शब्द के जैसा अनमोल हीरा-मोती आदि भी नहीं होता ऐसा हमने कई बुजुर्गो से सुना है और हमारे ग्रंथो में भी कई जगह इस विषय पर चर्चा हुई है। शब्दों का हमारे मन पर बहुत ही गहरा असर होता है। अगर कोई हमें गाली दे तो हमें गुस्सा आता है क्योकि वो बुरे शब्द हमारे कानों के माध्यम से हमारे मन में गहरे उतर जाते है। इसी तरह अगर कोई हमारा उत्साह बढ़ाये या अच्छा बोले तो भी हमारे मानस पटल पर इसकी सीधी प्रतिक्रिया होती है। शब्द अमृत का भी काम करता है और जहर का भी , ये तो बोलने वाले के बुद्धि विवेक पर निर्भर करता है।
महाभारत में उल्लेख आता हैं कि द्रोपदी के उन शब्दों ने ही महाभारत जैसे युद्ध की नींव डाली थी जिसमे उसने दुर्योधन से ये कहकर उपहास किया था कि "अंधे का पुत्र अँधा ही होता हैं। " गोस्वामी तुलसीदास की पत्नी के सिर्फ इतना कहने से कि " जितना अनुराग तुम्हे मुझसे है उतना अगर श्री राम प्रभु से होता तो कितना अच्छा होता।" तुलसीदास जी के जीवन दिशा ही परिवर्तित हो गयी।
इसलिये जब भी हम कुछ बोलते है तो हमेशा शब्दों को सोच समझ कर मुख से निकलना चाहिये। आज मै देखता हूँ कि लोग बिना कुछ सोचे समझे कुछ भी किसी को भी बोल देते है। आज वृद्ध माता-पिता से हम ठीक से बात नहीं करते और उपेक्षित आचरण उनके साथ करते है। याद रखिये , शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। चोट के जख्म तो भर सकते हैं लेकिन शब्दों के घाव कभी नहीं भरते है। हम अपने घर में बच्चो के सामने भी तू या तुम की जगह आप शब्द का प्रयोग करे। उनके अंदर अच्छे संस्कार भरने की हर संभव कोशिश करना चाहिये।
हॉय या हैलो की जगह हरे कृष्ण , राधे कृष्ण या जय राम जी की जैसे अभिवादन के शब्दों का प्रयोग करे आपका चित्त पवित्र होगा। कुछ भी बोलने से पहले तीन बाते सोच लो, पहली कि मैं ऐसा क्यों बोल रहा हूँ , बोलने का समय उचित है या नहीं और तीसरी इस बात का सामने वाले के लिए क्या महत्व है।
मित्रो, वाणी पर नियंत्रण भी एक तपस्या के समान ही है। व्यर्थ बोलकर अपनी ऊर्जा नष्ट न करे और कड़वा बोलकर किसी के दिल में जख्म न करे। जब भी बोले प्रिय बोले, मधुर बोले और सत्य बोले। अगर कभी आलोचना या कठोर शब्दों का प्रयोग करना बहुत ही ज़रूरी हो उस समय भी शब्दों पर विशेष ध्यान रखें।
मुझे बहुत ही सुन्दर पंक्तिया याद आ रही है।
वाणी ऐसी बोलिये , मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे , आपौ शीतल होय।
आज के लिये सिर्फ इतना ही, बाकि फिर कभी.....
अरविन्द त्रिवेदी
arvind.trivedi79@gmail.com
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