाय। किस तरह पहचाना जाए कि कौन साधु पुरुष है या कोई ढोंगी पुरुष है। यहाँ पर साधु पुरुषो के कुछ लक्षणों की चर्चा की जा रही है।

साधु पुरुष का प्रथम लक्षण होता है सहनशीलता। जी हाँ , सहनशील होना अपने आप में महान तप है। अगर आप सहनशील हैं तो आप बात बात पर क्रोधित नहीं होंगे जिसके परिणामस्वरूप आपकी बुद्धि ठीक ढंग से कार्य करेगी और आप जीवन में सही निर्णय करेंगे। अच्छे और बुरे दोनों में ठीक ढंग से अंतर कर पायेंगे।

दूसरा लक्षण है करुणामय होना। एक साधु पुरुष हमेशा ही करुणा से भरा होता है। ईर्ष्या और जलन  दुर्गुणों से बहुत दूर होता है ऐसा पुरुष। संसार में हर प्राणिमात्र के प्रति उसका मन सदैव ही करुणा और दया से भरा होता है और हमेशा लोक कल्याण के बारे में ही सोचता है। वह बिना स्वार्थ के ही दुसरो की भलाई के कार्यो में ही लगा रहता है।

साधु पुरुष का तीसरा महत्वपूर्ण लक्षण होता है समदर्शी होना। समदर्शी होने का अर्थ है सभी प्राणिमात्र के प्रति मित्रवत व्यवहार करना। दूसरे शब्दों में कहे की साधु का कोई भी शत्रु नहीं होता। वह सम्पूर्ण सृस्टि में सभी प्राणियों के प्रति कभी भी भेदभाव नहीं करता। वह ब्राम्हण, चाण्डाल , ज्ञानी और मूर्ख  में कोई भेदभाव नहीं करता।

साधु पुरुष का एक महत्वपूर्ण लक्षण है कि वह अपना जीवन प्रामाणिक ग्रंथो जैसे गीता, श्रीमदभागवत और रामचरित मानस आदि के अनुसार जीता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है और भौतिक जीवन के तनावपूर्ण और दिखावे के जीवन से बहुत दूर होता है।

साधु पुरुष अपने मानव जीवन के परम लक्ष्य के प्रति हमेशा से ही सचेत रहता है और आध्यात्मिक चिंतन को जीवन में अधिक महत्व देता है। जैसा कि आप को पता ही होगा मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने सम्बन्ध को ईश्वर के साथ पहचान लेना और उस परम सत्य स्वरुप ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही है।

साधु पुरुषो के और भी कई लक्षण होते है।  यहाँ पर कुछ प्रमुख लक्षणों को बताया गया है। अगर आप में से कोई और साधु पुरुष के लक्षणों में कुछ जोड़ना चाहे तो आपका स्वागत है। पुनः अतिशीघ्र मिलते है।

ॐ  शान्ति
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Tuesday, 27 October 2015

ग्लोबल वार्मिंग : कुछ महत्वपूर्ण तथ्य



प्रिय पाठको , वैसे तो हम अपने इस ब्लॉग से ज्यादातर सांस्कृतिक या आध्यात्मिक विषयो पर ही विचार प्रकट किये जाते है लेकिन आज मई एक सामाजिक समस्या पर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा वह है ग्लोबल वार्मिंग की समस्या। जी हाँ , आप सबने कही न कही इस शब्द को अवश्य ही कही न कही पढा या सुना होगा। आइये पहले समझ ले इसका अर्थ क्या है। पिछले कई वर्षो में इस दुनियाँ के तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव हुआ है यह निरंतर बढ़ता ही जा रहा हैं। इस कारण अन्य तरह के मौसम में भी परिवर्तन देखने को मिला है। अंतर्राष्ट्रीय मंचो में यह मुद्दा प्रमुख रूप से छाया हुआ है। बढ़ते औधोगीकरण और बदलती जीवन शैली के फलस्वरूप हम नित प्रतिदिन इस समस्या को कही न कही और बढ़ाते जा रहे है। अब यह साफ़ हो गया है कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा अर्थ है हमारे  भूमण्डल का बढ़ता हुआ तापमान जो की आज प्रमुख चिंता का बिषय बना हुआ है।

बढ़ता हुआ ए.सी (एयर कंडीशनर) और फ्रिज का प्रयोग  इस समस्या को और अधिक बढ़ा रहा है। इन चीजो के उपयोग से कार्बन और अन्य हानिकारक गैसों  के निकलने से पृथ्वी का तापमान में बहुत अधिक वृद्धि दर्ज की गयी है और ये गैसें  हमारी ओजोन परत के लिए भी नुकसानदायक है। ओजोन पर्त हमारी सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों से रक्षा करती है। आज हम ऊर्जा की खपत कूलिंग यानि ठंडा करने के लिए ज्यादा कर रहे है।
इस ठंडा यानि  कूलिंग के चक्कर में दुनियाँ  का कूलिंग सिस्टम बिगड़ गया। कृत्रिम रूप से वातावरण   चीजो को ठंडा करने की हमारी आदत बहुत घातक सिद्ध हो रही है।

