बंदउ गुरु पद पदम परागा।
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से अपने गुरु के चरणो में नमन करते हुए आइये हम आप इस आनंद यात्रा पर निकलते है। सबसे पहले हमें अपने आप से एक प्रश्न करना चाहिए कि हम इस जगत में किस उद्देश्य से है और हमारी वास्तविक पहचान क्या है ? फिर दूसरा प्रश्न है कि इस जगत और हमारे बीच में क्या सम्बन्ध है ? जब तक हम इन प्रश्नो के सही उत्तर नहीं ढूंढ लेते है तक तक हमें उस परम आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती है। आज इस संसार में सभी लोगो को आनंद की खोज है और इसमें कोई भी बुराई नहीं है। आनंद में रहना तो सभी जीव आत्माओ का मौलिक स्वाभाव है। फिर भी हम दिन प्रतिदिन नयी नयी बीमारियो और उलझनों के शिकार होते जा रहे है। हमारा जीवन तनावग्रस्त होता जा रहा है और ये सब हो रहा है तब जब की तरक्की और विकास के दावे किये जा रहे है।
यहाँ पर इस बात पर चिंतन की जरूरत है कि क्यू हम इतनी तरक्की और विकास के बाद भी इतना दुखमय जीवन जीने के लिए मजबूर है ? क्यों इतने सारे वैज्ञानिक अविष्कारों और सुख सुविधाओ के बीच हम संतुष्ट नहीं है ? धर्म और अध्यात्म तो बाद में , पहले हम सही अर्थो में मानव जीवन तो जिए। मुझे देख कर अपने आस-पास बहुत पीड़ा होती है कि समूचे मानव समाज में आज मुश्किल से बिरला ही कोई पूर्ण आनंद और शांति के साथ जीवन जी रहा है। हम में से कई लोग धार्मिक या आध्यात्मिक जीवन जीने का भ्रम पाल कर बैठे है लेकिन मेरी समझ से इसके पहले भी एक स्टेप है और वो है सच्चा मानव बनना। सर्वप्रथम हम सभी को अपने अंदर मानवीय गुणों को विकसित करने की जरूरत है।
आज हमारे अंदर नम्रता, क्षमा, शील आदि मानवीय गुणों का पतन होता जा रहा है और हम तरक्की और विकास के नाम पर एक अंधी और कभी न खत्म होने वाली इस गलाकाट प्रतियोगिता का एक हिस्सा बन कर रह गए है। नम्रता और संतोष अगर गुण भी किसी के जीवन में है तो भी वह आनंद से भरा जीवन जी सकता है। वास्तव में हमारा जीवन दो तरह का होता है, एक होता है भौतिक जीवन और एक होता है आध्यात्मिक जीवन। भौतिक जीवन का मतलब ये दृश्य जगत जिसको हम हर पल अपनी आँखों से देख सकते है और आध्यात्मिक जीवन को हम महसूस कर सकते है लेकिन अपनी इन आँखों से देख नहीं सकते।
हम सभी को भौतिक जीवन के प्रति बहुत लगाव या आशक्ति होती है और ये जानते हुए भी कि इस जगत में हमारी एक सीमित काल अवधि है फिर भी हम सभी जीते ऐसे है जैसे की हमें कई हजार वर्षो तक इसी जगत में निवास करना है और इसी भ्रम से लोभ के कारण हम दिग्भ्रमित हो जाते है, भटक जाते है। हम उन भौतिक चीजो में आनंद ढूंढने का प्रयास करते है जहाँ पर आनंद है ही नही। अगर आपको थोड़े समय के लिए आनंद मिल भी गया तो भी वह टेम्परेरी ही होता है फिर वही तनाव वही भय हमें घेर लेते है और हम अपने आपको असहाय मान लेते है। हमारी जो साश्वत आनंद की खोज अधूरी ही रह जाती है। साश्वत आनंद का अर्थ वह आनंद जो कभी मिटे नहीं और वो इस भौतिक जगत में है भी नहीं।
किस तरह इस भौतिक जीवन के जाल से निकल कर सच्चे सुख को पा सके इसकी यात्रा आगे भी जारी रहेगी। आशा है आप सब इस यात्रा में हमारे साथ रहेंगे और हम सब मिलकर इस बहुत महत्वपूर्ण विषय पर चिंतन जारी रखेंगे।
ॐ शांति।।
