Thursday, 30 July 2015

जीवन रहस्य - भाग-2

जीवन रहस्य - भाग-2

मुझे आप सभी को यह बताते हुए आनंद हो रहा है कि मै आप लोगो तक सफलतापूर्वक पहुंच रहा हूँ। पिछले 2 - 3 दिनों से कई लोगो ने कॉल कर के कांटेक्ट भी किया और आगे भी लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। इन प्यार भरी प्रतिक्रियाओ के लिए मई आप सभी को धन्यवाद देता हूँ। आज गुरु पूर्णिमा का पवन दिन है , आइये हम सभी अपने अपने गुरुजनो के चरणो में श्रद्धाभाव से प्रणाम करते हुए अपनी यात्रा जारी रखते है।

कल हम ने कुछ भौतिक जीवन के बारे में चर्चा शुरू की थी। वर्तमान में हम सभी लोग इस भौतिक जगत में जीवन जी रहे है। किसी से भी पूछो कि  आप कैसे हो ? (How are you ?) तो बड़ा सीधा और रत रटाया जवाब आता है कि मै  ठीक हूँ (I  am fine ). मेरी समझ से ये ही दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है जो हम एक दूसरे से बोलते है। थोड़ा सहज होने के बाद अगर आप फिर से यही प्रश्न करे तो जवाब बहुत अलग आता है। कुछ महान भगवद भक्तो को छोड़ दे तो  मेरा आज तक तो यही अनुभव रहा है की हर आदमी आज दुखी है, तकलीफ में है और चिन्ताओ से निरंतर घिरा हुआ है।  किसी को नौकरी की टेंशन, किसी को पारिवारिक टेंशन , किसी को पडोसी से टेंशन, किसी को अधिक से अधिक धन कमाने की टेंशन , किसी को दुसरो की तरक्की से टेंशन और पता नहीं कितनी कितनी प्रकार की टेंशन ? भगवन बचाये इस तरह की चिन्ताओ से।

अगर शांति से सोचे तो हम किस बात की चिंता करते है ? आने वाले कल की , जिस पर हमारा कोई जोर नहीं है या नियंत्रण नहीं है। फिर भी हम है कि  दिन रात चिंता में घुले जा रहे है। यह जगत कभी किसी के लिए नहीं रुका है और न ही कभी रुकेगा। हम आप रहे या न रहे ये संसार यूँ ही चलता रहेगा तो किस बात की चिंता करे और क्यों करे? जब चिंता करने के लिए एक परम शक्ति जगत का आधार है तो हम क्यों अपन आप को कष्ट देते रहते है। इसका एक ही कारण  है कि हम किसी पर विश्वास नहीं करते ,हम लोगो में भरोसे की कमी हो गयी है और दूसरे भी कारण  है जिन पर हम आगे चर्चा करेंगे। किसी पर भरोसा न होना भी हमारे  दुखो का एक अहम कारण  है। हमारा भरोसा किसी पर भी नहीं है न जीते जागते इंसानो पर और न ही उस परम पिता परम शक्ति ईश्वर पर। एक बात तो सुनिश्चित है कि  अगर हम जीवन में भरोसा करने लग जाये तो बहुत सी समस्याएं अपन ेआप हल हो जाती है।

एक छोटा सा उदहारण देना चाहूंगा कि अगर हम किसी वाहन जैसे ट्रेन , बस, या हवाई जहाज में यात्रा करते है तो हम उसके चालक पर यानि ड्राइवर पर भरोसा करते है। बिना भरोसे के आप एक दिन भी इस संसार में जी ही नहीं सकते। आपको अपने आस पास जो भी  उन पर भरोसा करना ही होता है अगर नहीं करेंगे तो व्यर्थ यानि बिना मतलब की उलझनों को पाल कर अपना जीवन ख़राब करोगे। इसी तरह अगर आप इस संपूर्ण प्रकृति के मालिक, जिसके इशारो पर ये संपूर्ण ब्रम्हांड का सिस्टम चल रहा है उस पर भरोसा नहीं करोगे तो आप इस जगत में कभी भी आनंद और शुकुन से नहीं जी सकते।

ॐ शांति।।
9892724426
arvind.trivedi79@gmail.com

Wednesday, 29 July 2015

जीवन रहस्य - भाग १

जीवन रहस्य - भाग १

कल हम लोग भौतिक जीवन के बारे में चर्चा कर रहे थे। हमारा जीवन दो प्रकार का होता है , पहला भौतिक जीवन और दूसरा आध्यात्मिक जीवन। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए आज हम भौतिक जीवन पर कुछ और विस्तार से चर्चा करेंगे। जीवन के बारे में बहुत प्राचीन समय से हमारे विद्वानो, मनीषियों और दार्शनिको ने बहुत गहराई से सोचा और अपने विचार हमारे सामने रखे। किसी को ये जीवन पहेली लगा, तो किसी को एक सुहाना सफर लगा, किसी को ये दुनिया रंगमंच लगी तो किसी को ये दुनिया समझ में ही नहीं आई। हमारे गीतकारों और कवियों  ने भी इस जीवन के ऊपर बहुत कुछ लिखा। इनमे से कुछ फिल्मो के गीतों की पंक्तियां आपके सामने प्रस्तुत है :

ज़िंदगी एक सफर है सुहाना , यहाँ कल क्या हो किसने जाना।

जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये हँसाये कभी ये रुलाये।

जब तक मैंने समझा जीवन क्या है , जीवन बीत  गया …!!!

जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम , वो फिर नहीं आते।

जिंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा  ....

जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल , खिलाडी है कोई अनाड़ी  है कोई  ।



इस तरह अनेको गीतों की रचना हुई सभी लोगो ने अपने तरीके से जीवन को समझने को कोशिश की। इस तरह बहुत विचार हुआ जीवन पर और आज भी ये मंथन जारी है। जितने लोग उतनी बाते , लेकिन एक निष्कर्ष पर सभी लोग आज तक नहीं पहुंच पाये। हमारे सामने ये सवाल है की आखिर जीवन जिए तो कैसे जिए , इसका क्या उद्देश्य है ? एक बात तो साफ़ निकल कर आती है कि  इस जगत में कुछ भी परमानेंट यानि हमेशा के लिए नहीं है। चाहे वो हमारा शरीर हो या हमारे आस पास की वस्तुऍ , सभी एक सीमित समय या काल तक रहती है और फिर नष्ट  हो जाती है। आप थोड़ा गहराई और शांत मन से विचार करिये कि  क्या आपके आसपास ऐसी कोई वस्तु या व्यक्ति है जो हमेशा  के लिए है ? अगर है तो मुझे भी बताइये। मैंने तो आज तक ऐसा कुछ भी नहीं पाया या देखा जो परमानेंट यानि हमेशा रहे।

अब ये आश्चर्य की बात है कि  नहीं , कि  हम फिर भी इतना चिन्ताओ से भरा जीवन जीते जा रहे है। डर डर के भय और ईर्ष्या से भरा जीवन जिए जा रहे  है।  हमें ये   मालूम है कि कोई भी वस्तु का अस्तित्व हमेशा के लिए नहीं है फिर भी हम हर पल चिंता और तनाव में जी रहे है ये हमारी बेवकूफी नहीं तो और क्या है ?  चाहे जैसी परिस्थिति हो कल वो नहीं रहेगी अच्छी हो या ख़राब  तो फिर किस बात का सुख और किस बात का दुःख ? बेहतर होगा की हम अपने आप में जिए अपने आनंद में जिए और मानवीय गुणों के साथ जिए। अपनी वास्तविक पहचान करिये और परम आनंद में जिंदगी जिए।

हम फिर से आगे अपने विचारो के साथ आपके साथ फिर उपस्थित होंगे।



ॐ शांति।।
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arvind.trivedi79@gmail.com

रहस्यमय जीवन

                                                 बंदउ गुरु पद पदम परागा।
                                                सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।


गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से अपने गुरु के चरणो में नमन करते हुए आइये हम आप इस आनंद यात्रा पर निकलते है। सबसे पहले हमें अपने आप से एक प्रश्न करना चाहिए कि  हम इस जगत में किस उद्देश्य से है और हमारी वास्तविक पहचान क्या है ? फिर दूसरा प्रश्न है कि  इस  जगत और हमारे बीच में क्या सम्बन्ध है ? जब तक हम इन प्रश्नो के सही उत्तर नहीं ढूंढ लेते है तक तक हमें उस परम आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती है। आज इस संसार में सभी लोगो को आनंद की खोज है और इसमें कोई भी बुराई नहीं है। आनंद में रहना तो सभी जीव आत्माओ का मौलिक स्वाभाव है। फिर भी हम दिन प्रतिदिन नयी नयी बीमारियो और उलझनों के शिकार होते जा रहे है। हमारा जीवन तनावग्रस्त होता जा रहा है और ये सब हो रहा है तब जब की तरक्की और विकास के दावे किये जा रहे है।

यहाँ पर इस बात पर चिंतन की जरूरत है कि क्यू हम इतनी तरक्की और विकास के बाद भी इतना दुखमय जीवन जीने के लिए मजबूर है ? क्यों इतने सारे वैज्ञानिक अविष्कारों और सुख सुविधाओ के बीच हम संतुष्ट नहीं  है ? धर्म और अध्यात्म तो बाद में , पहले हम सही अर्थो में मानव जीवन तो जिए। मुझे देख कर अपने आस-पास बहुत पीड़ा होती है कि समूचे मानव समाज में आज मुश्किल से बिरला ही कोई पूर्ण आनंद और शांति के साथ जीवन जी रहा है। हम में से कई लोग धार्मिक या आध्यात्मिक जीवन जीने का भ्रम पाल कर बैठे है लेकिन मेरी समझ से इसके पहले भी एक स्टेप है और वो है सच्चा मानव बनना। सर्वप्रथम हम सभी को अपने अंदर मानवीय गुणों को विकसित करने की जरूरत है।

