Wednesday, 6 January 2016

उपवास का वास्तविक अर्थ




हमारे सनातन धर्म में बहुत सारे व्रत और उपवास का विधान हैं। उपवास और व्रत से हमारी आस्था का सम्बन्ध काफी गहरा है। हमारे देश में कोई भी सप्ताह ऐसा नहीं होता जिसमे कोई उपवास या व्रत नहीं होता हो। बदलते परिवेश में नयी पीढ़ी इन सारे रीति रिवाजों से दूर होती जा रही हैं और दुःख का विषय यह है कि  अगर कोई उपवास करता है तो उसका मजाक रूढ़िवादी और पिछड़ी मानसिकता का कहकर उड़ाया जाता है।

आइये आज हम उपवास से सम्बंधित कुछ बाते और उसके सही अर्थो की चर्चा करते है। सबसे पहले उपवास का सीधा सम्बन्ध हमारी हेल्थ से है। उपवास के दौरान सिर्फ फलाहार या सिर्फ जल का सेवन करने से हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है और हमारे शरीर से विषाक्त और अनवांछित तत्व भी निकल जाते हैं। महीने में एक या दो उपवास हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है।

हेल्थ के अलावा इसका आध्यात्मिक महत्व भी होता है। उपवास के दौरान मन, वाणी और काया को भी नियंत्रण में रखना चाहिये। वास्तव में उपवास का असली उद्देश्य अपनी आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करना और संयमित जीवन जीना होता है।

उपवास के समय अपने मन में किसी की बुराई देखने, किसी के बारे में बुरा सोचने और किसी की वस्तु में लोभ की भावना से बचना चाहिये। मन से इन तीन बातो का पालन करना चाहिये।  वाणी से भी चार बातो का पालन करना चाहिये - किसी को अपशब्द कहने से बचना चाहिए, किसी की निंदा से बचना चाहिए, झूठ बोलने से बचना चाहिए और किसी की अनुपस्थिति में चुगली यानि किसी की बात किसी और से बताना इन सबसे बचना चाहिए।

अपनी काया अर्थाथ शरीर से भी तीन बातो का पालन करना होता है। अपने शरीर के द्वारा किसी के प्रति हिंसा, चोरी और दुराचार से बचना चाहिये।  अगर हम उपवास के दौरान अपने मन, वचन और शरीर से इन १० बातो का पालन कर पाये तो ही उपवास या व्रत का सही लाभ हम पा सकते है।

अगर आनंदमय जीवन जिन चाहते हैं तो बेहतर होगा कि  महीने में काम  बार उपवास रखे। धीरे धीरे आपके अंदर सद्गुण प्रकट होगा और आपका विवेक मजबूत होगा और अंत में परमेश्वर की कृपा से आपका भौतिक जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन भी महक उठेगा। 

ॐ शांति 
अरविन्द त्रिवेदी 
arvind.trivedi79@gmail.com