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से अपने गुरु के चरणो में नमन करते हुए आइये हम आप इस आनंद यात्रा पर निकलते है। सबसे पहले हमें अपने आप से एक प्रश्न करना चाहिए कि हम इस जगत में किस उद्देश्य से है और हमारी वास्तविक पहचान क्या है ? फिर दूसरा प्रश्न है कि इस जगत और हमारे बीच में क्या सम्बन्ध है ? जब तक हम इन प्रश्नो के सही उत्तर नहीं ढूंढ लेते है तक तक हमें उस परम आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती है। आज इस संसार में सभी लोगो को आनंद की खोज है और इसमें कोई भी बुराई नहीं है। आनंद में रहना तो सभी जीव आत्माओ का मौलिक स्वाभाव है। फिर भी हम दिन प्रतिदिन नयी नयी बीमारियो और उलझनों के शिकार होते जा रहे है। हमारा जीवन तनावग्रस्त होता जा रहा है और ये सब हो रहा है तब जब की तरक्की और विकास के दावे किये जा रहे है।
यहाँ पर इस बात पर चिंतन की जरूरत है कि क्यू हम इतनी तरक्की और विकास के बाद भी इतना दुखमय जीवन जीने के लिए मजबूर है ? क्यों इतने सारे वैज्ञानिक अविष्कारों और सुख सुविधाओ के बीच हम संतुष्ट नहीं है ? धर्म और अध्यात्म तो बाद में , पहले हम सही अर्थो में मानव जीवन तो जिए। मुझे देख कर अपने आस-पास बहुत पीड़ा होती है कि समूचे मानव समाज में आज मुश्किल से बिरला ही कोई पूर्ण आनंद और शांति के साथ जीवन जी रहा है। हम में से कई लोग धार्मिक या आध्यात्मिक जीवन जीने का भ्रम पाल कर बैठे है लेकिन मेरी समझ से इसके पहले भी एक स्टेप है और वो है सच्चा मानव बनना। सर्वप्रथम हम सभी को अपने अंदर मानवीय गुणों को विकसित करने की जरूरत है।
आज हमारे अंदर नम्रता, क्षमा, शील आदि मानवीय गुणों का पतन होता जा रहा है और हम तरक्की और विकास के नाम पर एक अंधी और कभी न खत्म होने वाली इस गलाकाट प्रतियोगिता का एक हिस्सा बन कर रह गए है। नम्रता और संतोष अगर गुण भी किसी के जीवन में है तो भी वह आनंद से भरा जीवन जी सकता है। वास्तव में हमारा जीवन दो तरह का होता है, एक होता है भौतिक जीवन और एक होता है आध्यात्मिक जीवन। भौतिक जीवन का मतलब ये दृश्य जगत जिसको हम हर पल अपनी आँखों से देख सकते है और आध्यात्मिक जीवन को हम महसूस कर सकते है लेकिन अपनी इन आँखों से देख नहीं सकते।
हम सभी को भौतिक जीवन के प्रति बहुत लगाव या आशक्ति होती है और ये जानते हुए भी कि इस जगत में हमारी एक सीमित काल अवधि है फिर भी हम सभी जीते ऐसे है जैसे की हमें कई हजार वर्षो तक इसी जगत में निवास करना है और इसी भ्रम से लोभ के कारण हम दिग्भ्रमित हो जाते है, भटक जाते है। हम उन भौतिक चीजो में आनंद ढूंढने का प्रयास करते है जहाँ पर आनंद है ही नही। अगर आपको थोड़े समय के लिए आनंद मिल भी गया तो भी वह टेम्परेरी ही होता है फिर वही तनाव वही भय हमें घेर लेते है और हम अपने आपको असहाय मान लेते है। हमारी जो साश्वत आनंद की खोज अधूरी ही रह जाती है। साश्वत आनंद का अर्थ वह आनंद जो कभी मिटे नहीं और वो इस भौतिक जगत में है भी नहीं।
किस तरह इस भौतिक जीवन के जाल से निकल कर सच्चे सुख को पा सके इसकी यात्रा आगे भी जारी रहेगी। आशा है आप सब इस यात्रा में हमारे साथ रहेंगे और हम सब मिलकर इस बहुत महत्वपूर्ण विषय पर चिंतन जारी रखेंगे।
ॐ शांति।।
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