आज हमारे अंदर नम्रता, क्षमा, शील आदि मानवीय गुणों का पतन होता जा रहा है और हम तरक्की और विकास के नाम पर एक अंधी और कभी न खत्म होने वाली इस गलाकाट प्रतियोगिता का एक हिस्सा बन कर रह गए है। नम्रता और संतोष अगर  गुण  भी किसी के जीवन में है तो भी वह आनंद से भरा जीवन जी सकता है। वास्तव में हमारा जीवन दो तरह का होता है, एक होता है भौतिक जीवन और एक होता है आध्यात्मिक जीवन।  भौतिक जीवन का मतलब ये दृश्य जगत जिसको हम हर पल अपनी आँखों से देख सकते है और आध्यात्मिक जीवन को हम महसूस कर सकते है लेकिन अपनी इन आँखों से देख नहीं सकते।

हम सभी को भौतिक जीवन के प्रति बहुत लगाव या आशक्ति होती है और ये जानते हुए भी कि इस जगत में हमारी एक सीमित काल अवधि है फिर भी हम सभी जीते ऐसे है जैसे की हमें कई हजार वर्षो तक इसी जगत में निवास करना है और इसी भ्रम से लोभ के कारण हम दिग्भ्रमित हो जाते है, भटक जाते है। हम उन भौतिक चीजो में आनंद ढूंढने का प्रयास करते है जहाँ  पर आनंद है ही नही। अगर आपको थोड़े समय के लिए आनंद मिल भी गया तो भी वह टेम्परेरी ही होता है फिर वही तनाव वही  भय हमें घेर लेते है और हम अपने आपको असहाय मान लेते है। हमारी जो साश्वत आनंद की खोज अधूरी ही रह जाती है। साश्वत आनंद का अर्थ वह आनंद जो कभी मिटे नहीं और वो इस भौतिक जगत में है भी नहीं।

किस तरह  इस भौतिक जीवन के जाल से निकल कर सच्चे सुख को पा सके इसकी यात्रा आगे भी जारी रहेगी। आशा है आप सब इस यात्रा में हमारे साथ रहेंगे और हम सब मिलकर इस बहुत महत्वपूर्ण  विषय पर चिंतन जारी रखेंगे।


ॐ शांति।।
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Tuesday, 28 July 2015

प्रणाम एवं वंदन

सर्वप्रथम आप सभी को मेरा प्रणाम और वंदन पहुंचे। परम पिता परमेश्वर की प्रेरणा से आप सब तक पहुचने का इस ब्लॉग के माध्यम से प्रयास किया है।  ब्लॉग शुरू  करने से पूर्व एक बात बहुत साफ़ कर देना चाहता हूँ कि इस ब्लॉग में जो कुछ भी विचार, घटनाये या मंथन प्रस्तुत किया जायेगा उसमे मेरी व्यक्तिगत योग्यता कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी मैंने संतो, आचार्यो और हमारे ग्रंथो से पाया है और जो  मेरे परम पिता परमेश्वर लिखवा देंगे वही आप तक पहुंचेगा। अतः अगर कुछ त्रुटियाँ  रह जाये या जो कुछ भी आपको पसंद न आये उसके लिए मै अग्रिम क्षमा चाहता हूँ और अगर कोई बात अापको  अच्छी लग जाये तो वो हमारे गुरुजनो और संतो का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लीजिये। सबसे पहले ये साफ़ कर देना ठीक होगा की इस ब्लॉग की जरूरत क्यों हुई और इसकी क्या प्रासंगिकता है ?

आज हम सभी भयानक कलि काल से गुजर रहे हैं और हम सभी शाश्वत सुख की खोज में लगे है और उस सुख के लिए ही हम यत्र - तत्र भटक रहे है और इस सुख की प्राप्ति के लिए जन्म जन्मांतरों से हमारी ये परम सुख की खोज अनवरत जारी है। हम सभी लोग समस्याओ से मुक्त जीवन और हर समय आनंद में रहना चाहते है परन्तु समस्या यह है कि  हम लोग सुख वहाँ  ढूंढ़ते है जहाँ ये है नहीं और निरंतर इस सुख और परम शांति की खोज की यह यात्रा यूँ  ही एक जनम से दूसरे जन्मो तक चलती रहती है।

हमारा यह प्रयास रहेगा की इस ब्लॉग के  माध्यम से हम एक दूसरे से अपने विचारो को साँझा  कर सके और हमारी प्राचीन संस्कृति  से अधिक लाभ प्राप्त करे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि  आप सभी लोग अपनी इस यात्रा के दौरान अपने विचार और संदेह भी शेयर करेंगे। अंततः हम सभी उस परमेश्वर के दास है और अंततः उसकी शरणागति ही हमें सच्चा आनंद और सच्ची शांति प्राप्त हो सकती है।

हम आगे भी आध्यात्मिक और तत्व दर्शन के साथ इस ब्लॉग के माध्यम से आपके सतत संपर्क में रहेंगे।

ॐ शांति। .
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