दुनियाँ  में पहला घरेलू एयरकंडीशनर 1914 में बना था और पहला फ्रिज 1930 में बना था। लोग धीरे धीरे इन चीजो के गुलाम बनते चले गए। अकेले 2010 में चीन में ५ करोड़ ऐ सी की खपत हो गयी और ये मान साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। अकेले अमेरिका अपनी बिल्डिंग्स को कूल रखने लिये जितनी बिजली खर्च करता हैं  उतना अफ्रीका कुल मिला कर भी नहीं उपयोग कर पाता  है। मुंबई में भी कुल बिजली का 40 % ऐसी पर ही खर्च हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक , सन 2100 तक दुनिया में एसी के लिये बिजली की मांग 33 गुना बढ़  जायेगी।

समस्या यह है की ना तो विकसित देश जैसे अमेरिका या फिर विकासशील देश कोई भी अपने यहाँ कार्बन जैसी हानिकारक गैसो के उत्सर्जन को रोक नहीं सके है। अधिक मात्रा में हानिकारक गैसें वातावरण में मिलकर वायुमंडल को और अधिक घातक बना रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग इस सदी के लिए एक बड़ी चुनौती है। विकास और आधुनिक जीवन की अंधाधुंध दौड़ में हम अपने विनाश  का जाल दिन प्रतिदिन बुनते जा रहे है। विकसित देशो के लोग जीवन शैली बदलना नहीं चाहते और विकासशील देश विकास के नाम पर फ्रिज और एसी का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ाते ही जा रहे है। जहाँ  पर जरुरत नहीं हैं वह पर भी सिर्फ दिखावे और स्टेटस सिम्बल के नाम पर इनकी मांग बढ़ती जा रही हैं।

दुनियाँ भर के वैज्ञानिक और एनवायरनमेंट एजेंसिया आये दिन लोगो से इन गैसों में कमी लाने के लिए अपील करती हैं लेकिन ऐसा लगता हैं  कि  बढ़ता हुआ भौतिकतावाद के कारण  इसका रुकना बहुत मुश्किल हो गया हैं और आने वाले समय में गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। अगर हम फ्रिज और एसी का उपयोग काम करने में सफल होते है तभी इस समस्या से कारगर ढंग से निपटा जा सकता है।

ॐ शांति
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Wednesday, 21 October 2015

विजयदशमी : आज के सन्दर्भ में

 

आप सभी को पिछले नौ दिनों से चल रहे नवरात्रि उत्सव और आने वाले त्यौहार विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाये। विजयदशमी का त्यौहार जिसे दशहरा के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार को अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने आसुरी और दुष्ट स्वाभाव वाले रावण का वध किया था और पूरे भूमण्डल को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।

भगवान राम की इस विजय के उपलक्ष्य में हर वर्ष हम रावण दहन करते है यानि रावण के विशाल पुतले बना कर उसे जलाते है। ये परंपरा कई युगो और सदियों से चली आ रही है। मै भी बचपन से इस त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ हू।  पहले तो ये सिर्फ मेरे लिए मनोरंजन और स्कूल की एक और छुट्टी के जितना ही महत्व रखता था। लेकिन जब से होश संभाला तब से हर वर्ष मैं यह सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि जिस रावण के पुतले को इतनी भीड़ के बीच में हम हर वर्ष जलाते हैं  वही रावण हर वर्ष और अधिक शक्तिशाली बन कर हमारे बीच उपस्थित हो जाता है।  आखिर कब तक हमें उसे यूँ ही जलाते रहेंगे और कब तक वह और अधिक मजबूती से हमारे बीच यूँ ही हर वर्ष आता रहेगा।  

अगर गहराई से सोचे तो अब सिर्फ दशहरे के दिन रावण जलना मात्र रस्म अदायगी रह गया है। हम सिर्फ अपनी ऊर्जा और समय ही नष्ट कर रहे है यदि हम सही मायनो में बुराई को पराजित न कर सके। बुराई भी दो प्रकार की है, एक तो जो हम अपने आस पास देखते है यानि बाहर देखते है और एक हमारे मन में भी बुराइयो का भंडार है। हम अपने आस - पास कितने बलिष्ठ रावण बहुत बड़ी संख्या में देखते रहते हैं। अपने मन का रावण तो और भी अधिक शक्तिशाली है। जब से हम अपनी गौरवशाली संस्कृति से दूर होकर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में रंग गए है तब से तो ये और अधिक मजबूत होकर अट्टहास कर के हम सबको चुनौती देता नजर आ रहा हैं। 

कहते हैं जव राम और रावण के बीच घोर संग्राम हो रहा था, उस समय भी रावण के जितने सिर राम जी काटते थे उतने ही सर पुनः नए हो जाते थे। इस प्रकार जब राम अत्यधिक परेशान हो गए तब रावण के भाई विभीषण ने युक्ति बताई और तब रावण मार जा सका। आज भी हम देखते है कि  हम जितना भी अधिक बुराइयो के खात्मे का प्रयास करते है, बुराई और प्रचंड रूप में हमारे सामने आ कर हमें ललकारने लगती है। 

