मित्रो, आज रामनवमी का पर्व हैं। आप सभी को मेरी तरफ से ढेर सारी शुभकामनाये। चैत्र पक्ष के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को त्रेतायुग में भगवान श्री रामचन्द्र अपने अंशों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन के साथ भारतवर्ष स्थित अयोध्या में इस धरा पर अवतरित हुये। उन्होंने इस धरती पर रहकर नर लीला के माध्यम से हम सभी को महत्वपूर्ण शिक्षाये प्रदान की।
वैसे तो भगवान की अवतार और लीलाएं अनंत हैं। उन्हें मैं क्या बड़े बड़े सिद्ध, मुनि, देव यहाँ तक कि ब्रम्हा और शिव आदि भी पूर्णतया नहीं समझ सकते है। फिर भी उसी परम ब्रम्ह परमेश्वर की कृपा से वाल्मीकि, व्यास और तुलसीदास जैसे साधू संतो के माध्यम से कुछ सुनने को मिला हैं वही आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हुँ।
भगवान के २४ प्रमुख अवतारों का वर्णन हुआ हैं उनमे से १० मुख्य अवतार हैं और इन १० में भी २ अवतार भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण ज्यादा प्रसिद्ध हैं। श्रीरामचन्द्र जी के जीवन से मनुष्य जीवन कैसा होना चाहिए ये शिक्षा मिलती है। श्रीकृष्ण जी की लीलाओं से भगवान के स्वरुप को जानने को मिलता है। भगवान राम का जीवन मानव मात्र के लिए अनुकरणीय हैं लेकिन श्री कृष्ण की लीलाऐ अनुकरणीय नहीं है। राम के रूप में भगवन ने ऐष्वर्य लीला का प्रदर्शन नहीं किया हैं वह सिर्फ नर लीला तक ही मर्यादित रहे है जबकि श्री कृष्ण के रूप में भगवन ने अपने सभी ऐश्वर्यों का प्रदर्शन किया हैं।
भगवान के अवतार का प्रमुख कारण धर्म की स्थापना और भक्तो पर कृपा करना होता हैं। उनके अवतारों के पीछे कुछ अंतरंगा कारण होते हैं और कुछ बहिरंगा कारण। आइये भगवान राम के अवतार के कुछ प्रमुख कारणों पर थोड़ा चर्चा करते है। तुलसीदास कृत रामचरित मानस में ५ प्रमुख कारणों की चर्चा हुई है। पहला कारण भगवान के द्वारपाल जय और विजय को सनतकुमारों द्वारा शापित होना, दूसरा कारण मनु और सतरूपा की तपस्या, तीसरा कारण नारद द्वारा मोहवश भगवन विष्णु को श्राप देना, चौथा कारण राजा प्रतापभानु को श्राप और पाँचवा कारण सती वृंदा का कुपित होना। भगवान शिव पार्वती जी से कहते है।
राम जनम के हेतु अनेका , परम विचित्र एक ते एक़ा।
ये तो कुछ कारण है अवतार के लेकिन उन्हें पूर्ण रूपेण समझना असम्भव हैं। यहाँ पर सभी कारणों की चर्चा समयाभाव और स्थानाभाव के कारण करना संभव नहीं हैं। मेरी समझ से तो भगवान करुणावश अपने भक्तो पर कृपा करने के हेतु से आते है। यही प्रमुख कारण है बाकि असुरो को मारना आदि गौड़ कारण है। धर्म की स्थापना और भक्तो पर अहैतुकी कृपा करने के लिए हु भगवन अवतरित होते है।
भगवान राम के जीवन चरित्र से हमें एक भाई का अपने भाइयो के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए, एक आदर्श पुत्र कैसा होना चाहिये , एक आदर्श राजा कैसा होना चाहिए आदि आदि सम्बन्धो के बारे में प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने गिद्धराज जटायू को स्वयं अग्नि देकर अपने कोमल ह्रदय का परिचय दिया। वे अत्यन्त करुणासागर, सुहृदय और कृतज्ञ आदि सद्गुणों के सागर है। वन प्रवास के दौरान उन्होंने केवट मल्लाह और भीलनी सबरी के प्रति भी अनन्य प्रेम का प्रदर्शन किया। शत्रु रावण के भाई विभीषण को भी भाई की तरह प्रेम और स्नेह दिया। सुग्रीव के प्रति भी अपनी मित्रता सुग्रीव को राज्य लौटा कर निभाई। रामराज्य को आज भी हम आदर्श शासंन के रूप में याद करते है। राम जी कभी भी किसी के तृण बराबर उपकार को कभी भी नहीं भूलते है। तुलसीदास जी रामचरित मानस में अंत में बहुत अच्छी पंक्तियाँ लिखते है।
जाकी कृपा लवलेश मतिमन्द तुलसीदासहू।
पायो परम विश्राम , राम समान प्रभु नाही कहू।
जाकी कृपा लवलेश मतिमन्द तुलसीदासहू।
पायो परम विश्राम , राम समान प्रभु नाही कहू।
और क्या कहू रामचन्द्र जी गुणों के समुद्र है हम उनका वर्णन करने में असमर्थ है। भगवान राम को मर्यादा पुरषोत्तम, करुणा निधान , दीनबन्धु , परम उपकारी आदि नामो से भी जाना जाता है। उन्होंने एक मित्रता की उसे पूरी तरह से निभाया। किसी भी लेखनी में क्षमता नहीं है कि उनके बारे में सब कुछ लिख सके। एक बार पुनः आप सभी को रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाये। राम जी के चरित्र को अपना कर के ही हम विश्व शांति और आनंद के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।
अरविन्द त्रिवेदी
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com
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