प्रिय पाठको ,
आप सभी को मेरा भाव भरा प्रणाम। आमलकी एकादशी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाये। आनंद यात्रा में मेरे साथ देने वालो आप सभी का प्रेम व स्नेह मिलता हैं वह अतुलनीय है और मेरे पास इतनी सामर्थ्य नहीं है की इसका आभार मै शब्दों में कर सकू। हमारा भारतवर्ष शदियों से विचारको, तत्वदर्शियो, ऋषि - मुनियो, साधू- सन्याशियो की भूमि रहा है। हम सभी बहुत पुण्यवान और ईश्वर की कृपापात्र है जो इस पतित पावनी गंगा माता से सिंचित धरा पर हमें जन्म मिला।
इस धरा में जन्म लेने की लिए बहुत ही पुण्य की जरुरत होती है और उनसे ज्यादा वो लोग पुण्यवान है जिन्हे नित प्रतिदिन साधू संग और सत्संग एवम भगवद चर्चा का लाभ मिलता है। मित्रो , मेरी अपनी कोई सामर्थ्य नहीं है कि मै कुछ अपने आप लिख सकू जो भी लिखता हैं वो मेरे गोविन्द की कृपा और साधू संग की कृपा से ही है।
अगर गौर से हम देखे तो हम पाएंगे की हम सदा ही दूसरो से कुछ सेवा प्राप्त करते है। भले ही आप रूपये दे कर कीमत अदा करके संतुष्ट होंगे, लेकिन जरा सोचिये अगर खेतो में अन्न नहीं पैदा होगा तो हम किसकी कीमत अदा करेंगे। भले ही हमारे पास खजाना भरा हो मगर हमें अन्न की जरुरत होगी। हमें एहसानमंद होना चाहिए उन किसानो का , मजदूरो का और उस कृपालु ईश्वर का जिसकी वजह से हमें अन्न मिलता है और इस धर्म में जीवन संभव होता है। ऐसी ना जाने कितनी सेवाएं है जो हम प्रकृति और दूसरे मानवो, पशु, पक्षियों से पाते हैं लेकिन कभी भी हमारे मन में इस सबके प्रति कृतज्ञता का भाव नहीं आता है। हम झूठे अहंकार के कारण सोचते है कि इसमें कैसी कृतज्ञता कैसा अहसान मैंने तो इसकी कीमत रूपये देकर पेमेंट क्सर्के चुका दी है। ये भाव गलत है।
इंसान जन्म से ही बहुत सारे लोगो का ऋणी रहता है। सबसे पहले अपनी माता- पिता का, अपने गुरुजनो का, इस जमीं का, आस-पास में उपस्थित समाज का और ना जाने कितने कितने अनजान लोगो का जिनसे जाने - अनजाने हमने सेवा प्राप्त की है और बदले में हम कुछ कागज की मुद्राए देकर सोचते है कि बस हमने कर्ज उतार दिया। ये तो बहुत मूर्खता और अज्ञानता से भरी धारणा बना रखी है। इतनी सेवाये इतने सारे लोगो से लेने के बाद भी हम हमेसा असंतुष्ट और दुखी रहते है। ये भी बड़ी अजीब बात है। कुछ लोगो को तो मैंने देखा है जब भी मिलते है सिर्फ अपना दुःख और तकलीफ के अलावा कोई बात ही नहीं करते। ऐसा लगता है जैसे सारा संसार, प्रकृति और प्रकृति में स्थित समस्त जीव उस एक व्यकित के पीछे ही हाथ धो कर दुःख देने के लिए पड़े हो।
इस दुःख और निराशा का प्रमुख कारण हमारा लोभ और निजी स्वार्थ ही है। अगर हम इनको जीवन में कम करके कुछ समय सेवा के लिए निकले तो आपके जीवन में आनंद निश्चित रूप में अपना स्थायी निवास बना लेगा। कभी कुछ समय अस्पतालों में जा कर मरीजों और उनके परिजनों के बीच में सेवा कर के देखिये, कभी किसी गैशाला या वृद्धा आश्रम में जा कर इनके बीच सेवा कर के देखिये। कभी तड़क-भड़क आधुनिक जीवन शैली से बहार निकल कर कही आश्रम में जा कर महापुरुषों का सानिध्य और सेवा का लाभ लीजिये, कभी गरीब बस्तियों में अन्न वितरण या और किसी माध्यम से सेवा का अवसर लीजिये। कुल मिलकर अगर आप लोभ और स्वार्थ की प्रवृत्ति को छोड़कर सिर्फ दुसरो की ख़ुशी और सेवा में लगेंगे तो आप निश्चित रूप से आनंद के समुन्दर में गोते लगाएंगे , ऐसा मेरा भी अनुभव रहा है।
आनंदमय जीवन का प्रथम सूत्र लोभ और स्वार्थ का त्याग कर के सेवा कारण एक व्रत ले। सेवा शब्द अपने आप में बहुत व्यापक है और इसका क्षेत्र भी बहुत व्यापक है। अतः ईश्वर की दी हुई सामर्थ्य के अनुसार आप जैसे भी हो जहा भी हो आइये आज से ही कुछ सेवा का संकल्प ले। आपका जीवन अवश्य ही आनंद से भर जायेगा।
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com
Very Nice Blog Arvindbhai
ReplyDeleteVery Nice Blog Arvindbhai
ReplyDeleteDhanywad purav Bhai. Aap sabhi Pathko ke karan hi is blog ki sarthakta hai.
Delete