अगर हम अपने समाज में व्याप्त बुराइयो जैसे भ्रष्टाचार, नशे की आदतो जैसी बुराइयो को मार सके तभी सही अर्थो में रावण जलने की सार्थकता है नहीं तो इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता है। आइये हम सभी संकल्प लेते है कि हम सब अपने अंदर के रावण को पराजित करेंगे और सद्गुणों को विकसित करेंगे। इसी के साथ आप सभी को फिर से विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाये। 

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Wednesday, 14 October 2015

नवरात्रि का हमारे जीवन में स्थान




इधर कुछ दिनों से व्यस्तता के कारण आप लोगो के संपर्क में नहीं रह सका। आपमें से काफी लोगो के फ़ोन कॉल्स भी आये जो आपका हमारे प्रति स्नेह को साफ़ प्रदर्शित करता है। इधर नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र का प्रारम्भ हो चुका है। पूरे देश में लोग बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ इन दिनों देवी माँ का पूजन व अर्चन करते है। बहुत से लोग उपवास आदि के द्वारा अपना शुद्धिकरण करते है जिससे उपासना और अच्छी तरह से हो सके।

इधर गुजरात और महाराष्ट्र की तरफ गरबा नृत्य बहुत लोकप्रिय है। लोग रात्रि में माता की प्रतिमा के सामने घेरा बनाकर माता को रिझाने के लिए नृत्य और गायन करते है। इस सम्पूर्ण उत्सव को गरबा के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में रात्रि जागरण का चलन ज्यादा है। लोग पूरी रात्रि जागकर माता जी के भजन आदि गाकर मैया को रिझाते है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते है। इसी तरह देश के अन्य अन्य भागो में भी लोग अपने अपने तरीके से इन नौ दिनों में मैया की विभिन्न तरीको से पूजा व वंदन करते है।

कलियुग के बढ़ते प्रभाव के फलस्वरूप आसुरी शक्तियों का दिन प्रतिदिन प्रभाव बढ़ता जा रहा है और आमजन त्रितापो से पीड़ित है। ऐसे में यदि कुछ समय ही सही , मनुष्य यदि भक्तिभाव से उस परमशक्ति संपन्न परमेश्वर को याद करता है तो परिणामस्वरूप बहुत ही शांति और आनंद का अनुभव करता है। अगर और अधिक गहराई से सोचे तो पाएंगे कि अनंत शक्तिरूपा माँ उन परम पुरुष आदि परमेश्वर की विभिन्न शक्तियों में से एक है। इन माँ के भी अनंत स्वरुप और अनंत शक्तियाँ हैं  जिन्हे हम जैसे मतिमंद नहीं समझ सकते है।

मैं किसी भी तरह के पूजापाठ का विरोधी नहीं हूँ लेकिन यदि हम इस प्रकार विशेष दिनों में पूजा करके अन्य दिनों में आसुरी या पापपूर्ण जीवन जिए या इसे सहन करे तो ये पूजा भी कोई फल प्रदान नहीं करती। अगर हम अपने जीवन में सदाचार, सत्य, प्रेम और करुणा जैसे सद्गुणों को विकसित नहीं करेंगे तो फिर जीवन में कैसे शांति और खुशहाली आ सकती है। आप लाख व्रत और उत्सव मना लो लेकिन जब तक हमारी अन्तः प्रवृत्तियाँ कलुषित है तब तक ये सभी कर्मकांड और समारोहो का कोई अर्थ नहीं है। हमारे शास्त्रो में भी वर्णन आता हैं  कि  जहाँ  जहाँ नारियों की पूजा होती हैं  वहाँ  वहाँ देवतागण स्वयं निवास करते है।

जब तक हम हमारे समाज में अपने आस-पास की स्त्रियों का आदर और सम्मान नहीं करेंगे तब तक हम अपने जीवन में सही अर्थो में कैसे नवरात्री का उत्सव मन सकेंगे। बढ़ती हुई कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ती रेप की घटनाये, अल्प आयु कन्याओ के साथ दुर्व्यवहार की घटनाओ के बीच आज के समाज में घुटन का अनुभव हो रहा है। जब तक ऐसी घटनाओ पर लगाम नहीं लगेंगी तब तक माँ हमारे द्वारा अर्पित कोई भी पूजा या भेट स्वीकार नहीं करेंगी। हमारा देवी माँ से वरदान और खुशियो की आशा करना निरर्थक ही साबित होगा अगर हमारे समाज में हम स्त्रियों को सम्मान नहीं दे सके।

आइये इस नवरात्री हम सभी मिलकर संकल्प ले कि हम अपने आस-पास किसी भी तरह से महिलाओ के प्रति अपराध नहीं होने देंगे। सभी महिलाओ के प्रति आदर व सम्मान का भाव रखेंगे और जीवन में नौ सदगुणों को विकसित करेंगे। ये नौ सद्गुण इस प्रकार हैं - सत्य, सदाचार , क्षमा, प्रेम, करुणा, पवित्रता, समता,सहनशीलता और सेवा।

आज के लिए इतना ही बाकी फिर जल्द ही मिलते है।

ॐ शांति
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